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सेक्शन 377 पर सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी जीत के पीछे हैं ये चेहरे

एक लड़की और दूसरी लड़की बस दोस्त हों, जरूरी नहीं. वो लेस्बियन हो सकती हैं.
एक लड़का और दूसरा लड़का बस दोस्त हों, जरूरी नहीं. वो गे हो सकते हैं.
एक लड़का बस लड़की के साथ सेक्स करना चाहे, जरूरी नहीं. वो कभी लड़की, तो कभी लड़का, दोनों तरह के पार्टनर्स के साथ सेक्स करना चाह सकता है. वो हीट्रोसेक्शुअल हो सकता है.
वो नहीं जानती (या फिर बताने में सहज नहीं है) कि उसका सेक्शुअल झुकाव किधर की तरफ है. लड़के की तरफ. या लड़की की तरफ. वो उलझन में है. वो क्विअर हो सकती है.

ये सारी चीजें पहले भी थीं. मगर दबे-छुपे. मगर अब इन्हें छुपाने की जरूरत नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट ने LGBTQ (लेस्बियन, गे, बायसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्विअर) लोगों को उनकी पसंद के मुताबिक जीने का हक दे दिया है. उनकी राह का सबसे बड़ा कानूनी रोड़ा था सेक्शन 377. कोर्ट ने अब ऐसे संबंधों को इससे बाहर कर दिया है. मतलब अब दो वयस्क हो चुके लोग आपसी सहमति से, एक-दूसरे की रजामंदी से संबंध बना सकते हैं. फिर चाहे वो किसी भी लिंग से ताल्लुक रखते हों. और किसी भी लिंग के साथ संबंध बनाना चाहें. पहले सेक्शन 377 को बस कुछ चुनिंदा सेक्शुअल रिश्ते समझ आते थे. चुनिंदा से मतलब, जहां एक योनि हो. और उसके साथ एक लिंग हो. यानी, स्त्री और पुरुष का संबंध. बाकी तरह के सेक्शुअल रिश्ते उसकी नजर में अपराध थे. इसकी नजर में न तो समलैंगिकों की सेक्शुअल चाह के कोई जगह थी, न ही हेट्रोसेक्शुअल के लिए. इस तरह के तमाम संबंध उसकी नजर में ‘अस्वाभाविक’ और ‘गैर-कुदरती’ थे.

6 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, उसके बाद ऐसे तमाम रिश्तों को संवैधानिक स्टेटस मिल गया है. इस फैसले के पीछे कई तारीखों का इतिहास है. एक लंबी कानूनी लड़ाई है. और कई लोग हैं. वो लोग, जिन्होंने LGBTQ के अधिकारों के लिए कोर्ट में मुकदमा लड़ा. याचिकाएं डाली. याचिकाएं डालने वाले कुल 35 लोग थे अदालत के सामने. ये कौन लोग हैं, क्या करते हैं, इस हिस्ट्री बनाने के लिए इन्होंने क्या कुछ किया? इनमें से कुछ चर्चित लोगों के बारे में हम आपको बता रहे हैं.

इंदिरा जयसिंह सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं. इन्होंने आनंद ग्रोवर के साथ मिलकर 'लॉयर्स कलेक्टिव' नाम का संगठन बनाया. जून 2016 में गृह मंत्रालय ने विदेशी फंड लेने से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन पर 'लॉयर्स कलेक्टिव' को छह महीने के लिए सस्पेंड कर दिया था.
इंदिरा जयसिंह सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं. इन्होंने आनंद ग्रोवर के साथ मिलकर ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ नाम का संगठन बनाया. जून 2016 में गृह मंत्रालय ने विदेशी फंड लेने से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन पर ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ को छह महीने के लिए सस्पेंड कर दिया था.

1. लॉयर्स कलेक्टिव
ये एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) है. इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर ने मिलकर इसकी शुरुआत की. शुरुआत में ये लोग मजदूरों के अधिकारों से जुड़े केस लड़ते थे. फिर इन्होंने पर्यावरण से जुड़े मामले देखने भी शुरू किए. फिर औरतों के हक के लिए भी लड़ने लगे. यूं ही 2001 में लॉयर्स कलेक्टिव (LC) ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका डाली. इसमें सेक्शन 377 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था. LC का कहना था कि ये समानता के अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, जिंदगी जीने के हक और निजी स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है. ये याचिका ‘नाज फाउंडेशन’ नाम के एक संगठन की तरफ से फाइल की गई थी. केस दिल्ली हाई कोर्ट से आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. और फिर 6 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, वो तो हमको पता ही है.

2. गौतम यादव
गौतम समलैंगिक हैं. 19 बरस की उम्र में पता चला कि उन्हें एड्स है. ‘हमसफर ट्रस्ट’ नाम का एक एनजीओ है. उसी में प्रोग्राम ऑफिसर हैं गौतम. उन्होंने भी एक याचिका डाली थी अदालत में. बताया था कि किस तरह स्कूल में लोग उनकी हंसी उड़ाते थे. इस वजह से 15 साल की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा. फिर गे होने की वजह से लोग उनकी बेइज्जती करते. उनके रिश्तेदार तक उनका अपमान करते. लोग उनका माखौल उड़ाते. गौतम ने सोचा कि उन्हें जो झेलना पड़ा है, वो खुद तक नहीं रखना चाहिए. बताना चाहिए कि अलग तरह के सेक्शुअल झुकाव वाले लोगों के साथ लोग कितनी बदसलूकी करते हैं.

नवतेज सिंह जौहर भारतनाट्यम डांसर हैं. 2014 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड मिला था. सुनील मेहरा, इनके पार्टनर पत्रकार रहे हैं.
नवतेज सिंह जौहर भारतनाट्यम डांसर हैं. 2014 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड मिला था. सुनील मेहरा, इनके पार्टनर पत्रकार रहे हैं.

3. सुनील मेहरा-नवतेज जौहर
सुनील पेशे से पत्रकार थे. नवतेज डांसर. दोनों एक-दूसरे से अलहदा. मगर दोनों के बीच मुहब्बत है, जो उन्हें आपस में जोड़ता है. सुनील शायद आज की तारीख में ब्यूरोक्रैट होते. उन्होंने शुरुआती परीक्षा पास कर ली थी. मगर फिर वो मेन्स के लिए बैठे ही नहीं. उन्हें लगा कि समलैंगिक होने की वजह से शायद नौकरी में उन्हें परेशानी आएगी. क्योंकि तब समलैंगिकता कानूनन अपराध थी. करीब 20 सालों से ये दोनों एक-दूसरे के साथ हैं. साथ ही रहते भी हैं. मगर एक स्त्री-पुरुष वाले जोड़े की तरह उनके पास खुद को कपल कहने का हक नहीं था. LGBTQ लोगों के साथ क्या होता है, इसका फर्स्ट-हैंड अनुभव इनके पास था. इसी अनुभव को साथ लेकर दोनों ने समलैंगिक अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू की. फिर दोनों ने साथ मिलकर सेक्शन 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली. ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्डियन’ को दिए इंटरव्यू में सुनील मेहरा ने कहा-

मैं 63 साल का हूं. हमने अपनी जिंदगी जी ली है. हमारा संघर्ष उन लोगों के लिए था, जिनके पास हमारे जैसी जिंदगी, हम जैसी सुविधाएं, शिक्षा, पैसा और संपर्क नहीं है. ताकि वो अपनी जिंदगी खुशहाली में जी सकें. ताकि उन्हें छुपकर न रहना पड़े. जलील न होना पड़े.

4. मेनका गुरुस्वामी
पेशे से वकील मेनका ऑक्सफर्ड से पढ़ीं. हावर्ड लॉ स्कूल से ग्रैजुएट हुईं. फिर न्यू यॉर्क की एक लॉ फर्म में मानवाधिकार वकील बन गईं. न्यू यॉर्क लॉ स्कूल में पढ़ाया भी उन्होंने. IIT के कुछ छात्रों ने जब कोर्ट में सेक्शन 377 के खिलाफ याचिका दायर की, तो उनकी तरफ से दलील देने की जिम्मेदारी मेनका ने ली.

लेस्बियन होने की वजह से रितु ने अपनी जिंदगी में काफी कुछ झेला है. उन्हें लोगों के ताने सुनने पड़े. उन्हें नीचा दिखाया गया. जलील किया गया. उन्होंने अपनी याचिका में लिखा था कि हालात इतने खराब हैं कि परिवार के कार्यक्रमों या सोशल फंक्शन्स में वो अपनी पार्टनर के साथ नहीं जा पाती हैं.
लेस्बियन होने की वजह से रितु ने अपनी जिंदगी में काफी कुछ झेला है. उन्हें लोगों के ताने सुनने पड़े. उन्हें नीचा दिखाया गया. जलील किया गया. उन्होंने अपनी याचिका में लिखा था कि हालात इतने खराब हैं कि परिवार के कार्यक्रमों या सोशल फंक्शन्स में वो अपनी पार्टनर के साथ नहीं जा पाती हैं.

5. रितु डालमिया
कोलकाता में पैदा हुईं. फिर अपना रेस्तरां खोलने के लिए लंदन पहुंच गईं. फिर बहुत कुछ हासिल करके भारत लौट आईं. रितु खुद को लेस्बियन कहती हैं. बताती हैं कि 23 बरस की उम्र में उन्हें एक लड़की से मुहब्बत हुई. उनका परिवार बहुत अमीर, बहुत पुरानी सोच का था. फिर भी रितु ने उन्हें अपने रिश्ते के बारे में बताया. मगर चीजें आसान नहीं थीं. रितु पेशे से शेफ हैं. सेक्शन 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालने वाले लोगों में उनका भी नाम था.

6. केशव सूरी
जून 2016 में फ्लोरिडा के एक नाइटक्लब में गोलीबारी हुई. एक सिरफिरे होमोफोबिक इंसान ने लोगों पर दनादन गोलियां चलाईं और 49 को मार डाला. उसका मकसद LGBTQ लोगों को निशाना बनाना था. केशव का कहना है कि इस घटना के बाद ही उन्हें लगा कि LGBTQ समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव, उनके साथ हो रही बदसलूकियों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए. इसका पहला रास्ता तो कानून की तरफ से ही गुजरता है. इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सेक्शन 377 के खिलाफ याचिका डाली.

अक्काई पद्मशाली भारत की पहली ट्रांसजेंडर हैं, जिन्हें सम्मान के तौर पर डॉक्टरेट की उपाधि दी गई. कर्नाटक सरकार उन्हें 'राज्योत्सव' अवॉर्ड भी दे चुकी है.
अक्काई पद्मशाली भारत की पहली ट्रांसजेंडर हैं, जिन्हें सम्मान के तौर पर डॉक्टरेट की उपाधि दी गई. कर्नाटक सरकार उन्हें ‘राज्योत्सव’ अवॉर्ड भी दे चुकी है.

7. अक्काई पद्मशाली
बहुत संघर्ष किया है इन्होंने अपनी जिंदगी में. सालों तक भीख मांगकर, वेश्यावृत्ति करके अपना गुजारा चलाया है. फिर वो धारा 377 के खिलाफ चल रही मुहिम से जुड़ गईं. LGBTQ में जो T है, उसी ट्रांसजेंडर समुदाय से आती हैं अक्काई. जैसे स्त्री और पुरुष के पास अपनी पहचान है, वैसे ही अब ट्रांसजेंडर्स के पास भी एक अलग जेंडर की पहचान है. इनका सेक्शुअल झुकाव इन्हें धारा 377 के साथ जोड़ देता था. अक्काई ने उमा महेश नाम की एक और ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता और पत्रकारिता की स्टूडेंट सुमा के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में सेक्शन 377 के खिलाफ याचिका दायर की थी.

8. आरिफ जफर
उत्तर प्रदेश की राजधानी है लखनऊ. यहां पर एक NGO है. नाम, भरोसा ट्रस्ट. इसे खड़ा किया है आरिफ ने. धारा 377 के खिलाफ खड़े होने और कानूनी लड़ाई लड़ने की एक बहुत करीबी वजह थी आरिफ के पास. जुलाई 2001 में उन्हें इसी सेक्शन के तहत गिरफ्तार किया गया था. कुल 47 दिन जेल में रहे. खूब पीटा गया. बेइज्जती की गई. खुद को सबके सामने समलैंगिक बताने का खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा. बहुत बदसलूकी हुई उनके साथ. फिर आरिफ ने तय किया. कि जैसा उनके साथ हुआ, वैसा किसी और के साथ न हो. कि LGBTQ लोग भी बाकी नागरिकों की तरह आजादी और सम्मान के साथ जी सकें. इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सेक्शन 377 के खिलाफ याचिका दायर की.

इसके अलावा और भी कई नाम हैं. उनके, जो अदालत पहुंचे. याचिका डाली. कानूनी लड़ाई लड़ी. इनके अलावा और भी कई लोग हैं, जिन्होंने अदालत से बाहर LGBTQ अधिकारों के लिए आवाज उठाई. उनका समर्थन किया. अनगिनत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने सेक्शन 377 की वजह से जिल्लत भुगती. संविधान में हर नागरिक के लिए किए गए बराबरी के वादे के बावजूद गैर-बराबरी के शिकार होते रहे. ढेर सारे ऐसे लोग भी हैं, जो LGBTQ न होकर भी उनके अधिकारों के लिए लिखते-बोलते और महसूस करते रहे. सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन सब लोगों की जीत है. जितना गलत हुआ उसे तो नहीं बदला जा सकता, मगर इन सबके साझा संघर्ष का ये नतीजा हुआ कि अब आगे किसी LGBTQ को जिंदगी जीने के अपने बुनियादी अधिकार से महरूम नहीं रहना पड़ेगा. कम से कम, कानून की नजर में तो उन्हें उनका हक मिल ही गया है. बाकी रहा समाज, तो जैसे ये दिन आया है वैसे ही एक दिन समाज की भी आंखें खुल जाएंगी. शायद थोड़ा वक्त लगे, शायद ज्यादा वक्त लगे, मगर ऐसा होगा जरूर.


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