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सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी दसवीं किस्त- –

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 – हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 – सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 – ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6 – डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7 – घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8 – काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9 – औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है


भाग 10 – पूनम की दिल्ली

येन केन प्रकारेण ट्रेन में सवार हुए चन्दर के लिए ये सफर कुछ ऐसा था मानो “चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो” गाने के अनुसार प्लान बनाया हो, और “चेन्नई एक्सप्रेस” के शाहरुख की तरह मोटे-मोटे साउथ इंडियन गुंडों सदृश सामान के बोरों के बीच बैठ कर यात्रा करनी पड़ जाए. दिल ने इस निहायत ही बेकार सफर के शीघ्र समाप्त होने की दुआ की और महबूब के शानों की बजाए वहीं सीट पर बगल में रखे झोले पर सर टिका कर नींद लेनी चाही. पूनम लगातार उससे आंखें चुरा रही थी क्योंकि साथ में यात्रा कर रहे अनगिनत सामानों में चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ोतरी में उसका योगदान भी तो था! अब तो उन दोनों के दिलों से यही समवेत प्रार्थना निकल रही थी कि शीघ्र दिल्ली आए और छोटा ही सही, उनके ख़्वाबों का घरौंदा उनके इस अति तकलीफदेह यात्रा के जख्मों पर कुछ मरहम लगाए.

कुछ सोचती पूनम खिड़की से सर टिकाए मुस्कुरा उठी. मुज़फ्फरपुर से हॉस्टल में रहकर साइकोलॉजी ऑनर्स कर चुकी पूनम ने दिल्ली के बारे में पूरी रेकी कर रखी थी. महानगर की ऊंची-ऊंची इमारतें, शीशे सी चमकती सड़कें, मेट्रो का सफ़र. कभी खुद को रात में किसी होटल में कैंडल लाइट करती देखती तो कभी यूं ही बारिश में किसी पार्क में चन्दर संग चहलकदमी करती. कभी सोचती गीले बालों के मोती चन्दर पर गिराती उसे सुबह की चाय दे रही है तो कभी देर रात कंबल में घुसी किसी रोमांटिक फिल्म के साथ एक ही कप कॉफ़ी में दोनों मिठास घोले जा रहे हैं. कभी देखती दोनों ही आफिस जाने के लिए सुबह जल्दी-जल्दी तैयार हो रहे हैं, किचन में चन्दर चाय बना रहा है और वो खुद चन्दर को टोस्ट खिला रही है. गलती से चन्दर के गाल पर मक्खन लग जाता है. अब वो आगे-आगे और चन्दर पीछे-पीछे दौड़ रहा है. अपने गाल का मक्खन उसके गाल पर लगाने के लिए. वो शरमा उठी. कितने सपने कितनी उम्मीदें. उफ्फ दिल्ली! पूनम के सपनों की दिल्ली!

उसे ख्याल आया उसने अपने सर्टिफिकेट्स तो संभाल के रखे हैं न! बाबूजी ने उसे पढ़ा तो दिया पर नौकरी करने के नाम पर सख्त ऐतराज़ था. पूनम ये बात शुरू से जानती थी, इसलिए कभी घर में नौकरी के लिए कहा नहीं. अम्मा ने उसे मुजफ्फरपुर भेजने से पहले आंखों में आंसू भर कहा था-

‘बिटिया,पढ़ने तो जा रही है. पर सिर्फ इस पढ़ाई तक मैं तेरे साथ हूं. बीए करते ही तेरे हाथ पीले कर दिए जाएंगे. ऐसा कुछ मत करना जिससे तुझे बाहर भेजने का हमें अफसोस हो.’

पूनम ने मुस्कुराते हुए कहा था-

‘अम्मा, अगर ऐसी ही पढ़ाई करवानी थी तो यही गांव से प्राइवेट पढ़वा दिया होता! क्या ज़रूरत है कलेजे पर हाथ रख कर मुझे बाहर भेजने की?’

अम्मा क्या कहती कि अब लड़के वाले पढ़ी-लिखी लड़की मांग रहे हैं, जो घर के काम भी बखूबी करे. गांव आये तो हाथ भर घूंघट भी रखे और शहर में ज़रूरत पड़ने पर नौकरी-चाकरी भी बखूबी कर ले. उन्होंने उसे दुलारते हुए बस इतना कहा-

‘अरे दिल्ली में नौकरी कर रहे लड़के से तेरी शादी की बात चल रही है. इलाके का सबसे बड़ा खानदान है. मेरी बिटिया पढ़ाई-लिखाई से लेते हुए किसी चीज में उससे कम नहीं होनी चाहिए. वो सेर तो मेरी बेटी सवा सेर होगी..है कि नहीं? वरना अंजलिया की तरह अंग्रेजी के नाम पर हर बात में ‘यस, नो वेरी गुड’ करेगी तो ससुराल वाले मायके ला कर बिठा देंगे. कहेंगे पहले बेटी को मेरे बेटे के लायक बनाओ तब भेजना साथ में.’

पूनम खुद को पढ़ाए जाने के पीछे ऐसी भयंकर दलील सुन कर दंग रह गई. पर उसने जिरह करने से बेहतर यही सोचा कि किस्मत पढने का मौका दे रही है यही क्या कम है?

कॉलेज में तो जैसे सारा जहान एक ही प्रांगण में इकट्ठा था. पेरिस में एंट्री करने वाला लेटेस्ट फैशन अगले ही दिन कॉलेज के गलियारों में दिख जाता. धन्य हो सोशल वर्ल्ड. धन्य हो फेसबुक और मैसेंजर!

विदेशी डीनो और उसकी रूममेट रेखा तगड़े वाले दोस्त. लंदन के प्रोडक्ट्स कुरियर के मार्फ़त रेखा की अलमारी की ज़ीनत बढ़ा रहे होते. एक रात तो उसे कमरे से बाहर निकल जाना पड़ा. सिगरेट के छल्ले उड़ाती रेखा वीडियो चैट कर रही थी डीनो से.

गांव और छोटे शहरों से इस होस्टल में आई अधिकतर लड़कियों ने अपने अपने दुपट्टे तह लगा के अलमारी में रख दिये थे जिन्हें वो सिर्फ वापस घर जाकर ओढ़तीं या तब, जब घर से कोई मिलने आता. उन्हीं लड़कियों में कुछ ऐसी भी लड़कियां थीं जो ज़माने से तालमेल बिठाने के साथ अपनी पढ़ाई को भरपूर तरज़ीह देतीं. वो जानतीं थीं अगर इस मौके को वक़्ती बाढ़ में बहा दिया तो हाथ कुछ नहीं आना है, सिवाय मां-ताई-चाची जैसी क़िस्मत के. सपने पूनम के भी थे. सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर उसके पास वो आत्मविश्वास नहीं था कि वो होस्टल की बाउंडरी को पार कर सके. घर का डर हर इच्छा से बड़ा था. इसी का परिणाम था कि वो ग्रैजुएशन में टॉप आई थी. पुराने जमींदार घराने की बेटी होने के साथ टॉप आने के फैक्टर ने फ़टाफ़ट पूनम और चन्दर की कुंडलियां मिलाईं. आज वो चन्दर की ब्याहता बन दिल्ली जा रही थी. सारे सपनों को उसने इसी दिल्ली में देखने के लिए तब सुला दिया था. दिल्ली उसके सपनों की नगरी यूं ही थोड़ी थी!

दिल्ली का सांकेतिक फोटो (रायटर्स)
दिल्ली का सांकेतिक फोटो (रायटर्स)

तीव्र शोर से पूनम और चन्दर की आंखें एक साथ खुलीं. सप्तक्रांति दिल्ली पहुंच चुकी थी. पूनम हड़बड़ा कर उठी. उधर चन्दर ने सारे सामानों के पहाड़े को मन ही मन दुहराया और उन्हें बोगी के गेट पर लगाने लगा. बोगी के बाकी यात्री उसे ऐसे घूर रहे थे जैसे वो कोई आतंकवादी हो. इस गेट से लेते हुए उस गेट तक उनके ही सामानों की श्रृंखला लगी हुई थी. पूनम ये समझ नहीं पा रही थी कि आखिर चन्दर कुली क्यों नहीं कर लेता! कांधे पर पर्स और हाथ मे सिन्होरा थामे पूनम किसी तरह ट्रेन से निकली और सारे सामानों की सुरक्षा में प्लेटफॉर्म पर खड़ी हो गई. तगड़ी बारगेनिंग के बाद एक ठेला वाला तैयार हुआ और वो दोनों स्टेशन के बाहर पहुंचे. पूनम ने सोचा, ओला कर तो लेंगे पर क्या ये सारे सामान आ पाएंगे गाड़ी में? पता नहीं चन्दर ने ओला बुक किया भी है या नहीं! तभी उसने देखा चार-पांच ऑटो वाले उनकी तरफ लपकते आ रहे हैं. वो ‘ना’ करने ही वाली थी कि देखा चन्दर आगे बढ़ उनसे बातचीत करने लगा. ‘निरंकारी कॉलोनी का चार सौ!’ चन्दर ने ऊंची आवाज में आश्चर्य प्रकट किया और ढाई सौ में चलने को कहा. उधर ऑटो वाले किसी भी कीमत पर चार सौ से नीचे नहीं आ रहे थे. किसी से बात न बनती देख चन्दर प्रीपेड बूथ की ओर बढ़ा. स्थिति ये थी कि पर्ची हाथ मे लिए चन्दर ऑटों वालों से निरंकारी कॉलोनी के लिए पूछ रहा है और उधर हाथों में सिन्होरा पकड़े पूनम चिलचिलाती धूप में खड़ी है. उसे याद आया मायके और ससुराल दोनों जगहों पर किस तरह गैराज में गाड़ियों की कतारें लगी रहतीं थीं.

दिल्ली…पूनम के सपनों की दिल्ली!


…टू बी कंटीन्यूड!


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