Submit your post

Follow Us

बचपन से उसकी एक ही तो इच्छा थी- 'माइक हाथ में थामे धुंआधार रिपोर्टिंग करना'

178
शेयर्स
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं. उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी 14वीं किस्त-

Shadi Laddu Motichoor - Banner


भाग 14- नौकरी-चाकरी, घर-दुआर

ठेला लिए गली से गुजरते सब्ज़ी वाले को पूनम ने ऊपर से ही आवाज़ देकर रोका. कुछ पैसे लिए और जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतरती वो अचानक ही रुक गई. सामने टॉप फ्लोर के फ्लैट में अकेले रहने वाली वो लड़की मूर्तिवत छत पर खड़ी थी. डेनिम की हाफ-पैंट और ब्लैक स्पैगेटी-टॉप पहने वो लगातार सिगरेट के छल्ले उड़ा रही थी. उस अति मॉडर्न वेशभूषा वाली सुंदरी को पूनम जब भी देखती तो देखती ही रह जाती. उसे न जाने क्यों वो लड़की उदास सी लगती. वह बार-बार अपनी लाल आंखों को रगड़ती और कश पर कश लिए जाती. पूनम उससे बात करना चाहती थी. पर चन्दर की बातें याद आ गईं. ‘यहां कोई किसी के मामलों में दखल नही देता और ना ही किसी को अड़ोस-पड़ोस में रुचि ही होती है. सबसे बड़ी बात, वक़्त ही किसके पास है इतना यहां?

लोकल तो फिर भी आपस में आवाजाही कर लेते पर किरायेदारों से ये लोग ज़्यादा घुलते-मिलते नहीं थे. यहां तक कि शादी-ब्याह में भी बिल्कुल पड़ोस के रहने वालों तक को न्योता नहीं देते. पूनम ने सीढ़ियों से ही उसे अपनी उपस्थिति का आभास दिलाना चाहा पर वो लड़की तो जैसे गुम थी कहीं. थक-हार कर पूनम नीचे उतर गई. सोचा आज ज़रूर चन्दर से इस लड़की के बारे में पूछूंगी.

ठेले वाले को महिलाओं ने घेर रखा था. पंजाबी, सिंधी, बनिए यहां के लोकल थे, उनके अलावा बिहार और यूपी वाले भी खूब भरे थे इस कॉलोनी में. यहां खड़ी कुछ तो सलवार-सूट में थीं पर अधिकतर ने घर वाले लोअर और टीशर्ट पहन रखे थे. दिल्ली आकर टीशर्ट पहन तो लिया पर अभी इतना आत्मविश्वास आया नहीं कि छोटे टीशर्ट पहने. इसलिए कुर्तियां या फिर लंबे टीशर्ट के साथ लोअर पहने हुई थीं. कहीं-कहीं टीशर्ट के ऊपर छोटा सा स्टोल भी गर्दन को घेर सीने पर मौजूद था. मतलब बचपन से घुट्टी की तरह पिलाया गया आचरण और वस्त्र-विन्यास संबंधित रोका-टोकी का डर यहां दिल्ली आकर और चाहकर भी छूट नहीं पा रहा था. सबसे ज्यादा हैरानी तो जींस के साथ तीन-तीन बिछुए-पायल वाले कॉम्बिनेशन पर हो रही थी. अब तक उसने घर में औरतों को साड़ी या सलवार सूट के साथ आलता, पायल-बिछुए और भर-मांग पियरका सिंदूर के साथ देखा था. स्कूल-कॉलेज में टीचर्स या कहीं और काम कर रही महिलाओं को उसने सिंदूर की नाम-मात्र उपस्थिति के साथ देखा था. पर ये कॉम्बिनेशन तो उसे विस्मित कर गया, साथ ही हंसी भी आई. फैशन के सहारे दिल्ली में घुलने-मिलने की कोशिश के साथ-साथ संस्कारों से जुड़े धागों को डर अथवा प्यार से बांधे रखने का अद्भुत संयोग था ये! उसने मन ही मन दुआ की ‘ईश्वर करे ये बिछुए इन महिलाओं ने उस एक इंसान से अपने प्यार की वजह से पहनी हो, किसी सामाजिक,पारिवारिक अथवा धार्मिक डर की वजह से नहीं.

कोहड़ा कइसे दिए भैया?‘ किसी ने पूछा.
कोहड़ा?? सब्ज़ी वाला हंस पड़ा साथ में कुछ और लोकल महिलाएं भी. ‘ये बिहारी भी न, अच्छी-भली सब्ज़ियों के नाम बिगाड़ कर रख देते हैं. पीला कद्दू है ये और तो और घिये को भी पता नहीं क्या कहते हैं…लौकी न! और तोरई को घिउड़ा. हा हा हा

पूनम से रहा नहीं गया- आंटी, लौकी सिर्फ बिहार में नहीं और भी बहुत जगहों पर बोली जाती है. हर जगह की अपनी अलग भाषा है इसमे हंसने वाली क्या बात?

सब्जी बाजार (प्रतीकात्मक फोटो)
सब्जी बाजार (प्रतीकात्मक फोटो)

हंस कहां रहे. बस बता रहे हैं. कुछ दिनों बाद हम सब कद्दू को कोहड़ा कहने लगेंगे. हा हा हा. अच्छा एक बात बताओ, रोटी तो तुम लोगों ने दिल्ली में ही खाई होगी न पहली बार! ये जो बोरे के बोरे चावल तुम सब महीने भर में जैसे खत्म कर देते हो, लगता है चारों टाइम चावल ही खाते हो. नहीं?

पूनम अब जाकर समझी कि दरअसल उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है. वो तो हैरान रह गई. आज तक बिहारी होने पर वह गर्व करती आई थी. वो शुरू हो गई- ‘क्या बात कर रही हैं आंटी! चावल तो हमसे ज्यादा बंगाली खाते हैं और बंगाली ही क्यों, साउथ इंडिया के अधिकतर डिशेज़ में चावल का इस्तेमाल होता है. रही बात रोटी की, तो वो भी हमारी तरफ उतनी ही खाई जाती है जितनी यहां. वो क्या है न आंटी, इन डॉक्टर्स का बस चले तो वो हर घर से चावल छुड़ा कर रोटी पहुंचा दें बीपी और शुगर की बीमारियों के नाम पर. पर हम सब भी शौकीन हैं, जब तक बासमती चावल की एक मुट्ठी पेट में न जाए, चैन ही नहीं पड़ता. वैसे हर बेल्ट के अपने खास अनाज होते हैं. अब इसपर भी मज़ाक बनेंगे क्या? कहती हुई पूनम ने मुस्कुरा कर बात समाप्त की. पूनम को लगा कि बात समाप्त हो गई पर उसे नहीं पता था कि यहां दिल्ली में बिहारियों को हर वक़्त, हर जगह उनके बिहारी होने का बोध कराया जाता है , मज़ाक बनाया जाता है. आंटियां चुप तो हो गईं पर उनके चेहरों से व्यंग्य वाले भाव मिट नहीं पाए.

शाम में पूनम पूरे दिन की कथा लेकर बैठ गई . उकताया सा चन्दर सुनता रहा. जब उसने सिगरेट वाली लड़की की बात पूछनी चाही तो वो एकदम बोल पड़ा- ‘बिल्कुल ज़रूरत नहीं उसके चक्कर में पड़ने की. ज़्यादा तेज़ लड़कियों की यही स्थिति होती है. मीडिया में थी ये, किसी बढ़िया प्रतिष्ठित चैनल में, पर आज देखो…

मीडिया का नाम सुनते ही पूनम चौकन्नी हो उठी. बचपन से उसकी एक ही तो इच्छा थी- ‘माइक हाथ में थामे धुंआधार रिपोर्टिंग करना‘.
‘फिर क्या हुआ? अब नौकरी नहीं करती?’

Ciggrate

‘नौकरी लगता है छूट चुकी है इसकी, इसीलिए तो दिन-रात घर में बैठी सिगरेट फूंकती रहती है. और नौकरी छूटे भी क्यों ना, इतना पीने लगी थी. मैंने अक्सर देखा है, रात में जब भी आती थी, दो लोग तो इसे ऊपर पहुंचाने आते. इस क़दर ये नशे में धुत्त रहती. ख़ैर, छोड़ो. हमें इससे क्या? तुम इससे दूर ही रहना.’

पूनम ने काफी देर सोचकर धीरे से कहा- ‘आपका कोई दोस्त या जान-पहचान वाला मीडिया में नहीं है क्या?’
चन्दर- ‘नहीं ऐसा तो कोई नहीं. एक दो दोस्त होंगे भी तो उनसे इतनी गहरी नहीं बनती. क्यों? क्या बात है?’
पूनम ने सकुचाते हुआ कहा- ‘आप तो जानते हैं न, मैने जर्नलिज्म में डिप्लोमा भी किया हुआ है. मुझे बचपन से पत्रकार बनने का शौक है. अगर हम इस लड़की से…’
चन्दर ने बीच में ही उसकी बात काटते हुए कहा- ‘इस लड़की से किसी भी तरह की बातचीत नहीं होगी. नौकरी की अभी से क्या जल्दी होने लगी तुम्हें? पहले घर, आस-पड़ोस समझो. कुछ दिन दिल्ली घूमो. अकेले तो कभी निकली नहीं हो. मेट्रो के एस्केलेटर पर चढ़ने में ही तुम इतना घबराती हो. रोज़ अकेले ऑफिस आना-जाना हो पाएगा तुमसे? पहले खुद को तैयार तो करो.’
पूनम हैरान सी चन्दर को देखती रही. ‘घर बैठे रहने से तो नहीं समझूंगी न सब कुछ! कम से कम लोगों से मिल-जुल कर कोशिश तो करूं! ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? नौकरी नहीं मिलेगी पर सीखने को तो मिलेगा!’

चन्दर ने बात को समेटने की कोशिश करते हुए कहा- ‘अच्छा, मैं देखता हूं. कहीं कोई वेकेंसी अगर आई हो तो. तुम परेशान मत हो. और चाय-वाय तो पिलाओ भाई! बंदा दिन भर आपके हाथ की चाय को मिस करता है, कि कब शाम हो, कब वो घर पहुंचे, उसकी मोहतरमा गेट पर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही हो और कब उसके हाथों की चाय से बंदे का गला तर हो.’ कहते हुए चन्दर ने पूनम की हथेलियां थाम ली.

पूनम ने भी बात का बतंगड़ बनाने से बेहतर चाय बनाना समझा. चाय बनाते हुए भी उसके दिमाग में चन्दर की कही बातें ही चल रही थीं. उस लड़की के बारे में बिना जाने यूं निर्णय सुनाना पूनम को ठीक नहीं लगा पर चन्दर यहां पहले से रह रहा है. दिल्ली और दिल्लीवालों को वो बेहतर जानता है. उसने खुद को समझाया. चाय-पकौड़े ट्रे में सजाए वो छत पर ही आ गई. शाम को यहां अच्छा लगता है. सबसे ऊपरी मंजिल होने के कारण गर्मियों में छत तपती तो थी पर एक-दो बाल्टी पानी डाल देने से फर्श ठंडी हो जाती. बाहर टेबल-कुर्सी डाले मियां- बीवी बातों में लग गए.

पूनम ने कहा- तो, कब ले रहे हैं आप छुट्टी ऑफिस से?
चन्दर- छुट्टी? अब काहे की?
पूनम- अरे! हनीमून पर जाना नहीं हमें?

चन्दर कुछ सोचता ही रह गया. उसे याद आया कैसे हनीमून की सारी तैयारी कर ली थी उन दोनों ने, पर अचानक वैष्णो देवी की यात्रा के सुयोग के कारण हनीमून का प्लान आगे टालना पड़ गया था. उधर पूनम लगातार बोलती ही जा रही थी ‘हम न शिमला न गोवा जाएंगे. सब तो वही जाते हैं. हम कहीं और जाएंगे जिसका नाम लोगों ने उतना सुना न हो. आपने क्या सोचा है? कहां जाएंगे हम?’

‘हनीमून-हनीमून की रट लगा रखी है. हद है यार! समझ नहीं आता तुम्हें कुछ? अनपढ़ हो? नौकरी छोड़ कर तुम्हें घुमाता रहूं? यही काम है मुझे? खाओगी क्या. सोचा है? घूम लिया न वैष्णो देवी! बस हो गया हनीमून.’
लेकिन आपने तो कहा था कि…

‘हां कहा था…कह दिया था…तो क्या करूं? ठीक है. नौकरी से रिज़ाइन कर देता हूं आज ही. तुम बैग तैयार कर लो. साला घर की लाखों की संपति और खेती-बाड़ी, बाग-बगीचे छोड़ कर यहां इस दो कमरों के घर मे रह रहे हैं ताकि कुछ अलग करें. अपने दम पर. अब हर दूसरे सप्ताह छुट्टी ही करनी है तो हो गई नौकरी’ बुदबुदाता चन्दर चाय छोड़ नीचे चला गया.

पूनम पत्थर सी वही बैठी रही. कुछ देर बाद उठी और बर्तन समेटकर सिंक में डाल दिया. कमरे में आई और उस बैग की सारी चीज़ें निकाल कर अलमारी में रखने लगीं जिन्हें घूमने जाने के लिए खरीदा था. कपड़े, सन-ग्लासेज़, कैप्स और न जाने क्या-क्या. कैप को सोफ़े पर रखे बड़े से टेडी बेयर को पहनाया और वापस छत पर आ गई.

हां, हर लड़की की तरह उसने भी हनीमून के सपने संजोए थे पर वो न तो ज़िद्दी थी ना ही बेवकूफ़. खुद्दार ज़रूर थी. उसने उम्मीद की थी कि चन्दर यही बात उससे आराम से कहता. और तब वो खुद ही कहती कि ठीक है, अभी नहीं तो बाद में चलेंगे. उसे अचानक ही अपने ताऊजी याद आ गए. ताईजी से बात करते उन्हें किसी ने नहीं सुना था. वो सिर्फ चिल्लाते थे. पहले के वर्षों में ताऊजी के गुस्से से जो ताईजी भय से कांप उठतीं, बाद के वर्षों में उन्हीं ताईजी ने जैसे सुनना ही बंद कर दिया था. भावहीन चेहरा लिए वो बस चुपचाप किसी न किसी काम में लगीं रहतीं. पूनम बचपन से ही सोचती- ‘नहीं, मुझे ताईजी जैसा नहीं बनना. नहीं बनना. पर आज!

सामने छत पर उस लड़की की परछाईं डोल रही थी. पूनम को लगा उस छत से बढ़ता धुंआ उसे भी अपनी आगोश में ले लेगा.


भाग 1– दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2– दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3– हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4– सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5– ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6– डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7– घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8– काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9– औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है

भाग 10 सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके

भाग 11– ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?

भाग 12– जब देश में फैशन आता है तो सबसे पहले कमला नगर में माथा टेकते हुए आगे बढ़ता है

भाग 13– अगर बॉस को पता चला कि मैंने घूमने के लिए छुट्टी ली थी, तो हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी


…टू बी कंटीन्यूड!


वीडियो-  किताबवाला: चौचक दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने सुनाए लखनउआ किस्से

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

KBC क्विज़: इन 15 सवालों का जवाब देकर बना था पहला करोड़पति, तुम भी खेलकर देखो

आज से KBC ग्यारहवां सीज़न शुरू हो रहा है. अगर इन सारे सवालों के जवाब सही दिए तो खुद को करोड़पति मान सकते हो बिंदास!

क्विज: अरविंद केजरीवाल के बारे में कितना जानते हैं आप?

अरविंद केजरीवाल के बारे में जानते हो, तो ये क्विज खेलो.

क्विज: कौन था वह इकलौता पाकिस्तानी जिसे भारत रत्न मिला?

प्रणब मुखर्जी को मिला भारत रत्न, ये क्विज जीत गए तो आपके क्विज रत्न बन जाने की गारंटी है.

ये क्विज़ बताएगा कि संसद में जो भी होता है, उसके कितने जानकार हैं आप?

लोकसभा और राज्यसभा के बारे में अपनी जानकारी चेक कर लीजिए.

संजय दत्त के बारे में पता न हो, तो इस क्विज पर क्लिक न करना

बाबा के न सही मुन्ना भाई के तो फैन जरूर होगे. क्विज खेलो और स्कोर करो.

बजट के ऊपर ज्ञान बघारने का इससे चौंचक मौका और कहीं न मिलेगा!

Quiz खेलो, यहां बजट की स्पेलिंग में 'J' आता है या 'Z' जैसे सवाल नहीं हैं.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

आज आमिर खान का हैप्पी बड्डे है. कित्ता मालूम है उनके बारे में?

चेक करो अनुपम खेर पर अपना ज्ञान और टॉलरेंस लेवल

अनुपम खेर को ट्विटर और व्हाट्सऐप वीडियो के अलावा भी ध्यान से देखा है तो ये क्विज खेलो.