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2019 पर कितना असर डालेंगे पांच राज्यों के चुनावी नतीजे?

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Abhishek Kumarयह लेख दी लल्लनटॉप के लिए अभिषेक कुमार ने लिखा है. अभिषेक दिल्ली में रहते हैं और सिविल सेवाओं की तैयारी करते हैं. रहने वाले बिहार के हैं. फिलहाल वो अलग-अलग कोचिंग संस्थानों में छात्रों को पढ़ाते हैं. पुरानी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ना और पुराने अखबारों से सियासत की चीजों को खोजकर निकालना इनका शगल है. पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का 2019 में क्या असर पड़ेगा, इस बारे में उन्होंने ये लेख लिखा है.

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए हैं. तीन राज्यों में कांग्रेस ने बीजेपी से सत्ता छीन ली है. मिजोरम में क्षेत्रीय दल एमएनएफ ने सत्ता पर कब्जा किया है. और तेलंगाना में टीआरएस के केसीआर ने सत्ता पर फिर से कब्जा जमा लिया है. तीन राज्यों में से राजस्थान के वोटरों ने बदलाव का पारंपरिक रवैया दिखाया है, जबकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 सालों से सत्ता पर काबिज बीजेपी के खिलाफ एन्टी-इनकम्बेंसी ने सत्ता को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अब अगर इन नतीजों का आकलन लोकसभा चुनावों के लिहाज से किया जाए, तो ये साफ हो जाता है कि कांग्रेस वापसी करने में कामयाब हुई है. लेकिन इसके साथ ही लोकसभा चुनावों की तस्वीर कुछ ज्यादा ही उलझने के आसार दिखने लगे हैं.

और भी मज़बूत हो रहे क्षेत्रीय दल?

बुआ-भतीजे का गठबंधन 2019 में बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकता है
बुआ-भतीजे का गठबंधन 2019 में बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकता है

2014 के लोकसभा चुनावों पर नजर डालें तो दो बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने मिलकर कुल 326 सीटें जीती थीं. इनमें से 282 सीटें बीजेपी के पास थी और कांग्रेस के हिस्से में आईं 44 सीटें. अब कांग्रेस ने जिन तीन राज्यों में जीत हासिल की है, वो बीजेपी से छीनी हुई है. ठीक इसी तरह से यूपी के अलावा मोदी-शाह की जोड़ी किसी ऐसे राज्य में कामयाब नहीं हो सकी, जहां पर क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व हो. दिल्ली और कर्नाटक की सत्ता राष्ट्रीय दलों के हाथ से फिसलकर क्षेत्रीय दलों के हाथ में पहुंच गई. यूपी की विधानसभा में बीजेपी की कामयाबी का लोकसभा चुनावों के लिहाज से बीजेपी के लिए बहुत महत्व इसलिए भी नहीं है, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनावों में ही यूपी की 90% से ज्यादा लोकसभा सीटें राष्ट्रीय दलों (लगभग सभी भाजपा) के पास थीं. अब बुआ-बबुआ के गठजोड़ से इसमें भी गिरावट ही होनी है. गिरावट कितनी होगी तय नहीं है, लेकिन इससे कांग्रेस को भी कुछ मिलने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं. विपक्ष की बैठक के दौरान सपा-बसपा की गैरमौजूदगी से भी ये साफ होता है.

कौन होगा 2019 में सबसे बड़ा दल?

आपसी खींचतान और खराब टिकट वितरण के चलते कांग्रेस की ऐसी भद्द पिटी है
क्या राहुल गांधी 2019 में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आएंगे.

अगर कांग्रेस तेलंगाना जीतने में कामयाब हो जाती, तो निश्चित ही राष्ट्रीय दलों की वापसी का रास्ता ज्यादा साफ होता. फिलहाल जब कांग्रेस ने बीजेपी को तीन बड़े राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से बेदखल कर दिया है तो यही लग रहा है कि दोनों राष्ट्रीय दल पिछली बार के अपने प्रदर्शन यानी कि 326 से भी कम सीटें आपस में ही बांटेंगे. यूपी का सपा-बीएसपी गठबंधन, दिल्ली में आप आदमी पार्टी और कर्नाटक में जनतादलएस के सत्ता में काबिज होने की वजह से ऐसा हो सकता है. बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीटों का फासला भी 2004 के लोकसभा चुनाव जैसा ही हो सकता है, जब कांग्रेस को 145 और बीजेपी को 138 सीटें मिली थीं. इसके बाद अब सारी लड़ाई लोकसभा में सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनने के लिए लड़ी जाएगी, क्योंकि इसी के भरोसे अगली सरकार का खाका खींचा जाना है.

Narendra Modi
अगर मोदी को अपनी सत्ता बचानी है, तो उन्हें कम से कम 220 सीटें लानी पड़ेंगी.

मोदी के लिए अपनी सत्ता बचाने के लिए बीजेपी को किसी कीमत पर 220 सीटों से उपर ले जाना होगा वहीं बीजेपी के लिए अपनी सरकार बनाने के लिए किसी तरह से 180 से ज्यादा सीटों पर कमल खिलाने होंगे तभी ‘मोदी नहीं तो कोई और भाजपायी प्रधानमंत्री ही सही’ की तर्ज पर सत्ता में पुनर्वापसी हो सकेगी. वहीं कांग्रेस के लिए इन तीनों राज्यों यानी कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मुख्यमंत्री का चयन न सिर्फ इन राज्यों की राजनीतिक जरूरतों को देखते हुए करना होगा, बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार की सियासत को भी अपने इन्हीं मुख्यमंत्रियों के जरिए भेदने की कोशिश करनी होगी. ऐसा इसलिए है, क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार की लोकसभा सीटों में से ठीकठाक सीटें निकाले बिना कांग्रेस अगली लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में नहीं उभर सकती. साथ ही, यूपी और बिहार ऐसे राज्य हैं, जहां गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं के बड़े हिस्से पर नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे एनडीए नेताओं की मजबूत पकड़ है. कांग्रेस को इन सबका तोड़ निकालना होगा.

वाईएसआर ने अपने दम पर आंध्रप्रदेश में 33 सीटें जीती थीं.
वाईएसआर ने अपने दम पर आंध्रप्रदेश में 33 सीटें जीती थीं.

2004 में कांग्रेस के पास वाईएसआर थे, जिन्होंने एकीकृत आन्ध्र प्रदेश में 33 सीटें पर पार्टी का परचम लहराया था. अब यही 33 सीटें कांग्रेस को यूपी, बिहार और झारखंड से हासिल करनी होंगी. ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस के लिए अपना प्रधानमंत्री बनाने का एक ही रास्ता होगा और वो ये होगा कि अगले तीन महीनों में विधानसभा चुनावों की सफलता को लोकसभा चुनावों की बेहतर रणनीति बनाने के तौर पर इस्तेमाल करे ताकि लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सके. क्योंकि अगर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में विफल रही, तो वह केन्द्र में भी वही करने को मजबूर होगी जो उसने 6 महीने पहले कर्नाटक में किया है. यानी कि कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के मोर्चे के किसी नेता को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देना होगा.

क्या क्षेत्रीय दलों को स्वीकार्य होगा राहुल का नेतृत्व?

कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी, राहुल गांधी, चंद्रबाबू नायडू, अखिलेश यादव, के. चंद्रेशेखर राव समेत कई दिग्गज नेता पहुंचे थे. लेकिन सवाल ये है कि क्या इनको राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार्य होगा.

एक महत्वपूर्ण प्रश्न क्षेत्रीय एवं अन्य गैर बीजेपी दलों के बीच राहुल गांधी के नेतृत्व की स्वीकार्यता का होगा. 78 वर्षीय शरद पवार की खुद की महत्वाकांक्षा है और उनके लिए अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति है. केसीआर, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी को अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस या किसी दूसरे दल की बैसाखी की ज़रूरत नहीं है. अखिलेश और मायावती अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का समर्थन नहीं करेंगे, क्योंकि मज़बूत कांग्रेस सपा-बीएसपी के मुस्लिम समर्थन के लिए सबसे बड़ा खतरा है. 1999 में राजस्थान में गहलोत और एकीकृत मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की कांग्रेसी सरकारे थीं. उस वक्त मुलायम सिंह ने कांग्रेस की वैकल्पिक सरकार का समर्थन न करने की चिट्ठी राष्ट्रपति नारायणन को भेज दी थी, जिसकी वजह से चुनाव के एक साल के अंदर ही देश में मध्यावधि चुनाव आ गए और वाजपेयी सरकार को जीवनदान मिल गया. ले-देकर देवगौड़ा और लालू यादव की पार्टी भी ऐसा ही दिख रही है जिसका कांग्रेस से एक हाथ ले-एक हाथ दे का रिश्ता है. चुनाव बाद की परिस्थितियों में चंद्रबाबु नायडू भी ऐसा ही कर सकते हैं.

क्या ममता से ज्यादा सीटें ला पाएंगे वाम दल?

वामदलों के सामने ममता सबसे बड़ी चुनौती हैं.

वाम दलों का कौशल भी इसपर निर्भर करेगा कि आगामी लोकसभा में उनकी कुल सीटें ममता बनर्जी से ज्यादा होती हैं या नहीं. वैसे वामदल अलग-अलग राज्यों जैसे बिहार, यूपी, आन्ध्र, तमिलनाडु और असम में अलग-अलग राज्यों से महागठबंधन कर एक-आधी सीटें पाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वो ममता बनर्जी से ज्यादा सांसद दिल्ली भेज सकें. एक संभावना यह भी है कि कांग्रेस ने जिस तरह कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता में आने से रोका है, ठीक उसी तरह से भाजपा भी केन्द्र में कांग्रेस को रोकने के लिए किसी क्षेत्रीय क्षत्रप जैसे शरद पवार, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, नायडू या केसीआर का प्रधानमंत्री पद के लिए बाहर से समर्थन कर दे.

अब बात केन्द्र की सत्ता पर काबिज भाजपा की अगले तीन महीने की संभावित रणनीति की :

1. मंडल कमीशन के तहत पिछड़े वर्गों को मिल रहे आरक्षण के वर्गीकरण के लिए गठित जी रोहिणी आयोग का कार्यकाल मई तक बढ़ाने के बाद अब इसपर विचार हो सकता है कि बिना आयोग की रिपोर्ट आए भी आरक्षण का वर्गीकरण किया जा सकता है या नहीं.

2. मंदिर मुद्दे का किस प्रकार इस्तेमाल किया जाये कि इससे अधिकतम राजनीतिक फायदा उठाया जा सके.

3. हिंदुत्व और विकास के मुद्दे के बीच किस प्रकार से समन्वय कायम किया जाए.

मोदी-शाह की जोड़ी इस रिपोर्ट के बाद चिंतित होंगे.
मोदी-शाह की जोड़ी क्या 2019 में 2014 वाला करिश्मा दोहरा पाएंगी.

कुल मिलाकर इन सब सवालों के जवाब अगले तीन-चार महीनों के दौरान न सिर्फ देश के सियासतदान बल्कि देश की आम जनता भी तलाशेगी और दोनों नेता और जनता अपने मूलभूत मुद्दों के समाधान के लिए एक बार फिर से सियासत को अपनी-अपनी कसौटी पर कसने की कोशिश करेंगे.


 

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