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लेस्बियन पॉर्न देख जो आनंद लेते हैं, उन्हें 377 पर कोर्ट के फैसले से ऐतराज है

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मैं एक औसत भारतीय पुरुष हूं. मुझे पॉर्न देखना बहुत पसंद है. घरवालों से छिपकर, बहन से बचकर, प्रेमिका के सामने अनजान बनकर, मुझे अपने सीक्रेट वॉट्सऐप ग्रुप पर पॉर्न क्लिप्स की अदला-बदली सबसे प्रिय है. मुझे बहुत आनंद आता है, जब पॉर्न वीडियो में एक औरत दूसरी के स्तन दबाती है, उसके कपड़े उतारती है. घर पे पति नहीं होता तो पड़ोसन से काम चला लेती है. कितना मज़ा आता, जो औरतें मेरे सामने एक-दूसरे को निर्वस्त्र कर रही होतीं.

PP KA COLUMN

लेस्बियन पॉर्न से बोर हो भी जाऊं, मगर स्ट्रेट पॉर्न से मैं कभी बोर नहीं होता. महिला को झुकाकर उसकी चीखें निकलवाना, महिला को पुरुष को ब्लो जॉब देते हुए देखना मुझे सबसे ज्यादा आनंदित करता है? मुझे आनंदित करता है जब किसी वीडियो में कोई पुरुष जबरन किसी लड़की को थप्पड़ मार उसे चूम लेता है या मेरे पास आई वॉट्सऐप क्लिप में जबरन दो पुरुष महिला को खेत में ले जाकर उसका बालात्कार कर रहे होते हैं.

मैं एक औसत भारतीय पुरुष हूं और ये सभी अप्राकृतिक चीजें देखना मुझे बेहद सुख देता है. अप्राकृतिक इसलिए, क्योंकि सेक्शन 377, जिसके तहत समलैंगिकता अवैध थी, कहता था कि केवल ‘प्राकृतिक’ सेक्स ही वैध है. वो प्राकृतिक सेक्स, जिसमें न ओरल सेक्स शामिल है, न एक महिला का दूसरी महिला को निर्वस्त्र करना. मैं औसत भारतीय पुरुष जब अपनी मोबाइल की स्क्रीन पर इन अप्राकृतिक चीजों के मज़े ले-लेकर थक जाता हूं, तो ट्विटर पर लिखता हूं कि समलैंगिकता अपराध है.

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जिस औसत भारतीय पुरुष की मैं बात कर रही हूं, वो मुझे इस वक़्त पढ़ रहा है. शायाद अबतक एकाध गालियां भी पोस्ट कर चुका होगा. मुझे वेश्या कहा होगा, कुतिया कहा होगा, कुछ न समझ आ पाने की हालत में मोटी भैंस. मगर मेरा क्या है. मैं तो एक बातूनी औरत हूं. मेरे साथ तो ये रोज होता है. मेरे साथ काम करने वाली लड़कियों के साथ रोज होता है. हम औरतों के पास कुछ खोने को नहीं है. इज्ज़त हुआ करती थी. पर जबसे इस तरह अपनी राय लिखने का निर्णय लिया, वो भी जाती रही.

पर तुम्हारे पास बहुत कुछ है खोने को. और उस दिशा में एक कदम बढ़ाने में सुप्रीम कोर्ट ने मदद की है. समलैंगिकता को अपराध के दायरे से हटा लिया है. मैंने देखा तुमने क्या-क्या लिखा. किस तरह के चुटकुले बनाए.

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समलैंगिकता के अपराध के दायरे से बाहर होने पर ऐसा लगा, जैसे देश का सबसे कुरूप चेहरा बाहर आ गया हो. फैसला सुनाते वक चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि संवैधानिक नियम, आम जनता के इमोशंस को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जा सकते. ऐसा उन्होंने किसलिए कहा था, ये आम जनता के चुटकुले देखकर समझ आता है. आम जनता के इमोशन देखिए.

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हां मुझे पता है कि आप कहते हैं कि समलैंगिकता के वैध होने से आपके कल्चर को नुकसान होता है. आप कहते हैं कि सृष्टि कैसे आगे बढ़ेगी. मगर मुझे पता है आपको सृष्टि के नष्ट होने से घंटा फर्क नहीं पड़ता. पड़ता होता तो आप आज जनसंख्या के बढ़ने पर चिंता व्यक्त कर रहे होते. अगर आपको फर्क पड़ता तो धरती को प्रदूषण से बचाने के लिए आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर रहे होते. आप पॉलिथीन का प्रयोग बंद कर देते. अगर आपको संस्कृति की परवाह होती तो आप रेप वीडियो न देख रहे होते.

आपको परवाह है सिर्फ अपनी सत्ता खोने की. ऐसा इतिहास में कम होता है कि कानूनी तौर पर आपकी सत्ता पर प्रहार किया जाए.

मगर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा किया है. आपको डर है, कि एक जेंडर-नॉर्मल पुरुष या स्त्री होते हुए अब आपकी बात का वजन किसी समलैंगिक की बात से ज्यादा नही आंका जाएगा. आपको डर है कि पुरुष प्रधान समाज में आपको कम-पुरुष और कम-स्त्री कहलाने वाले लोगों के बराबर खड़ा कर दिया गया है. आपको डर है कि जिसे आप प्रेम कहते हैं वो आपकी बपौती नहीं. पहले आपको को महज एक उन्मुक्त औरत डरा सकती थी. मगर अब आपको समलैंगिक भी डरा सकेंगे.

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आपको डर है कि समलैंगिकों को और अधिकार मिल गए तो आप उन्हें गाली न दे सकेंगे, उनका रेप कर उन्हें सड़कों पर न छोड़ सकेंगे. आपको डर है कि आपने जिस सत्ता को सदियों से मुट्ठी में भींच रखा है वो रेत की तरह फिसल जाएगी.

कितनी कमाल की बात है कि जब एक पुरुष के तौर पर आपकी सत्ता पर प्रहार हुआ तो आप अपना राजनैतिक झुकाव तक भूल गए. भाजपाई हों या कांग्रेसी, लेफ्ट हों या राइट, आपने खुलकर समलैंगिकता का मजाक उड़ाया. आपने राहुल गांधी पे चुटकुले बनाए, आपने मोदी पर चुटकुले बनाए. आपको लगा कि आप मोदी और अमित शाह या रामदेव के साथ चुटकुले बनाएंगे तो लोगों से अपेक्षित होगा कि वो हंसें. जिन्होंने इंटेलेक्चुअल होने का चोंगा पहन रखा था, उन्होंने ने भी अपनी कुरूपता दिखाई.

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मैंने देखा किस तरह आपने समलैंगिकों को अधिकार मिलने पर अपने राजनैतिक रंग दिखाए. मैंने देखा किस तरह लेफ्ट विंग ने इस जीत को हथियाया और कहा कि समलैंगिकों के बाद अगली आजादी कश्मीर और बस्तर की होगी. मैंने ये भी देखा कि किस तरह राइट विंग ग्रुप्स ने कहा कि ये ऐतिहासिक फैसला मोदी राज में आया.

आप कुछ भी हो सकते हैं. मगर इस जीत को आप हथिया नहीं सकते. प्राइड परेड में निकल, समलैंगिकों के हक में बोलने का बहाना लेकर अपने राजनैतिक हित साधने वाली स्टूडेंट पार्टी के सदस्य हो सकते हैं. लिबरल दिखने के लिए इस फैसले के सपोर्ट में आप सतरंगी डीपी लगा सकते हैं. मगर इस जीत को आप हथिया नहीं सकते. ये जीत किसी पार्टी की नहीं, एक समुदाय की है. एक समुदाय जो आप नहीं हैं. और आपको कोई हक़ नहीं, इसे अपनी जीत बनाने का. क्योंकि जो व्यक्ति असल में समलैंगिक होते हुए अविश्वास और आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझ रहा है, वो आज भी शर्मिंदगी में कमरा बंद किए अंधेरे में पड़ा हुआ है.

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आप सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वो व्यक्ति उसी अवस्था में पड़ा रहे इसलिए रोज चुटकुले लिख रहे हैं. हंस रहे हैं. व्हाट्सऐप पर मैसेज बढ़ा रहे हैं. मगर अंदर ही अंदर आपकी हवाइयां उड़ी हुई हैं. और जो सतरंगी डीपी लगा रहे हैं, वो इस वक़्त खुद के सवाल करें कि जिस लड़की की शादी के लिए उन्होंने FD बंधा रखी है, तीन-तीन बीमा ले रखे हैं, वो कल आकर आपसे कहे कि वो एक लड़की के प्रेम करती है तो आप क्या करेंगे.


 

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meow: the real meaning of quashing homosexuality on section 377 and twitter reactions

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