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उसे रिपोर्टर बनना था रिसेप्शनिस्ट नहीं

शादी लड्डू मोतीचूर- 15वीं किस्त

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फोटो - thelallantop
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं. उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल 'बिदेसिया फोरम' नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी 'शादी लड्डू मोतीचूर' लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी 15वीं किस्त-

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भाग 15- पूनम जब पूनम से मिली

उस छोटी सी अटैची में उसके सर्टिफिकेट्स और डिग्रियां थीं. इसके अलावा विभिन्न वाद-विवाद प्रतियोगिताओं, भाषणों, स्पोर्ट्स, संगीत और रंगमंच से जुड़े प्रमाण-पत्र. पूनम ने उन सबको यूं सहलाया जैसे मां अपने बच्चे को सहलाती है. उसने दुबारा चन्दर से अपनी नौकरी संबंधी बात नहीं की. हां, वो इतना जान चुकी थी कि अब संघर्ष की आग में तपना है. अकेले. पूनम ने ज़िद ठान ली कि वो अपने दम पर नौकरी लेकर रहेगी. उसने दिल्ली में मौजूद अपने रिश्तेदारों को फ़ोन भी किया. कुछ लोगों ने तो उत्साहित किया पर अधिकतर का यही जवाब था कि 'कहां नौकरी के चक्करों में पड़ रही हो! अच्छा-खासा कमाता है चन्दर, घर से इतने मजबूत हो तुम लोग, ऊपर से इकलौती बहु हो तुम...ज़रूरत ही क्या है नौकरी के लिए दर-ब-दर भटकने की! कोई कहता- 'एक साल हो ही चुका है शादी को. अब परिवार बढ़ाओ...बच्चे में लगी रहोगी तो इन उटपटांग सोचों से दूर रहोगी.' दिल्ली में कई सालों से रह रहे, अपनी अच्छी-खासी पहचान बना चुके रिश्तेदारों की अलग ही समस्या थी. 'देखो पूनम, नौकरी तो हम तुम्हें यूं चुटकी बजाते दिलवा दें. पर हम इतना धोखा खा चुके हैं रिश्तेदारों से कि छाछ भी फूंक-फूंक के पीते हैं. नौकरी लगते ही सब अपनी औकात भूल जाते हैं. न तो शुक्रगुज़ार होते हैं न ही कभी क्रेडिट देते हैं. खैर, तुम तो अपनी हो. कहो तो अपने एक दोस्त की फर्म में बात चलाएं. रिसेप्शनिस्ट की नौकरी है.'
पूनम हाथ जोड़ लेती. उसे नौकरी करनी तो थी पर महज़ चन्दर को जवाब देने के लिए कोई भी नौकरी नहीं करनी थी. उसे रिपोर्टर बनना था रिसेप्शनिस्ट नहीं.
इन्हीं बातों को सोचती वो छत पर टहल रही थी कि बगल वाली छत पर वो लड़की नज़र आई. पूनम तुरंत सामने से हट गई. उसे चन्दर की हिदायत याद थी. तभी बड़े जोरों की आवाज़ आई और पूनम चौंक पड़ी- 'क्या गिरा? कोई सामान या स्वयं वो लड़की?' इससे पहले कि पूनम कुछ समझ पाती एक स्पष्ट कराह उसके कानों तक पहुंची. पूनम ने आव देखा न ताव जल्दी से छत की रेलिंग तक पहुंची. देखती क्या है कि वो लड़की औंधे मुंह छत पर गिरी पड़ी थी. नशे में धुत. गांव के खेत की पगडंडियों और बड़े-बड़े पेड़ों पर यूं ही सरपट भागने-चढ़ने वाली पूनम रेलिंग फांदती अगले ही पल उस तरफ की छत पर थी. उसने उसे किसी तरह उठाया और कमरे की ओर चली. इससे पहले कि वो उसे बिस्तर पर लिटाती उस लड़की ने वहीं उल्टी कर दी और निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी. पूनम को तो समझ ही न आया कि वो क्या करे. पर उसने जल्द ही खुद को स्थिर किया और कमरे में नज़र दौड़ाई. पूरे कमरे में उस लड़की की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगीं थीं. कहीं न्यूज़ पढ़ती दिखी तो कहीं माइक थामे फील्ड में रिपोर्टिंग करती. कहीं किसी विभूति से सम्मानित होती तो कहीं किसी बड़े नेता से जिरह करती. पूनम मंत्रमुग्ध हो गई. वो उस लड़की की जगह खुद को देखने लगी. तभी उसे उसकी बेहोशी का ध्यान आया और वो झट वहीं पड़ा टॉवल गीला कर लाई. बच्चों सी निश्छल दिखती उस लड़की के चेहरे और बालों को साफ किया. उसे ढंग से लिटाया और कमरे में मौजूद फ्रिज से पानी निकाल उसके चेहरे पर छींटा मारा. थोड़ी ही देर बाद उसने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें खोलीं 'उफ़्फ़फ़! इतनी खूबसूरत आंखों में इतना दर्द!' इससे पहले कि पूनम उससे कुछ कहती टप-टप दो बूंदें उसके गालों पर उतर आईं. पूनम ने कुछ नहीं पूछा, बस उसका माथा सहलाती रही.
'थैंक्यू दीदी...' दो मिनट बाद वो खुद ही बोली. पूनम मुस्कुरा उठी- 'इतना मत पिया करो ना कि अपना ध्यान ही ना रहे!' अगले ही पल उस लडक़ी का चेहरा कठोर हो गया- 'ओह! तो आप भी मदद करने के बहाने सलाह देने, मज़ाक उड़ाने और मुझ पर तंज करने आई हैं?' पूनम हैरान रह गई. दो पल उसने उसे देखा और झटके से उठ खड़ी हुई. इससे पहले कि पूनम वहां से तीर सी निकलती वो लड़की उससे लिपट कर रो पड़ी और बेसाख़्ता बोलती ही चली गई. 'मैंने खुद को बर्बाद कर लिया दीदी. अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. कितना अच्छा था सबकुछ. घर, मां-पापा. कितने अच्छे लड़के से मेरी शादी हो रही थी. और मैंने. मैंने क्या किया? सब छोड़-छाड़ कर इस पत्थरों के शहर में आ गई. मुझ पर नशा सवार था कि मैं अपने दम पर अपनी पहचान बनाकर दिखाउंगी. दीदी, यहां हर कदम पर घटिया राजनीति है. सब आपके सर पर पैर रख, आपको कुचल कर आगे बढ़ना चाहते हैं. यहां न तो आपकी प्रतिभा की कद्र है न भावनाओं की.'
पूनम अवाक खड़ी उसकी बातें सुनती रही. वो समझ गई थी कि ये लड़की भयंकर अवसाद से ग्रस्त हो चुकी है. उसने उसका हाथ थामा और पूछा- 'क्या नाम है तुम्हारा?' लड़की के सूखे चेहरे की एकाध लकीरें बमुश्किल कम हुई- 'पूनम दत्ता.' पूनम हंस पड़ी- 'अरे! मैं भी तो पूनम हूं! तुम तो मेरी हमनाम निकली! मैं तुम्हें पी कहूंगी...ठीक?' वो लड़की जबरन थोड़ा सा मुस्कुरा पाई- 'जो मर्ज़ी पुकारो दीदी..!'
पूनम ने गौर से उसकी आंखों मे झांकते हुए पूछा- 'क्या बात है पी? क्या हो गया? ज़िन्दगी है तो सुख-दुख, उतार-चढ़ाव तो लगे रहेंगे. ऐसे हिम्मत हारने से तो मुश्किलें आसान नहीं होंगी. पी ने अपना सर दीवार से लगा कर लंबी सांस ली- 'दी, जब आपकी धारणाएं टूटती हैं तो आप खुद भी टूटते हैं. मेरी समस्या ये है कि आप मुझे बदमिजाज़, बदतमीज़ कह लो. घमंडी, आवारा या बिगड़ैल कह लो पर मुझे मेरे पेशे से समझौता करने को मत कहो. मेरे लिए पत्रकारिता वो पवित्र अग्नि है जिसमे सिर्फ खबरों की समिधा जलती है. सच्चाई के घृत के सहारे. अगर आपको सच दबाने को कहा जाए तो आप टूटेंगे न? किसी मज़लूम के कत्ल की सच्चाई दिखाने के बजाए किसी फ़िल्म स्टार के बच्चे का हंसना/रोना/चलना आपको ज़्यादा बड़ी खबर लगने लगे तो आप पत्रकारिता के नाम पर शर्मिंदा होंगे न? खबर के नाम पर अगर बार-बार झूठी चाटुकारिता करनी पड़े तो आप एक दिन चीख पड़ेंगे न? मैंने भी यही किया. एक दिन चीख पड़ी. उसी का नतीजा है कि आज मैं यहां इस हाल मे पड़ी हूं. मुझे मेरे बॉस ने शराबी, फ्रस्ट्रेटेड और बेकार कहकर निकाल दिया गया. जिसे मैं मिशन समझ कर आई थी वो दरअसल कमीशन की दुनिया थी.'
पी बोलते-बोलते हांफने लगी थी. पूनम ने कांपते हाथों से उसे पानी दिया और समझाने की कोशिश की- 'नहीं पी, हर जगह अच्छे और बुरे लोग होते हैं. तुम सिर्फ अपने बॉस की वजह से पूरी मीडिया के प्रति धारण बना के नहीं बैठ सकती.' पर पी तो जैसे कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थी. उसके ज़ख्मों ने उसे पूरी मीडिया के प्रति नकारात्मक बना दिया था.
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धीरे-धीरे चलती पूनम अपने घर आ गई. पत्रकारिता उसके लिए भी तो मिशन है, उसके बचपन का स्वप्न! पी की हालत देख वो सोचने लगी- 'क्या उसने गलत स्वप्न देख रखा है?' अचानक उसके मोबाइल पर किसी लैंडलाइन से फ़ोन आया. हेलो, पूनम मिश्रा? मैडम हमें आपका रेज़्यूमे मिला था. चैनल ने कल फ्रेशर्स के लिए टेस्ट रखा है. तो, आप आ रही हैं?


भाग 1दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5ये तो आंखें हैं किसी की... पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है

भाग 10- सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके

भाग 11ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?

भाग 12जब देश में फैशन आता है तो सबसे पहले कमला नगर में माथा टेकते हुए आगे बढ़ता है

भाग 13अगर बॉस को पता चला कि मैंने घूमने के लिए छुट्टी ली थी, तो हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी

भाग 14बचपन से उसकी एक ही तो इच्छा थी- 'माइक हाथ में थामे धुंआधार रिपोर्टिंग करना'



…टू बी कंटीन्यूड!


वीडियो-  किताबवाला: चौचक दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने सुनाए लखनउआ किस्से

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