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तनुश्री-नाना मसले पर अमिताभ बच्चन ने ये बात कहकर अपना दोहरापन साबित कर दिया

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‘मैं न नाना पाटेकर हूं न तनुश्री दत्ता. मैं कैसे कमेंट करूं.’ जब अमिताभ बच्चन से तनुश्री दत्ता से नाना पाटेकर के हाथों यौन शोषण के आरोप पर टिप्पणी मांगी गई, तो ये उनका जवाब था. इस जवाब ने उन सभी लड़कियों को चौंकाया है जिन्होंने अमिताभ बच्चन की बतौर एक्टर और बतौर शख्सियत इज्ज़त की है.

PP KA COLUMN

पर सचमुच इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि ये इस तरह का पहला वाकया नहीं है. पिछले साल जब प्रियंका चोपड़ा PM मोदी से मिली थीं और उन्हें उनकी ड्रेस के लिए ट्रोल किया गया था जिसमें उनकी टांगें दिख रही थीं, तब भी अमिताभ बच्चन ने हूबहू सेम शॉट खेला था. ‘न मैं प्रियंका हूं, न PM मोदी, तो मैं कैसे टिप्पणी करूं. ये उनके शब्द थे.

पीएम मोदी के साथ प्रियंका चोपड़ा की विवादित तस्वीर. जिसमें लोग प्रियंका की टांगों के ऊपर नहीं बढ़ पा रहे थे क्योंकि उन्हें लगा ये मोदीजी का अपमान है.
पीएम मोदी के साथ प्रियंका चोपड़ा की विवादित तस्वीर. जिसमें लोग प्रियंका की टांगों के ऊपर नहीं बढ़ पा रहे थे क्योंकि उन्हें लगा ये मोदीजी का अपमान है.

ये वही अमिताभ बच्चन हैं, जिन्होंने पिंक फिल्म के प्रमोशन के दौरान अपनी पोती और नातिन को ख़त लिखते हुए कहा था कि तुम्हारी स्कर्ट की लंबाई से तुम्हारे चरित्र को नहीं नापा जा सकता. मगर उनकी ही बिरादरी की प्रियंका चोपड़ा की स्कर्ट की लंबाई से उन्हें पूरा देश जज कर रहा था, तो अमिताभ बच्चन चुप्पी साध गए. ये रहा अमिताभ का वायरल ख़त:

मगर ‘नो कमेंट्स’ कहना एक बात है. और अपनी चुप्पी को जस्टिफाई करते हुए नया ट्वीट दागना वैसा है, जैसा मल करने के बाद उसमें धेला मारकर उसे छितरा दिया जाए. लगता है आप असहज हो रहे हैं. अमिताभ बच्चन और मल एक ही वाक्य में अच्छा नहीं लगता. वहीं किसी एक्ट्रेस का यौन शोषण बिलकुल नॉर्मल लगता है.

अमिताभ बच्चन का ट्वीट जो कहता है कि उनसे सवाल पूछने वाले ही कमअक्ल हैं.
अमिताभ बच्चन का ट्वीट जो कहता है कि उनसे सवाल पूछने वाले ही कमअक्ल हैं.

मैं इस बात से सहमत हूं कि जब हमारे पसंदीदा एक्टर्स पर इस तरह के आरोप लगते हैं, हमें बुरा लगता है. हम उनपर विश्वास नहीं करना चाहते. जब मॉर्गन फ्रीमन पर पत्रकार क्लो मेलस ने यौन अभद्रता का आरोप लगाया था, मुझे बहत धक्का लगा था. हम सबने मॉर्गन को ऑस्कर के लिए 5 बार नॉममिनेट हो चुके, और इस अवॉर्ड को जीत चुके उम्रदराज एक्टर के तौर पर जाना था. आखिर दुनिया को बचाने वाले बैटमैन के लिए दिव्य हथियार बनाने वाला लुसियस फॉक्स किसी औरत का यौन शोषण कैसे कर सकता है. 80 साल का वृद्ध किसी का यौन शोषण कैसे कर सकता है. फिर देखा मॉर्गन फ्रीमन की नीयत दिखाता वीडियो:

मगर सच ये है कि कर सकता है. बिरादरी के सबसे इज्जतदार लोग भी पत्नियों को पीटने और अपनी जूती के नीचे दबाकर रखने वाले निकल सकते हैं. सच ये है कि हमारे डॉक्टर, हमारे टीचर, सरकारी अफसर से लेकर इंडस्ट्री के सबसे बड़े एक्टर तक, सभी यौन शोषण कर सकते हैं. हमारे रिश्तेदार कर सकते हैं. हमारे पिता और हमारे भाई कर सकते हैं. क्योंकि जो पुरुष यौन शोषण करते हैं वो किसी के पिता, बेटे और भाई ही होते हैं. यौन शोषण कोई भी कर सकता है क्योंकि किसी की डिग्री, ज्ञान, उम्र और सफलता ये तय नहीं करती कि वो औरतों को अपने जीवन में किस तरह ट्रीट करता है.

उससे भी बड़ी बात, एक समाज के तौर पर हमें फर्क नहीं पड़ता कि किसी पुरुष को महान बनाने के पहले हम सोचें कि उसने अपने जीवन में महिलाओं को कैसे ट्रीट किया है. आम परुष तो छोड़िए, हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि जो धार्मिक कहानियां हमें सुनाई जा रही हैं, भले ही वो किसी भी धर्म की हों, औरतों को पापिनी, पिशाचिनी दिखाती हैं. फिर भी हम उन्हें महान मानकर उनका पालन करते हैं.

हमें सेक्सिस्ट सिनेमा दिखाया जाता है और हमसे उम्मीद की जाती है कि हम उसका डायरेक्शन देखें, उसकी स्टोरी, स्क्रिप्ट, म्यूजिक देखें. और उसमें हुए औरतों के ट्रीटमेंट को इग्नोर कर दें, क्योंकि बाकी सब तो अच्छा है. ‘प्यार का पंचनामा’ जैसी फ़िल्में भी अच्छी हैं क्योंकि वे फनी हैं. उसमें औरत को झूठी, मक्कार डायन दिखाया जा रहा हो तो क्या फर्क पड़ता है. ये बात महज ‘प्यार का पंचनामा’ की नहीं. बॉलीवुड के पूरे इतिहास में, मुट्ठीभर फिल्मों को छोड़कर, हीरो हमेशा पुरुष रहा है और औरत उसके जीवन का बस एक हिस्सा. और इसने करन जौहर, आदित्य चोपड़ा, सूरज बड़जात्या जैसे ट्रेडिशनल डायरेक्टर्स से लेकर अनुराग कश्यप जैसे ऑफबीट नामों को महान बनाया है. बिना इस बात पर सवाल उठाए कि उनके सिनेमा में औरतें कहां हैं.

'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी ऐतिहासिक फिल्म में रोमैंस का आइडिया: हीरो हिरोइन के मुंह पर उसकी ब्रा डालकर दोस्ती कर सकता है.
‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म में रोमैंस का आइडिया: हीरो हिरोइन के मुंह पर उसकी ब्रा डालकर दोस्ती कर सकता है. हम मान सकते हैं कि ये फिल्म पुरानी है और तब डायरेक्टर इतने अवेयर नहीं थे. ये शिकायत नहीं, सिनेमा के इतिहास का दूसरा पहलू भर है. 

बॉलीवुड और मराठी सिनेमा के महान नाम नाना पाटेकर ने यौन शोषण किया है या नहीं, ये बाद का मसला है. पहला मसला ये है कि जब कोई एक्ट्रेस पूरे एक दशक से उस आदमी पर आरोप लगा रही है, आप उसे सुन भी रहे हैं या नहीं. ये बाद की बात है कि इस यौन शोषण का कोई प्रूफ है या नहीं. पहली बात ये हैं कि जब एक एक्ट्रेस अपने साथ हुए अन्याय के बारे में चीख रही है, आप बेनिफिट ऑफ़ डाउट किसे दे रहे हैं. अगर आपको मसले का सच नहीं पता तो आप तनुश्री और नाना, दोनों में से अपना खेमा चुनने के लिए स्वतंत्र हैं. मगर मसला ये है कि आप नाना को चुन रहे हैं क्योंकि आपको लगता है तनुश्री ये पब्लिसिटी के लिए कर रही हैं. आप औरत पर भी भरोसा कर सकते हैं मगर आप पुरुष पर कर रहे हैं क्योंकि आपकी नजर में फेमस पुरुष एक्टर महान है.

नाना पाटेकर मीडिया तनुश्री के आरोप पर हंस पड़े. वहीं ‘हॉर्न ओके प्लीज’ के डायरेक्टर राकेश सारंग ने कहा कि नाना को कुछ करना होता तो सबके सामने क्यों करते. अकेले में करते. पर राकेश जी, वो अकेले में क्यों करते? और कोई भी अकेले में क्यों करेगा जब हमारे यहां पुरुषों को पब्लिक में महिलाओं के स्तन और कूल्हे छूने की इजाज़त है, चलती लड़की का हाथ पकड़ने की इजाज़त है. और फ़िल्में इसे कॉमेडी के नाम से बेचती हैं. लड़की 5 बार थप्पड़ मारेगी, छठी बार में प्यार कर बैठेगी.

कभी स्कैंडल से प्यार करने वाला मीडिया तनुश्री पर विश्वास कर भी ले तो अमिताभ बच्चन जैसे सदी के महानायक चुप्पी साधकर ये दिखा देंगे कि वे निर्दलीय हैं. और जब दुनिया ख़त्म हो रही होगी तब भी वे दूसरों की जान के पहले अपनी रेप्यूटेशन बचाएंगे. ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ अपनी रेप्यूटेशन बचाएंगे.

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