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31 अक्टूबर, 1984: सलमा ने बालों में गुलाब नहीं लगाया था, सारा देश जान गया कि कुछ बुरा हुआ है

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सलमा सुल्तान दूरदर्शन की कुछ सबसे अच्छी और जानी मानी न्यूज़ एंकर्स में से एक थीं. बाल और कान के बीच एक गुलाब लगाना उनका सिग्नेचर स्टाइल था.

31 अक्तूबर, 1984 को भी शाम के आठ बजे उन्होंने एक न्यूज़ पढ़नी थी. लेकिन तब 17 सालों का एंकरिंग का अनुभव पा चुकीं सलमा के होंठ न्यूज़ पढ़ने से पहले भी कांप रहे थे. ऐसी खबर उन्होंने तो क्या किसी और ने भी तब तक नहीं पढ़ी थी. इस खबर से भारत भर में अराजकता का माहौल फैलने की आशंका थी और ये बात सलमा को पता थी. लेकिन उन्हें इंस्ट्रक्शन थे कि इसे बहुत ज़्यादा स्थिर होकर पढ़ना है. और यूं उन्होंने ये बड़ी खबर ऐसे पढ़ी मानो कोई चैन स्नेचिंग की खबर पढ़ रही हों. मानो खुद भी न सुनना चाहती हों. अबकी न्यूज़ पढ़ते वक्त उनका सिग्नेचर स्टाइल – यानी कान में फूल – भी नदारद था.

बाद में सलमा ने बताया था कि उन्हें नहीं समझ में आ रहा था कि वो कैसे उस न्यूज़ को ब्रेक करेंगी –

आंसू थे जो लगातार बह रहे थे, उसी हालत में कैमरे का सामना किया.

उन्होंने न्यूज़ पढ़ी –

आज सवेरे नई दिल्ली में, प्रधानमंत्री के निवास स्थान पर श्रीमती गांधी की हत्या करने की ‘कोशिश’ की गई, उन्हें तुरंत ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज ले जाया गया. वहां पहुंचते ही डॉक्टरों ने उनका उपचार शुरू कर दिया.

इससे लगभग साढ़े दस घंटे पहले यानी सुबह के लगभग नौ बजकर बीस मिनट की बात है. दो बार ऑस्कर पुरस्कार विजेता और स्टेनली क्यूब्रिक की फ़िल्म ‘स्पार्टाकस’ के एक्टर पीटर उस्तिनोव, एक डॉक्युमेंट्री के लिए इंदिरा गांधी का इंटरव्यू लेने वाले थे और उनसे मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. इंदिरा गांधी, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री अपने घर सफ़दरजंग से अपनी पूरी सिक्यूरिटी के साथ निकली ही थीं.

उस दिन गुलाब गायब था.
उस दिन गुलाब गायब था.

ज़ेड प्लस सिक्यूरिटी वालीं प्रधानमंत्री के लिए अपने निवास स्थान से ज़्यादा सुरक्षित स्थान पूरे विश्व में शायद ही कहीं हो. लेकिन चूंकि अबकी बार सिक्यूरिटी करने वाले ही इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले भी थे इसलिए सबसे सुरक्षित स्थान ही उनकी हत्या का स्थान बना.

‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ की दो आवाज़ों के बीच मशीन गन और पिस्टल की आवाज़ों के शोर से दिल्ली का वो शांत पॉश इलाका दहल गया था.

उनकी हत्या करने वाले थे उनकी ही सिक्यूरिटी में से दो जन – सतवंत सिंह और बेअंत सिंह. सतवंत और बेअंत दोनों ने उनपर एक साथ ओपन फ़ायर कर दिया था. इंदिरा को एम्स ले जाया गया. एम्स में उन्हें दो बजकर बीस मिनट पर मृत घोषित कर दिया गया.

इंदिरा गांधी के प्रमुख सलाहकार राजेंद्र कुमार धवन की मानें तो इंदिरा को पहले ही सूचना मिल चुकी थी कि उनकी सिक्यूरिटी में से दो सिख उनकी हत्या कर सकते हैं.

लेकिन इंदिरा की इस दिलेरी की दाद देनी होगी कि, कहीं जनता में गलत संदेश न जाए इसलिए उन्होंने इस शक को खारिज़ कर दिया. लेकिन इस दिलेरी को कुछ लोग उनकी बेवकूफी भी कहते हैं. क्यूंकि यदि उन्होंने अपनी सिक्यूरिटी में परिवर्तन कर दिए होते तो शायद 31 अक्तूबर, 1984 भारत के इतिहास की काली तारीखों में से एक न होता.

क्या था वो जुनून वो उद्देश्य जिसके चलते इंदिरा गांधी की हत्या हुई?


पहला एपिसोड आप यहां पढ़ सकते हैं - खालिस्तान मूवमेंट: नोट और डाक टिकट छप चुके थे, बस देश बनना बाकी था.
उसके बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार की पूरी रिपोर्ट आप यहां पर पढ़ सकते हैं - ऑपरेशन ब्लू स्टार: स्वर्ण मंदिर पर जब सेना ने की थी चढ़ाई!

# ऑपरेशन वुडरोज़ –

गुलज़ार की फ़िल्म माचिस का एक दृश्य (ये फ़िल्म ऑपरेशन वुडरोज़ को बेहतरीन ढंग से पोट्रेट करती है.)
गुलज़ार की फ़िल्म माचिस का एक दृश्य (ये फ़िल्म ऑपरेशन वुडरोज़ को बेहतरीन ढंग से पोट्रेट करती है.)

तो भिंडरावाले की मौत ऑपरेशन ब्लू स्टार में हो चुकी थी. उसके बाद की कहानी चेन रिएक्शन की तरह चलती है, मतलब पहले वाली घटना के चलते दूसरी और दूसरी के चलते तीसरी और यूं धीरे-धीरे अपनी वर्तमान स्थिति तक पहुंचती है.

ऑपरेशन ब्लूस्टर दरअसल दो ऑपरेशन से मिलकर बना था – ऑपरेशन मेटल और ऑपरेशन वुडरोज़.

ऑपरेशन मेटल दरअसल वो था जो स्वर्ण मंदिर में किया गया था.

ऑपरेशन वुडरोज़ ऑपरेशन ब्लूस्टर के साथ शुरू हुआ और उसी साल यानी 1984 में सितंबर में जाकर ख़त्म हुआ. इस ऑपरेशन का उद्देश्य पंजाब में दंगों और अशांति को रोकना था. उन दंगो और अशांति को रोकना जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के चलते हुई थी. उन दंगो और अशांति को रोकना जो सिखों से सबसे बड़े धर्मस्थल – स्वर्ण मंदिर पर गोलाबारी करने से हुई थी. उन दंगो और अशांति को रोकना जो ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले की भी थी, जिसे खालिस्तान मूवमेंट से जोड़ के देखा जा सकता है.

जिस तरह इमरजेंसी में भारत भर में विपक्ष के ढेरों नेता जेल में डाल दिए गए थे, उसी तरह इंदिरा गांधी ने फिर से विपक्ष के नेताओं और उससे जुड़े लोगों को जेल में डालना शुरू कर दिया था. लेकिन अबकी बार ये केवल पंजाब तक सिमटा था.

इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी

उस समय पंजाब की सबसे प्रो-सिख पार्टी ‘अकाली दल’ थी. यही पंजाब में कांग्रेस की सबसे बड़ी राइवल पार्टी भी थी. कांग्रेस (यानी इंदिरा गांधी की पार्टी) के नेतृत्व में भारत सरकार ने अकाली दल के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. मगर इनके साथ साथ लगभग 1,00,000 अन्य सिखों को भी गिरफ्तार किया गया था.

इस अभियान के दौरान गिरफ्तार किए गए युवा सिखों को जेल में यातनाएं दी गईं. और उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट्स और तटस्थ इतिहासकारों के अनुसार कई निर्दोषों को भी आतंकवादी का ठप्पा लगा दिया गया था.

इन्हीं सारे सत्य घटनाक्रमों से इंस्पायर्ड, गुलज़ार की फ़िल्म ‘माचिस’ को देखकर आप उस वक्त के पंजाब के हालात समझ सकते हैं.

‘फाइटिंग फॉर फ़ेथ एंड नेशन’ नाम की एक के अनुसार ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद इंडियन आर्मी के न्यूज़लैटर में सुझाया गया था कि –

1984 के दिल्ली दंगे (फोटो: इंडिया टुडे आर्काइव)
1984 के दिल्ली दंगे (फोटो: इंडिया टुडे आर्काइव)

‘खतरनाक ‘अमृतधारियों’ को, जो हत्या, आगजनी और आतंकवाद के कृत्य करने के प्रति वचनबद्ध हैं, तुरंत अधिकारियों के संज्ञान में लाया जाना चाहिए. ये लोग बाहर से देखने में शरीफ़ दिखाई दे सकते हैं लेकिन वे मूल रूप से आतंकवाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं. हम सभी के हित में उनकी पहचान और ठिकाने का खुलासा किया जाना चाहिए.’

तो यही सब और इससे निकला गुस्सा कारण बना इंदिरा गांधी की हत्या का.

लेकिन फिर इंदिरा गांधी की हत्या पर जाकर ये कड़ी ये बदले की लेन-देन नहीं रुकी…


# 1984 

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद शुरू हुए सिख विरोधी ऑर्गेनाईज़ दंगे. ये वही दंगे हैं जिनको भाजपा और भाजपा समर्थक गाहे-बगाहे कांग्रेस और कांग्रेस समर्थकों को चुप करने के लिए यूज़ करती है – ‘तब कहां थे जब 1984 हुआ था?’

ऐसा इसलिए क्यूंकि जिस तरह बाबरी मस्ज़िद विध्वंस और उसके बाद हुए दंगों के साथ भाजपा को जोड़ा जाता रहा है ठीक वैसे ही इंदिरा गांधी के हत्या काण्ड के बाद के दंगों का ज़िम्मेदार कांग्रेस को माना जाता रहा है.

जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई उसी दिन सुबह के ग्यारह बजे, तब तक गांधी ऑफिशियली मृत भी नहीं घोषित हुईं थीं, ऑल इंडिया रेडियो ने न्यूज़ पढ़ी कि इंदिरा गांधी को गोली मारने वाले दोनों गार्ड सिख थे.

मरे - तीस हज़ार, दंडित हुए - शून्य
मरे – तीस हज़ार, दंडित हुए – शून्य

शाम तक इंदिरा गांधी की मृत्यु की खबर कन्फर्म हो गई और पूरे भारत में फैल गई थी. शाम को ही राजीव गांधी को आनन-फानन में प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई. एम्स, जहां इंदिरा ले जाई गईं थीं, के बाहर उनके और कांग्रेस समर्थकों की भीड़ इकट्ठा हो गई. वो नारे लगा रहे थे – ‘खून के बदले खून’. ये भीड़ उग्र हो चली थी. एम्स के आस पास काफी हिंसा हुई. लेकिन बाकी दिल्ली और बाकी भारत शांत बना रहा.

लेकिन एक नवंबर की सुबह सिख समुदाय के लिए कहर बनकर आई. उस वक्त मोबाइल और इंटरनेट नहीं था लेकिन पिछली रात अफवाह फैला दी गई थी कि सिख इंदिरा गांधी की हत्या को सेलिब्रेट कर रहे हैं. नाच गा रहे हैं.

सुबह आठ से दस के बीच में देशव्यापी सिख हत्याओं को अंजाम दिया गया.

लेकिन दिल्ली में सिखों के खिलाफ़ आक्रोश का कुछ ज़्यादा ही असर था, ख़ास तौर पर यमुना पार के – मंगोलपुरी, त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी जैसे इलाकों में.

सिख संप्रदाय के धार्मिक प्रतीकों को क्षति पहुंचाई जाने लगी. ट्वेंटी ईयर ऑफ़ इंप्यूनिटी नाम की किताब के अनुसार – सरकारी बसों का उपयोग दंगाइयों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाने लगा था. पुलिसवालों का नाकारापन बढ़ के दंगाइयों की सहायता करने के स्तर तक जा पहुंचा था. अगर सिख अपने बचाव के लिए कहीं इकट्ठा होते तो ये पुलिसवाले उनके हथियार ले लेते और घर वापस भेज देते, ताकि ये अपनी सुरक्षा न कर सकें. कई बार तो इन्होंने भी दंगे और हत्याओं को अंजाम दिया.

# इसके बाद ये फैला दिया गया कि सिखों ने पानी की सप्लाई को ज़हरीला बना दिया है.

# फिर फैलाया गया कि पंजाब से दिल्ली आने वाली ट्रेनों में हिंदुओं को क़त्ल किया जा रहा है.

पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी
पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी

दिल्ली में आर्मी दंगों के 24 घंटे के भीतर ही बुला ली गई थी लेकिन वो कुछ नहीं कर पा रही थी. क्यूंकि दिल्ली के एडमिनिस्ट्रेशन ने सहयोग करने से इंकार कर दिया था. और ऐसा 3 नवंबर तक चला. फिर सेना आई और लगातार जारी दंगे ‘छुटपुट’ हिंसा में बदल गए.

हाल ही में एच एस फूलका ने राजीव गांधी के वो विवादास्पद बयान वाली वीडियो जारी की थी जिसमें उन्होंने सिख दंगों को जस्टिफाई करते हुए कहा था कि – जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती डोलती ही है.


आगे पढ़ेंगे, कि कैसे खालिस्तान मूवमेंट अपने चरम तक पहुंचकर धीरे-धीरे शांत होता चला गया. कनिष्क विमान से लेकर हरियाणा की बस तक का सारा लेखा जोखा.

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