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भारत के LGBTQ समुदाय को धारा 377 से नहीं, इसके सिर्फ़ एक शब्द से दिक्कत होनी चाहिए

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एक आदमी और एक औरत कभी दोस्त नहीं हो सकते.


मैंने प्यार किया‘ के इस फेमस डायलॉग का अर्थ ये है कि एक लड़के और एक लड़की की दोस्ती बढ़ते-बढ़ते प्रेम और/या शारीरिक संबंधों तक पहुंच कर ही दम लेती है. मैं इस बात और इस डायलॉग से इत्तेफ़ाक नहीं रखता क्यूंकि मेरी ढेर सारी अच्छी महिला-मित्र भी हैं और कईयों के साथ तो दोस्ती के दो दशक हुआ चाहते हैं.

बहरहाल ये डायलॉग आज दूसरे कॉन्टेक्स्ट में यूज़ किया है. कॉन्टेक्स्ट ये है कि एक लड़के का लड़की और लड़की का लड़के के प्रति आकर्षित होना बहुत ही सामान्य बात है. इतना कि अधिकतर लोग इस एक बात को ही समाज से लेकर धर्म, राजनीति, साहित्य और दर्शन तक की कसौटी के मान के चलते हैं. पुरुष और स्त्री के बीच का ये रिश्ता प्रेम भी है और यही ‘शरीर की भूख’ भी, जैसा कि ओशो भी कहते थे.

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और अभी हमने स्त्री-पुरुष के इस रिश्ते को समझना और स्वीकारना शुरू ही किया था कि ‘एलजीबीटीक्यू’ नाम का कॉन्सेप्ट हमारी सारी समझ, हमारी सारी स्वीकार्यता की धज्जियां उड़ाने लग गया.

हमारी ‘एक्सपेटेंस’ और ‘पारदर्शिता’ के ऊंचे ऊंचे ट्विन टावर्स इस एक एब्रीविएशन के चलते भरभरा के गिर पड़े. ये कुछ-कुछ यूं था मानो आइन्स्टीन जब अपनी रिलेटिविटी को दोनों थ्योरिज़ दे चुके हों तभी क्वांटम फिज़िक्स अपने पैर जमाने लग जाए. सोचिए उस वक्त के सबसे आधुनिक वैज्ञानिक, दी आइन्स्टीन, कितने रूढ़िवादी लगे होंगे जब उन्होंने क्वांटम फिजिक्स की अनिश्चितताओं को नकारते हुए कहा होगा कि – ईश्वर हमारे साथ ‘जुआ’ नहीं खेल सकता.


# एलजीबीटीक्यू –

तो क्या है ये ‘एलजीबीटीक्यू’ जो समाज के सबसे प्रगतिशील लोगों के गले उतरना भी मुश्किल हो रहा है.

‘एलजीबीटीक्यू’ को जानने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि एक होता है सेक्स (या जेंडर या लिंग) और दूसरा होता है सेक्सुअल-ओरिएंटेशन.

# सेक्स (या जेंडर या लिंग) की बात करें तो तीन तरह के जेंडर हम सभी जानते हैं – पुरुष, स्त्री, नपुंसक. तो यही नपुंसक जिसके लिए भारत में ‘हिजड़ा’ या ‘छक्का’ जैसा शब्द प्रयुक्त किया जाता है, एलजीबीटीक्यू का टी है. ‘टी’ मतलब ट्रांसजेंडर, मतलब नपुंसक. भारत में ‘हिजड़ा’ या ‘छक्का’ एक अपमानजनक शब्द और गाली की तरह प्रयुक्त किया जाता है, जो अपने आप में बहुत ही ज़्यादा असंवेदनशील है.

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परिभाषा के अनुसार बात करें तो ट्रांसजेंडर मतलब कि व्यक्ति शारीरिक रूप से किसी एक लिंग का है और उसकी लैंगिक अभिव्यक्ति दूसरे लिंग की है. जैसे कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से तो स्त्री है, खासतौर पर उसके प्राइवेट पार्ट्स, लेकिन उसके हाव भाव और मानसिक स्थिति पुरुष वाली है. और यूं दो तरह के ट्रांसजेंडर होते हैं. मेल-ट्रांसजेंडर और फीमेल-ट्रांसजेंडर.

# अब अगर सेक्सुअल-ओरिएंटेशन की बात करें तो लड़के-लड़की के बीच के रिश्ते को – स्ट्रेट या हेट्रोसेक्शुअल कहा जाता है. और इसी के चलते ‘मैंने प्यार किया’ का डायलॉग हिट होता है.

लेकिन, लड़की-लड़की और लड़के-लड़के के बीच के प्रेम और/या शारीरिक संबंधों को ‘गे रिलेशन’ और इन लड़के लड़कियों को गे कहा जाता है. हिंदी में इसे समलैंगिक कहा जाता है. और इसी के चलते ‘मुंडा साड्डा डोली चढ़ गया’ गीत हिट होता है. यही गे एलजीबीटीक्यू का ‘जी’ है.

बाद में केवल लड़के-लड़के के बीच के रिलेशन को ही गे कहा जाने लगा और लड़की-लड़की के बीच के रिलेशन को ‘लेस्बियन रिलेशन‘ और इन लड़कियों को लेस्बियन कहा जाने लगा. और यही लेस्बियन एलजीबीटीक्यू का ‘एल’ है.

ऐसे लड़के-लड़कियां जिनके दोनों जेंडर्स के साथ रिश्ते हैं, ‘बाई-सेक्सुअल‘ कहलाते हैं. ये है एलजीबीटीक्यू का ‘बी’.

एलजीबीटीक्यू का ‘क्यू’ है ‘क्युएर‘. क्युएर को समझना थोड़ा मुश्किल है. वो लोग जो अपने सेक्स और/या सेक्सुअल ओरिएंटेशन को लेकर श्योर नहीं हैं या प्रदर्शित नहीं करना चाहते, क्युएर की कैटेगरी में आते हैं या क्युएर कैटेगरी में आना पसंद करते हैं. गे शब्द को समलैंगिको से पहले खुश और चिंतामुक्त लोगों और इसके पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया जाता था. बल्कि अब भी किया ही जाता है. (हैप्पी एंड गे) लेकिन क्युएर एक अपमानजनक शब्द था जिसका अर्थ था – अजीब, अनोखा या सनकी. इसलिए कई-कई जगह क्युएर भी उसी तरह अपमानजनक है जैसे भारत में हिजड़ा.

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तो ये हुआ एलजीबीटीक्यू का डीकंस्ट्रक्शन.


# धारा 377 –

अंग्रेजों से पहले मुगलों का शासन था. और तब धारा 377 नहीं थी. तब ‘जिना’ था.

‘जिना’ एक तरह का अपराध मान लीजिए जिसमें अपनी पत्नी के अलावा किसी से भी शारीरिक संबंध बनाना ग़ैरकानूनी था. उस वक्त की कानून की किताब ‘फतवा-ए-आलमगिरी’ में ‘जिना’ और ‘ग़ैरकानूनी सेक्स’ के बारे में और ऐसे किसी ‘अपराध’ के चलते दिए जाने वाले दंड के बारे में बात की गई थी.

‘फतवा-ए-आलमगिरी’ के हिसाब से ग़ैरकानूनी सेक्स में ‘रेप’ और ‘होमोसेक्सुअलिटी’ दोनों ही कमोबेश एक सरीखे थे. और दंड के रूप में कुछ कोड़ों से लेकर मृत्युदंड तक का प्रावधान था.

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लेकिन ‘जिना’ के अनुसार, चूंकि लड़कियों के पास लिंग नहीं होता इसलिए उनके बीच समलैंगिक रिश्ते को ज़ुर्म नहीं माना जाता था. यानी ‘लेस्बियन’ होना ज़ुर्म न था.

बहरहाल फिर आया ‘राज’. मने ब्रिटिश राज. और 1861 में ‘इंडियन पीनल कोर्ट’ में धारा 377 रखी गई. इसके अनुसार –

जो भी स्वेच्छा से किसी भी पुरुष, महिला या पशु के साथ ‘प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ’ (मने अप्राकृतिक तरीके से) शारीरिक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास या एक निश्चित अवधि (अधिकतम दस साल) का दंड दिया जाएगा, और दोषी अर्थदंड देने के लिए भी उत्तरदायी होगा.

स्पष्टीकरण – इस खंड में वर्णित अपराध में ‘शारीरिक संभोग’ के लिए ‘प्रवेश’ पर्याप्त है.

अब इसको आसान शब्दों में कहें तो ‘अप्राकृतिक सेक्स‘ अपराध है. अब बच जाती है अप्राकृतिक सेक्स की परिभाषा. तो आपको बताते हैं, सरकार के अनुसार प्राकृतिक क्या है, उसके अलावा सब कुछ अप्राकृतिक.

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आसान और महत्तम शालीन भाषा में कहें तो प्राकृतिक सेक्स में दो और केवल दो चीज़ें होना आवश्यक हैं–

# 1) यह ‘एक’ पुरुष और ‘एक’ स्त्री के बीच ही हो सकता है साथ

# 2) इस तरह के सेक्स में केवल जननागों के द्वारा ही सेक्स किया जा सकता है.

यदि इससे थोड़ा भी इधर-उधर हुए तो ‘ग़ैरकानूनी’ होगा.


# तो क्या ये कानून/धारा 377 पूरी तरह से गलत है?

देखिए ऐसा कहना भी अतिश्योक्ति होगा, क्यूंकि अगर आप ध्यान दें तो इस कानून में केवल ‘गे’ और ‘लेस्बियन’ सेक्स की ही बात नहीं की गई है.

1) इस कानून में ‘गे’ और ‘लेस्बियन’ सेक्स की बात की गई है – जो मेरे अनुसार, निश्चित तौर पर गलत है. इसे लागू करने वाली सरकार ने खुद अपने देश, यानी ब्रिटेन में इस तरह के कानून को सत्तर के दशक में ही समाप्त कर दिया था.

2) इस कानून में ‘हेट्रोसेक्शुअल’ सेक्स में शामिल ‘अन्य तरीकों’ की बात की गई है – जिसकी विस्तृत विवेचना करके और ज़्यादा स्पेसिफिक किया जाना चाहिए.

3) इस कानून में जानवरों के साथ सेक्स की बात की गई है – जो मेरे अनुसार कमोबेश उचित ही है.

तो यदि एलजीबीटीक्यू राइट्स की बात हो रही हो तो हमें केवल इसके पहले पक्ष पर ही बात करनी चाहिए.

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लेकिन हम (और बाकी सब भी) धारा 377 और एलजीबीटीक्यू की एक साथ क्यूं बात कर रहे हैं. तब जबकि धारा 377 एलजीबीटीक्यू समूह के केवल कुछ ही सदस्यों को प्रभावित करती है, सबको नहीं?

वो इसलिए क्यूंकि जिस तरह ‘रंगभेद’ के चलते सारे हाशिये में रह रहे लोग इकट्ठा हो गए थे, ‘आर्थिक असमानता’ को लेकर हो गए थे, धर्म, जाति और लिंग को लेकर हो गए थे, होते रहते हैं, वैसे ही धारा 377 के विरोध में ‘सेक्स’ एक कॉमन फैक्टर है. सेक्सुअल ओरिएंटेशन के क्षेत्र में हाशिये में रख दिए गए सारे लोग एक साथ अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं. फिर चाहे धारा 377 एलजीबीटीक्यू समूह के केवल कुछ ही सदस्यों को ही प्रभावित क्यूं न कर रही हो. एक सबके लिए, सब एक के लिए!


# एबीवीए –

एबीवीए मने ‘एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन’ भारत का पहला एड्स जागरूकता अभियान कहा जा सकता है. आज से 27 साल पहले ही इस ग्रुप ने ‘लैस देन गे’ (समलैंगिक से कम) नाम की अपनी रिपोर्ट से एलजीबीटीक्यू के अधिकारों के क्षेत्र में लोकप्रियता हासिल कर ली थी. एबीवीए ने अपनी इस रिपोर्ट के माध्यम से भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त करने की वकालत की थी.

1994 में एबीवीए ने दिल्ली उच्च न्यायालय में धारा 377 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली ‘पहली याचिका’ दायर की थी.


# नाज़ फाउंडेशन –

2009 में सीएनएन ने ‘नाज़ फाउंडेशन’ को उन लोगों और संस्थाओं में से एक माना था जो सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं. ऐसा इसलिए था क्यूंकि नाज़ फाउंडेशन, जो एड्स और अन्य सेक्स जनित रोगों के क्षेत्र में काम कर रही थी, ने धारा 377 के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला लिया था.

नाज़ फाउंडेशन (इंडिया) ट्रस्ट, एक गैर-सरकारी एनजीओ है जिसने 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी. इस लॉसूट में उसने वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को लीगल करने की मांग की. एबीवीए के बाद समलैंगिक संबंधों को लीगल करने को लेकर ये दूसरी याचिका थी. लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका पर विचार करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि याचिकाकर्ताओं के पास इस मामले में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है.

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नाज़ फाउंडेशन उच्चतम न्यायालय गई. समलैंगिक संबंधों को लीगल करने की मांग को लेकर नहीं. इस मांग को लेकर कि हाई कोर्ट उनकी याचिका ‘टेक्निकलटी’ की दुहाई देकर खारिज़ नहीं कर सकती.

फिर उच्चतम न्यायालय ने फैसला किया कि नाज़ फाउंडेशन के पास इस मामले में ‘हस्तक्षेप का अधिकार’ था. और यह कहकर मामले को वापस दिल्ली उच्च न्यायालय में भेज दिया ताकि उच्च न्यायालय इसपर पुनर्विचार कर सके.


# नाको –

नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन या राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आता है.

2006 में नाको ने एक हलफनामा दायर किया जिसमें कहा गया था कि धारा 377 एलजीबीटी अधिकारों का उल्लंघन करती है.


# हाई कोर्ट का फैसला –

बहरहाल, नाज़ वाली याचिका का निर्णय 2 जुलाई, 2009 को दिया गया था. न्यायालय ने माना कि –

– सहमति से बने समलैंगिक यौन संबंधों के ख़िलाफ़ बना संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है.

– धारा 377 समलैंगिकों का अलग से वर्गीकरण करके अनुच्छेद 14 (समानता के मौलिक अधिकार) का भी उल्लंघन करती है.

– संविधान के अनुच्छेद 15 का भी धारा 377 के द्वारा उल्लंघन होता है क्यूंकि संविधान का अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार करता है.

– धारा 377 इसलिए भी गलत है क्यूंकि ये भारतीय नागरिकों के ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ पर भी चोट करती है. (उदाहरण स्वरूप – धारा 377 के चलते गे, लेस्बियन आदि आपस में संबंध नहीं बना सकते इसलिए उन्हें ‘कंडोम’ नहीं दिए जा सकते, और इसलिए एसटीडी रोगों के होने का खतरा बना रहेगा.)

इसी लास्ट पॉइंट के चलते आपने गौर किया होगा कि स्वास्थ्य, एड्स और एसटीडी के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाएं ही धारा 377 के विरोध के लिए सबसे ज़्यादा मुखरित थीं. और आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं – भारत में 7 प्रतिशत समलैंगिक एड्स से पीड़ित हैं.

और हां, जैसा कि हमने डिस्कस किया था कि धारा 377 के कुल तीन आयाम हैं, इसी के चलते अदालत ने भी धारा 377 को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया.


# सुप्रीम कोर्ट का फैसला –

लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर, 2013 को कहा की किसी धारा को जोड़ने, हटाने और मॉडिफाई करने का अधिकार अधिकार संसद के पास है और जब तक यह संसद द्वारा हटाया नहीं जा सकता तब तक यह अवैध नहीं ठहराया जा सकता.

मतलब सिंपल शब्दों में कहें तो – धारा 377 तब तक लीगल और इन-फ़ोर्स रहेगी जब तक संसद कोई परिवर्तन नहीं कर लेती.

इससे ये भी सिद्ध होता है कि सुप्रीम कोर्ट एलजीबीटीक्यू और उनके अधिकारों के ख़िलाफ़ कभी नहीं थी, धारा 377 को ख़ारिज न करने का एक मात्र कारण ‘क़ानूनी पेचीदगियां’ था. और इसे एलजीबीटीक्यू के खिलाफ़ खड़े होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.


# क्यूरेटिव पेटिशन –

अब बॉल संसद/सरकार के कोर्ट में थी.

जेटली ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा कि ये फैसला बदलते हुए वैश्विक परिवेश से मेल नहीं खाता. विधि आयोग ने 377 को हटाने की मांग की. विपक्ष, खास तौर पर कांग्रेस भी इस बात से सहमत थी कि हाई कोर्ट का फैसला, सुप्रीम कोर्ट की तुलना में कहीं बेहतर था.

इस दौरान शशि थरूर दो बार इस धारा को हटाने के प्राइवेट मेम्बर बिल लेकर आए. और दोनों ही बार वोटिंग में हार गए.

एक बार पुनर्विचार करने की ‘नाज़ फाउंडेशन’ की रिक्वेस्ट को खारिज़ कर चुकने के बाद सुप्रीम कोर्ट 2 फ़रवरी, 2016 को पुनर्विचार कर के लिए राज़ी हो गया.

तो सुप्रीम कोर्ट के सामने अब ‘क्यूरेटिव पिटिशन’ है. cure मतलब इलाज. ‘क्यूरेटिव पिटिशन’ मतलब एक फैसला जो किया जा चुका है उसे फिर से करना है. पुराने फैसले को भूल सुधार करते हुए.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कह दिया है कि वो केवल धारा 377 की ‘वैधता’ ‘अवैधता’ पर फैसला लेगी. यानी वही पॉइंट्स जिस पर पिछली बार लिया गया था. और यूं, लिव–इन, समलैंगिकता, उनके बीच शादी जैसे निर्णय पर इस केस के दौरान सुनवाई नहीं होगी.


# एलजीबीटीक्यू क्रांति, प्राउड परेड, रेनबो झंडा और समाज –

कोई अमीर, कोई बुर्जुआ, कोई ‘खाया पिया अघाया’ कभी क्रांति नहीं करता. सामान्यतः वही लोग क्रांति करते हैं जो हाशिये में हैं. जो समाज के सबसे निचले हिस्से से आते हैं. अतीत में स्त्रियों, दलितों, गुलामों से लेकर गरीबों का सड़कों पर इकट्ठा होना इसी बात की ताक़ीद करता है. तो एलजीबीटीक्यू समुदाय की क्रांति या उनका झंडा या उनकी प्राउड परेड इसलिए ही है क्यूंकि वो हाशिये में हैं. स्वीकार्यता से लेकर सम्मान तक की उनकी इस लड़ाई में जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध.

 

जैसे हर क्रांति का होता है, इस क्रांति का भी अपना एक झंडा है, और ये झंडा बड़ा कलरफुल है. हर रंग एक एलजीबीटीक्यू की एक कम्यूनिटी का प्रतिनिधित्व करता है.


# अप्राकृतिक का मतलब क्या है, बंदर से पूछिए –

वैसे जितना धारा 377 को ऊपर जाना है उसमें दिक्कत केवल एक शब्द से है. उस शब्द की बनाई गई परिभाषा से है. और वो है – ‘अप्राकृतिक‘ (दरअसल इसे धारा 377 में ‘against the order of nature’ अर्थात ‘प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ़’ कहा गया है)

बोनोबो जीवित जानवरों में से इंसानों की बनावट के सबसे करीब हैं. यानी ये महत्तम प्राकृतिक इंसान कहा जा सकता है. ये जीव कांगो, मध्य अफ्रीका में कांगो बेसिन के 500,000 वर्ग-किमी क्षेत्र में पाया जाता है.

अब ये बोनोबो हमारी इस कहानी का हीरो इसलिए है क्यूंकि ये जितनी मात्रा में सेक्स करता है उसका 75 प्रतिशत गैर-उत्पादक है. यानी रिप्रोडक्शन के लिहाज़ से ग़ैर-ज़रुरी. तो क्यों करता है फिर? वो आगे बताते हैं पहले एक और इंट्रेस्टिंग बात जान लीजिए – लगभग सभी बोनोबो हेट्रोसेक्शुअल होते हैं. हेट्रोसेक्शुअल मतलब गे, लेस्बियन, स्ट्रेट… सब!

जंतु-वैज्ञानिकों का मानना है कि बोनोबो आपसी तकरार से बचने के लिए और कभी-कभी यदि तकरार या टकराव हो गया तो संधि के लिए भी सेक्स का उपयोग करते हैं. उनकी फिलोसोफ़ी ही है – युद्ध नहीं सेक्स! और यही वो पहला कारण है कि क्यूं,’बोनोबो रिप्रोडक्शन के लिहाज़ से ग़ैर-ज़रुरी’ सेक्स करते हैं. बाकी दूसरा कारण – आनंद तो हम सब जानते ही हैं.

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वो मादाएं, जो अब बच्चा जन्मने में अक्षम हैं; वो नर, जो अभी युवा भी नहीं हुए, बच्चे हैं; और बाकी सारे भी इस सामूहिक उत्सव का हिस्सा होते हैं. बोनोबो बहुत अधिक मात्रा में सेक्स करते हैं, इतना कि इसे अक्सर ‘बोनोबो हैंडशेक’ के रूप में जाना जाता है, और इसमें पुरुषों और महिलाओं दोनों के ही समलैंगिक व्यवहार शामिल हैं.

बोनोबो: द फोगोटेन एप’ के लेखक फ्रानस डी वाल ने नेशनल जियोग्राफिक से एक इंटरव्यू में कहा कि –

इस क्षेत्र मंर (अध्ययन) बहुत दबे-छुपे स्तर पर चल रहा था, क्योंकि लोगों को डर था कि वे इसके बारे में बात करने से परेशान होंगे. चाहे ये एक अच्छी बात हो बुरी, लेकिन मनुष्यों और जानवरों के बीच तुलना नहीं होना कठिन है. यह तथ्य कि ‘समलैंगिकता प्राकृतिक दुनिया में मौजूद है’, उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल हो सकती है जो इस तरह के व्यवहार को अप्राकृतिक मानते हैं.

यानी जो कुछ इन ‘प्राइमेट्स’ (स्तरनपायी प्राणियों में सर्वोच्च श्रेणी के जीव) में चल रहा है वो न केवल प्राकृतिक है, बल्कि मनुष्य के सबसे नजदीक भी है, बल्कि क्रिएटिविटी और विकास के क्रम में सर्वोच्च भी है. कम से कम अध्ययन और सबूत तो यही कह रहे हैं.

और हां! बोनोबो समाज में मादाओं का स्थान बड़ा ऊंचा है. मादाओं और नरों के बीच लड़ाई की स्थिति कम ही आती है. मां और बच्चों का संबंध ता-उम्र बना रहता है. यानी कहीं न कहीं एलजीबीटीक्यू का ‘फेमिनिज्म’ और ‘मातृसत्ता’ से सीधा संबंध है. और अंततः ये तो आप सब जानते ही हैं कि इंसानों के बाद सबसे अक्लमंद जीवों में बंदरों की प्रजातियां या डॉल्फिन्स जैसे ‘प्राइमेट्स’ ही हैं और दोनों ही एलजीबीटीक्यू क्लब के ‘प्राइम कार्ड’ होल्डर्स हैं!

लब्बोलुआब ये कि आप पसंद करें न करें लेकिन गे, लेस्बियन यौन क्रियाएं अप्राकृतिक तो नहीं ही हैं. प्राकृतिक की कोई और परिभाषा हो तो अवश्य बताएं.


# जस्टिस एंड लॉ –

कानून की कोई नैतिक किताब होती तो उसमें ज़रूर लिखा होता – न्याय के चलते अगर नियम और कानून टूटते हैं तो कोई दिक्कत नहीं है.

यूं पूरा समाज न्यायपालिका से उम्मीद रखता है कि वो न्याय को कानून से ज़्यादा प्राथमिकता देगी.


# अंततः –

दी क्लॉकवर्क ऑरेंज‘ फ़िल्म का मुख्य किरदार एक कुख्यात अपराधी है. जेल में है. उसके पास जेल से बाहर निकलने का एकमात्र उपाय है कि वो ऐसे रीहेबिलेटेशन प्रोगाम का हिस्सा बने जो दुर्दांत से दुर्दांत अपराधी को भी सुधार के मुख्य धारा में ले आने का दावा करता है. मुसीबत सिर्फ़ एक है कि इस प्रोगाम को अभी तक किसी पर टेस्ट नहीं किया गया है, और कहानी का मुख्य किरदार पहला ऐसा व्यक्ति होगा जिसपर ये सारा प्रयोग किया जाएगा.

बहरहाल, प्रयोग सफल हो जाता है और बंदा सुधर जाता है. लेकिन अब वो एक ‘क्लॉकवर्क’ भर रह जाता है. क्लॉकवर्क यानी घड़ी के पुर्जों की तरह, किसी रोबोट सरीखा. जिसकी खुद की कोई चाहत या इच्छा नहीं है, लेकिन वो समाज के लिए ‘आदर्श’ है. ये कहानी ‘फ्री विल’ जैसे ‘दार्शनिक मुद्दे’ को बड़े रोमांचक अंदाज़ में प्रस्तुत करती है.

Clockwork

और आज मैं ‘क्लॉकवर्क ऑरेंज’ की बात इसलिए कर रहा हूं क्यूंकि धारा 377 के पक्ष और विपक्ष में खड़े दो लोगों के बीच विवाद सामजिक, धार्मिक, न्यायिक या नैतिक से ज़्यादा दार्शनिक हो चला है. और ये सवाल क्लॉकवर्क ऑरेंज से भी बड़ा और कठिन इसलिए है क्यूंकि ‘क्लॉकवर्क’ की तरह यहां पर अपराध और समाज वाला द्वैत नहीं, निजी और समाज वाला द्वैत है.


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What is IPC section 377 it’s history and relation with LGBTQ

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कुछ तो करना ही होगा गुरु. अधूरा भी तो एक तरह से पूरा है. जानो माजरा भीतर.

ऐसा क्या करें कि हम भी जेएनयू के कन्हैया लाल की तरह फेमस हो जाएं?

कोई भी जो किसी की तरह बना, कभी फेमस नहीं हो पाया. फेमस वही हुआ, जो अपनी तरह बना. सचिन गावस्कर नहीं बने. विराट सचिन नहीं बने. मोदी अटल नहीं बने और केजरीवाल अन्ना नहीं बने.

तुम लोग मुझे मुल्ले लगते हो या अव्वल दर्जे के वामपंथी जो इंडिया को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहते हो

हम क्या हैं. ये पूछा आपने. वही जो आप हैं. नाम देखिए आप अपना.