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2018 की पूरी गणित, और कुछ नहीं बस इन 6 अंकों का गुणा-भाग थी

इस साल ये नंबर्स इतने ज़्यादा फेमस हुए कि हमको रट गए!

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फोटो - thelallantop

जिस तरह राजनीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि हर कोई थोड़ा-बहुत राजनीतिज्ञ होता ही है, जिस तरह कला के विशेषज्ञ कहते हैं हर कोई छोटा-मोटा कलाकार होता है और जिस तरह भारत का हर कोई इंसान छोटा-मोटा दार्शनिक होता ही होता है, वैसे ही कोई कितना ही गणित से डरता हो, लेकिन उसे रोज़ ही सैकड़ों बार जाने-अंजाने संख्याओं/अंकों से दो-चार होना ही पड़ता है. गौर कीजिए ‘सैकड़ों बार’ और ‘दो-चार’ दोनों ही संख्याएं हैं. और यूं हर भारतीय छोटा-मोटा आर्यभट्ट है.

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तो यूं जब साल खत्म होने को है और हर कोई टॉप टेन की लिस्ट बना रहा है, तो हमने सोचा कि हम भी ऐसा लिस्टिकल बनाएं जिसमें हम उन संख्याओं का ज़िक्र करें जिनका 2018 में खूब चर्चा रहा. वो संख्याएं जिनसे भारत का छोटे से छोटा आर्यभट्ट और बड़े से बड़ा भास्कराचार्य रिलेट कर पाए.

तो दोस्तों हम चुन-चुन कर लाएं हैं छह अलग-अलग फ़ील्ड की ऐसी ही छह संख्याएं -

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#1. 182 (एक सौ बयासी) | इन्फ्रास्ट्रक्चर, टूरिज्म, टेक्नॉलजी, यूनिटी

ये मूर्ति सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी के बीच बनी ये मूर्ति सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी के बीच बनी

31 अक्टूबर, 2018. सरदार पटेल की 143वीं जयंती. पीएम मोदी गुजरात में थे. नर्मदा जिले के सरदार सरोवर बांध के पास साधुबेट टापू पर. देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति का उद्घाटन करने के लिए. इसे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नाम दिया गया.

मूर्ति पांच साल में बनकर तैयार हुई. इससे जुड़े कई भारी-भरकम आंकड़े देश की जनता के ऊपर उछाले गए जैसे मूर्ति को बनने में कितना समय लगा, कितना खर्चा हुआ, कितने ईंट-पत्थर वगैरह लगे. लेकिन जनता ने जिसे आंकड़े को लपक कर कैच किया और दिल में 'कंट्रोल एस' यानी सेव करके रख लिया, वो था इस मूर्ति की ऊंचाई वाला आंकड़ा. यानी 522 फीट या 182 मीटर. और इसे याद रख लेने का कारण था कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की ऊंचाई दुनिया में अभी तक कोई और मूर्ति नहीं छू पाई है. विश्व प्रसिद्ध अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी इससे लगभग आधी यानी 93 मीटर ऊंची है और स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से पहले जो सबसे ऊंची मूर्ति थी, या जो अब सेकेंड नंबर पर है, वो है चीन के स्प्रिंग टेंपल की बुद्ध प्रतिमा, और उसकी हाईट – 128 मीटर यानी 420 फीट.

वैसे 182 के साथ-साथ इस मूर्ति के साथ एक और संख्या का भी चोली दामन का साथ रहा वो थी ‘3,000 करोड़’. क्यूंकि इस मूर्ति को बनाने का खर्च 3,000 करोड़ ही था और इस खर्चे के चर्चे भी पूरे भारत में रहे. लेकिन हमने 3,000 करोड़ के ऊपर 182 को तवज़्ज़ो इसलिए दी क्यूंकि अव्वल तो मूर्ति को बनवाने का खर्च ठीक 3,000 करोड़ न होकर लगभग 3,000 करोड़ था, या स्पेसिफिक होकर बोलें तो 2,989 करोड़ रुपए. साथ ही रिकॉर्ड तो 182 मीटर वाला ही है.

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#2. 2019 (दो हज़ार उन्नीस) | पॉलिटिक्स, धर्म, खेल

संसद. फाइल फोटो. इंडिया टुडे. संसद. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.

2019 हमारी लिस्ट में केवल इसलिए नहीं है कि वो आने वाला वर्ष है. दरअसल राजनैतिक गलियारों में इस साल भविष्य के तीन वर्षों की बातें हुईं -


# 2019 की. भारत के सबसे बड़े लोकतांत्रिक कुंभ के चलते, जो हर पांच साल में एक बार होता है - लोकसभा चुनाव!
# 2022 की, जिस साल भारत की आधी से अधिक योजनाएं पूर्ण हो रही हैं या अगर सरकार के दावों की मानें तो 2022 के बाद भारत ‘वो भारत’ नहीं रहेगा.
# 2024 की. क्यूंकि अगर सब कुछ सही रहा तो 2019 के बाद अगले लोकसभा चुनाव 2024 में होंगे. और यूं 2024 इसलिए चर्चा में रहा क्यूंकि मोदी के समर्थक और कई बार उनके विरोधी भी गाहे-बगाहे कहते रहे हैं कि 2024 तक तो मोदी या कोई तोड़ नज़र नहीं आता, उसके बाद की बात अलग है.

लेकिन हमने इन सभी सालों और संख्याओं में से 2019 को चुना, केवल एक कारण के चलते. और वो कारण है इसकी तुलनातमक प्रसिद्धि. क्यूंकि 2019 जितनी बार और जितनी जगह बोला और सुना गया उसकी तुलना किसी और साल से हो ही नहीं सकती. 2019 ही वो साल है जो देश की राजनीति की दिशा और दशा तय करेगा. 2022 और 2024 के इवेंट्स भी इसी 2019 के इवेंट और परिणाम से तय होंगे.

26 मई, 2014. नरेंद्र मोदी ने देश के 14वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी. वो दौर मोदी का था. मोदी नाम की आंधी ने पूरे देश को अपनी जद में ले लिया था. आंधी जिसका केंद्र यूपी था और बुरी तरह प्रभावितों में शामिल थे कांग्रेस, सपा, बसपा, लेफ्ट और वो सब जो भाजपा के खेमे में नहीं थे. लेकिन अब इस बात को 5 साल होने जा रहे हैं, और अब 2019 में देखना रोचक होगा कि मोदी का कितना जलवा बरकरार है. होने को सेमी-फाइनल की तरह प्रचारित हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनावों के परिणाम, आने वाले लोकसभा चुनावों को और भी इंट्रेस्टिंग बना रहे हैं.

2019 बाकी कुछ सालों से इसलिए भी अलग है कि इस साल, हर 4, 5 और 6 सालों में होने वाली घटनाएं एक साथ होने जा रही हैं – क्रमशः क्रिकेट वर्ल्ड कप, लोकसभा चुनाव और अर्ध कुंभ.

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 #3. 2.5 (टू पॉइंट फाइव) | पर्यावरण, प्रदूषण, स्वास्थ्य, शहर

तस्वीर: फेसबुक तस्वीर: फेसबुक

मेरी लिटरेचर में बहुत रुचि है इसलिए मैं जानता हूं कि पुस्तक मेला 05 जनवरी, 2019 से शुरू होने जा रहा है. हमने बात तो पुस्तक मेले से शुरू की है लेकिन हमारा उद्देश्य बात को कहीं और ले जाना है. दरअसल इस बार के पुस्तक मेले की थीम है पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन.

और पर्यावरण हमारे लिए इतना बोरिंग मुद्दा है कि भारत-पाकिस्तान युद्ध से कहीं बड़ा थ्रेट होते हुए भी वो खबरों पर हाशिए पर ही रहा, और अगर कभी खबर बनता भी तो उसे देखने वाला कोई नहीं था. हम धीमी मौतों से नहीं डरते. हम कार्बन इमिशन से नहीं डरते. हम ग्रीन हाउस इफेक्ट से नहीं डरते. हमें ओज़ोन लेयर में होने वाले छेद से कोई दिक्कत नहीं. हमें ग्लोबल वार्मिंग परेशान नहीं करता, हमें अरावली की खुदाई से दिक्कत नहीं हमें कटते जंगल नहीं दिखते और हमें पीएम 2.5 से कोई लेना-देना नहीं है. वो पीएम 2.5 जिसके चलते साल के कुछ विशेष महीनों में आपको हर दूसरे व्यक्ति के मुंह में मास्क लगा हुआ दिख जाता है. वो पीएम 2.5 जिसके चलते ऑड-इवन शुरू करना पड़ता है. वो पीएम 2.5 जिसकी दिल्ली और कई अन्य शहरों में भारत के पीएम से भी ज़्यादा चलती है.

गुज़ारिश है कि इसे लेकर दो मिनट सोचिए और देखिए कि हम आप निजी तौर पर पर्यावरण और प्रदूषण के एरिया में कितना योगदान कर रहे हैं?

दुनिया से सभी जीव जंतु नष्ट हो रहे हैं. शुद्ध पानी बिकना तो कब का शुरू हो चुका, पिछले कुछ सालों से शुद्ध हवा भी फ्री नहीं रही. एयर प्यूरिफायर और मास्क जैसी चीज़ों के एफएम, टीवी और अख़बारों पर आने वाले विज्ञापन इस बात की ताकीद करते हैं और भविष्य की तो छोड़िए वर्तमान को लेकर भी डर पैदा करते हैं. लेकिन हमें? हमें कोई फर्क नहीं पड़ता!

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#4. 377 (तीन सौ सतहत्तर) | सामाजिक, न्यायिक, सांस्कृतिक

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धारा 377 को लेकर में सुप्रीम कोर्ट ने 06, सितंबर को बड़ा ऐतिहासिक फैसला दिया. उसने कहा कि एलजीबीटीक्यू समुदाय को भी जीने का अधिकार है. इस अधिकार के बिना सारे अधिकार बेतुके हैं. यूं भारत को 157 साल पहले अंग्रेज़ों द्वारा बनाए कानून से बहुत हद तक आज़ादी मिल गई. ये कानून क्या था?

ब्रिटिशर्स के द्वारा सन 1861 में ‘इंडियन पीनल कोर्ट’ में धारा 377 रखी गई. इसके अनुसार –


जो भी स्वेच्छा से किसी भी पुरुष, महिला या पशु के साथ ‘प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ’ (मने अप्राकृतिक तरीके से) शारीरिक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या एक निश्चित अवधि (अधिकतम दस साल) का दंड दिया जाएगा, और दोषी अर्थदंड देने के लिए भी उत्तरदायी होगा.
स्पष्टीकरण – इस खंड में वर्णित अपराध में ‘शारीरिक संभोग’ के लिए ‘प्रवेश’ पर्याप्त है.

अब इसको आसान शब्दों में कहें तो ‘अप्राकृतिक सेक्स‘ अपराध है. अब बच जाती है अप्राकृतिक सेक्स की परिभाषा. तो आपको बताते हैं, सरकार के अनुसार प्राकृतिक क्या है, उसके अलावा सब कुछ अप्राकृतिक.


# 1) यह ‘एक’ पुरुष और ‘एक’ स्त्री के बीच ही हो सकता है साथ
# 2) इस तरह के सेक्स में केवल जननांगों के द्वारा ही सेक्स किया जा सकता है.

यदि इससे थोड़ा भी इधर-उधर हुए तो ‘ग़ैरकानूनी’ होगा.

वैसे इससे पहले भी 2 जुलाई, 2009 को उच्च न्यायालय ने माना कि –


– सहमति से बने समलैंगिक यौन संबंधों के ख़िलाफ़ बना संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है. – धारा 377 समलैंगिकों का अलग से वर्गीकरण करके अनुच्छेद 14 (समानता के मौलिक अधिकार) का भी उल्लंघन करती है. – संविधान के अनुच्छेद 15 का भी धारा 377 के द्वारा उल्लंघन होता है क्यूंकि संविधान का अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार करता है. – धारा 377 इसलिए भी गलत है क्यूंकि ये भारतीय नागरिकों के ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ पर भी चोट करती है. (उदाहरण स्वरूप  धारा 377 के चलते गे, लेस्बियन आदि आपस में संबंध नहीं बना सकते इसलिए उन्हें ‘कंडोम’ नहीं दिए जा सकते, और इसलिए एसटीडी रोगों के होने का खतरा बना रहेगा.)

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# 5 – 0 (ज़ीरो) | फिल्म, बॉलीवुड, पेज 3, एंटरटेनमेंट

दोनों ही फिल्में धड़ाम! दोनों ही फिल्में धड़ाम!

ज़ीरो. ये शाहरुख़ खान की मूवी का नाम था. साल ख़त्म होते-होते इस मूवी ने एक बात प्रूव की. बल्कि प्रूव तो ‘रेस थ्री’ और ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ ने पहले की कर दी थी, इसने उसको और ज़्यादा पुष्ट किया. और वो बात ये थी कि – बिना कंटेंट के बड़े से बड़ा प्रोजेक्ट ज़ीरो है.

कितना बड़ा इत्तेफाक है कि शाहरुख़, सलमान, आमिर या जिन्हें खान तिकड़ी के रूप में भारत ही नहीं पूरी दुनिया में शौहरत हासिल है, इस साल अपनी-अपनी कम से कम एक फिल्म लेकर आए, और तीनों ही फिल्मों को पहले क्रिटिक्स फिर दर्शकों ने सिरे से ख़ारिज कर दिया.

तो ये साल जो शुरू ज़ीरो के टीज़र से और अंत ज़ीरो के फ्लॉप होने पर हुआ, बहुत कुछ सिखा गया. दर्शकों को नहीं फिल्म बनाने वालों को. 'अंधाधुन', 'बधाई हो', 'तुम्बाड' और 'राज़ी' जैसी फ़िल्मों ने या तो क्रिटिक्स की वाहवाही बटोरी या टिकट खिड़की से पैसा या फिर दोनों. इन सबमें क्या कॉमन था? खान त्रयी? नहीं! 200 करोड़ का बजट? नहीं! यश राज जैसे बड़े-बड़े बैनर? नहीं! फ़िल्मी भाषा में कहें तो केवल तीन चीज़ें कॉमन थीं – कंटेंट, कंटेंट और कंटेंट!

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# 6 – 1984 (उन्नीस सौ चौरासी) | इतिहास, अपराध, न्याय

84 के दंगों में गिरीश सहगल नौ साल के थे. एक नौ साल के बच्चे ने एक सिख के पीछे हत्यारी भीड़ को दौड़ते हुए देखा था. फिर अपने पिता को भी देखा, जिन्होंने भीड़ के खिलाफ खड़े होकर उस सिख की जान बचाई. गिरीश ने जो देखा, उन्हें सब याद है. उन्होंने ख़त लिखकर हमसे वो यादें साझा की हैं (फोटो: इंडिया टुडे) 84 के दंगों में गिरीश सहगल नौ साल के थे. एक नौ साल के बच्चे ने एक सिख के पीछे हत्यारी भीड़ को दौड़ते हुए देखा था. फिर अपने पिता को भी देखा, जिन्होंने भीड़ के खिलाफ खड़े होकर उस सिख की जान बचाई. गिरीश ने जो देखा, उन्हें सब याद है. उन्होंने ख़त लिखकर हमसे वो यादें साझा की हैं. हमने उस स्टोरी का लिंक और यूट्यूब वीडियो अपनी इस स्टोरी में दिया है. (फोटो: इंडिया टुडे)

अंग्रेज़ी में कहावत है – जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड.

इसकी ही उलटी कहावत हिंदी में है - देर आयद, दुरुस्त आयद

अब 17 दिसंबर, 2018 को आए फैसले के बारे में इनमें से कौन सी बात सच है, ये 1984 के पीड़ित ही हम-आपको अच्छे से बता सकते हैं. बहरहाल ठीक उस दिन जब कांग्रेस तीन राज्यों में हासिल जीत की खुशियां मना रही थी उसके लिए सर-दर्द करने वाली खबर आई. कांग्रेसी नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार को 1984 दंगों के केस में सज़ा मिली. सजा दिल्ली हाईकोर्ट ने दी. उम्रकैद. उन्हें 31 दिसंबर तक सरेंडर करने को कहा. कोर्ट ने उन्हें हत्या के लिए प्रेरित करने, दंगे भड़काने के और आपराधिक साजिश के आरोप में दोषी पाया.


1947 की गर्मियों में बंटवारे के वक्त कई लोगों की हत्या हुई थी. उसके37 साल बाद दिल्ली में ऐसी ही घटना घटी. आरोपी राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाकर सुनवाई से बच निकले.

यूं 37 साल बाद एक घटना के दोहराव का फैसला अगले 34 साल बाद आया. हमारे एक पाठक हैं- गिरीश सहगल. 1984 के सिख-विरोधी दंगों के समय गिरीश नौ साल के थे. उन्होंने सज्जन कुमार के खिलाफ आए फैसले पर हमारा प्रोग्राम देखकर हमें एक मेल भेजा. मेल काफी इमोशनल करता है. अंत में वो लिखते हैं –


35 साल बाद फैसला आया. एक केस का. एक आदमी का. अच्छा महसूस करने की जगह मैं शर्मिंदा हो रहा हूं.

उसका पूरा वीडियो आप हमारे यू ट्यूब चैनल पर देख सकते हैं और स्टोरी का लिंक ये रहा. हम हाइली रेकमंड करेंगे कि आप वो वीडियो देखें या मेल पढ़ें –


उस आदमी का लल्लनटॉप को ईमेल, जिसने 9 साल की उम्र में सिख विरोधी दंगे देखे

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद शुरू हुए सिख विरोधी ऑर्गेनाइज़ दंगे. ये वही दंगे हैं जिनको भाजपा और भाजपा समर्थक गाहे-बगाहे कांग्रेस और कांग्रेस समर्थकों को चुप करने के लिए यूज़ करती है – ‘तब कहां थे जब 1984 हुआ था?’

31 अक्टूबर, 1984 की शाम तक इंदिरा गांधी की मृत्यु की खबर कन्फर्म हो गई और पूरे भारत में फैल गई थी. शाम को ही राजीव गांधी को आनन-फानन में प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई. एम्स, जहां इंदिरा ले जाई गईं थीं, के बाहर उनके और कांग्रेस समर्थकों की भीड़ इकट्ठा हो गई. वो नारे लगा रहे थे – ‘खून के बदले खून’. ये भीड़ उग्र हो चली थी. एम्स के आस पास काफी हिंसा हुई. लेकिन बाकी दिल्ली और बाकी भारत शांत बना रहा.

लेकिन एक नवंबर की सुबह सिख समुदाय के लिए कहर बनकर आई. उस वक्त मोबाइल और इंटरनेट नहीं था लेकिन पिछली रात अफवाह फैला दी गई थी कि सिख इंदिरा गांधी की हत्या को सेलिब्रेट कर रहे हैं. नाच गा रहे हैं. सुबह आठ से दस के बीच में देशव्यापी सिख हत्याओं को अंजाम दिया गया.

लेकिन दिल्ली में सिखों के खिलाफ़ आक्रोश का कुछ ज़्यादा ही असर था, ख़ास तौर पर यमुना पार के – मंगोलपुरी, त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी जैसे इलाकों में.

सिख संप्रदाय के धार्मिक प्रतीकों को क्षति पहुंचाई जाने लगी. ट्वेंटी ईयर ऑफ़ इंप्यूनिटी नाम की किताब के अनुसार – सरकारी बसों का उपयोग दंगाइयों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाने लगा था. पुलिसवालों का नाकारापन बढ़ के दंगाइयों की सहायता करने के स्तर तक जा पहुंचा था. अगर सिख अपने बचाव के लिए कहीं इकट्ठा होते तो ये पुलिसवाले उनके हथियार ले लेते और घर वापस भेज देते, ताकि ये अपनी सुरक्षा न कर सकें. कई बार तो इन्होंने भी दंगे और हत्याओं को अंजाम दिया.

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 # बोनस - 2 (दो) | मिसलेनियस

दीवाली पर पटाखे न फोड़ने की गुज़ारिश करने वाली प्रियंका ने अपनी शादी में थोक के भाव पटाखे जलाए. दीवाली पर पटाखे न फोड़ने की गुज़ारिश करने वाली प्रियंका ने अपनी शादी में थोक के भाव पटाखे जलाए.

नहीं! इस संख्या को बोनस कहने का कारण कोई गिमिक नहीं है क्यूंकि जहां लिस्ट में 5 थे वहां 6 हो जाते तो क्या ही हो जाता? लेकिन इसे लिस्ट से अलग रखते हुए भी लिस्ट में शामिल करने का कारण ये है कि संख्या 2 प्रत्यक्ष रूप से न्यूज़ का हिस्सा नहीं रही, लेकिन इसके कई रूप हमें गाहे बगाहे देखने को मिले. जैसे

# दोहरा-पन - इसके उदाहरण में हम उन नेताओं या सेलेब्रिटीज़ की बात कर सकते हैं जो अपने लिए कुछ और मानक लेकर चलते हैं और बाकियों के लिए और. ऐसे कई लोग अबकी खबरों में छाए रहे. प्रियंका चोपड़ा की शादी तो याद ही होगी, जिसमें उन्होंने जमकर पटाखे फोड़े, तब जबकि कुछ महीने पहले दीवाली में उन्होंने लोगों से पटाखे न फोड़ने की अपील की थी क्यूंकि उन्हें अस्थमा था. सभी नेता भाषा की दुहाई देते रहे और खुद वो सब कहते रहे जिनको यहां पर लिखने बैठेंगे तो पोस्ट लिखते-लिखते 2019 भी बीत जाएगा. आसाराम जैसे कथित बाबाओं का दोहरापन इसी का एक और उदाहरण ठहरा.

# द्वेत या बायनरी – हमने देश, उसकी राय और टोटल समाज को दो पाटों में बांटना तो कबका सीख लिया था लेकिन साल 2018 इसपर विशेषज्ञता पाने का रहा. और बायनरी भी बड़े मज़ेदार. ये समझने में तो फिर भी समय लग सकता है कि हर गैर-देशभक्त देशद्रोही नहीं हो सकता. लेकिन इस साल तो हमारे लिए ये समझना भी मुश्किल हो गया कि इंडियन गवर्नमेंट की आलोचना करना पाकिस्तान का हितैषी होना नहीं होता. अभी की असहिष्णुता पर बोलने का अर्थ 1984 या 2002 का समर्थन करना नहीं होता. दीवाली पर पटाखों के विरोध करने को बकरीद की क़ुरबानी से ‘इक्वलाइज़’ नहीं किया जा सकता और इस सरकार का विरोध करने का अर्थ वामपंथी होना नहीं होता. हमें याद रखना चाहिए कि जीवन दो के कहीं बीच में है. न वो नॉर्थ पोल में है न वो साउथ पोल में. हमें ये याद रखना चाहिए कि जब बुद्ध एक्सट्रीम में जीकर थक गये तो उन्होंने मध्यमार्ग अपनाकर ही निर्वाण को प्राप्त किया. और परफेक्ट ब्लैक और परफेक्ट वाइट तो अभी तक लेबोरेटरी में भी नहीं बने हैं.

# दूसरा विकल्प – अबकी साल हमने विकल्पों की खोज में आधे से अधिक राजनैतिक विमर्श को बेज़ा कर दिया. ज़्यादा क्या कहें, उत्तर यही है कि आज से 2 लोकसभा चुनावों पहले जब इंडिया शाइनिंग कर रहा था और पूरे भारत में फील गुड फेक्टर था तब भी स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी का कोई विकल्प नज़र नहीं आ रहा था. याद रखना चाहिए कि वैक्यूम अपनी तरफ को खुद ब खुद विकल्प खींच लेता है.


इफ्तदा ए उन्नीस है, रोता है क्या, आगे-आगे देखिए....

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वीडियो देखें:

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