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सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसका चौथा भाग –

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 – हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

 

भाग 4 – चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

घर में प्रवेश करते दूल्हे राजा की निगाहें शर्मिंदगी की बोझ से ज़मीन में धंसी हुई थीं. उसे कुछ नहीं सूझ रहा था. सालियों ने उसे अपनी गिरफ्त में कुछ यूं घेर रखा था जैसे युद्ध मे पराजित कोई राजा दुश्मन देश के सिपाहियों के साथ चल रहा हो. वह जल्द से जल्द कमरे में पहुंच कर अपने कपड़े पहन लेना चाहते था. उसने हड़बड़ाते हुए जैसे ही कमरे में प्रवेश करना चाहा, एक हाथ कमर और दूसरा हाथ दरवाजे पर रखे एक कोमलांगी ने उसे रोक लिया- ‘अरे, अरे… रुकिए तो… ऐसी भी क्या जल्दी है जीजाजी…’ वो अचकचा कर रुक गया. ये उसकी इकलौती साली साहिबा थीं और इस गिरोह की अतिसक्रिय, दूरदर्शी और तेजतर्रार मुखिया भी. आंखों में शैतानी चमक और होंठों पर बंकिम मुस्कान लिए उसने कहा –

पहले कमरे में जाने का नेग तो निकालिए!

जीजाजी शॉक्ड! उसने पूछा-

नेग किस बात का?

कमरे में अंदर जाने का. अगर नेग नहीं दिया तो इसी गमछे में हम आपकी रैली निकाल देंगे पूरे गांव में.

– जवाब मिला.

दिल्ली से तुरंत ही गांव में डिलीवर हुए जीजाजी जो अभी-अभी बाहर के चापाकल पर अपना मड-पैक अर्थात कीचड़ से सनी काया धो कर आ रहे थे, सालियों की इस मांग से फिर से पसीने से नहा गए. मरी सी आवाज़ में उसने बोला –

लेकिन बैग तो कमरे में है और हम सिर्फ इस गमछे में.हम कहा से नेग देंगे?

बात तो वाकई सोचने वाली थी. सालियों ने आंखों ही आंखों में इशारे किए और अगला फरमान आया-

ठीक है, नेग का हिसाब-किताब देख लिया जाएगा. फिलहाल आप कुछ कर के दिखाइए, कुछ नाच-गाना या फ़िर शेरो-शायरी पेश कीजिए तभी अंदर जा पाएंगे.

उसने मिमियाती आवाज़ में कहा –

देखिए गाना तो हमको नहीं आता है.

अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सालियों ने शोर मचाया –

कोई बात नही जीजाजी, हम गा देते हैं, आप नाचिये बेहतरीन टाइप से.

जीजाजी परेशान –

नहीं नाचने तो साफ्फा नहीं आता है, एकदम्मे नहीं आता है हमको.

सालियां अब बेसब्र हुई जा रही थीं –

का जाने कहां का बऊबंस पकड़ के हमरी दीदी का बियाह कर दिए बड़का बाबूजी. का आता है जी आपको?

अब इन सालियों के बीच मौजूद इकलौते जीजाजी कोई सांवरिया वाले रणवीर कपूर तो थे नहीं जो तौलिये में ही नाचने लगते. उन्होंने सालियों को शेर सुनाना चाहा और इरशाद सुनने की आस में कहा –

अर्ज़ है…

सालियों की तरफ से कोई जवाब नहीं. गला साफ करते हुए उसने दुबारा कहा –

अर्ज़ है…

जवाब में एक साली ने लम्बी जम्हाई लेते हुए उसे हैरान कर दिया. किसी तरह उसने ग़ालिब को याद करते हुए शेर सुनाया –

आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक.

शेर सुनाकर कर उसने सालियों की तरफ देखा. सन्नाटा… लाचारगी से उन्हें देख वो समझ गया कि शेर उनके सर से बाउंस गया. एक ने शेर को समझते हुए कहा –

हां तो दिल्ली के परदूसन(प्रदूषण) में सारे ज़ुल्फ़ गिर ही जाने हैं. बचेगा तो बिना बालों वाला सर ही न सिर्फ!

‘कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक’ की ऐसी व्याख्या सुन वह अपनी सालियों की प्रतिभा पर दंग था. वो सालियां थीं जिनके लिए शेर का मतलब था – जीजाजी, जीजाजी पान मत खाइए, ओठ लाल करना है तो लिपिस्टिक लगाइए.

या जो ज़्यादा ज़हीन थीं उनकी डायरी में होता था –

सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के वसूलों(उसूलों) से,
कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से.

तो ऐसी सालियों को कन्विंस करना आसान नही था. ये मॉडर्न सालियां थीं. पढ़ी-लिखी या पढ़ रहीं. दरअसल इनका कोर्स ‘बियाह वाला पढ़ाई’ था. जब तक शादी नही हो जाती तब तक आप पढें. गेस पेपर लड़ गया तो और पढ़ें. दू-चार साल और शादी नही हो पाई तो डबल-ट्रिपल एम. ए. कर लें. तो ये पढ़ी लिखी सालियां इससे पहले कि और शेरों की फरमाइश करतीं, जीजाजी ने दरवाज़े पर खड़ी साली साहिबा को परे करते कमरे में घुस जाना चाहा. पर ये गांव की चपल-चालाक सालियां थीं. इससे पहले कि वो कमरे में प्रवेश करता, उसे रोकने के चक्कर मे उसकी कमर से लगे एकमात्र वस्त्र अर्थात गमछे को साली साहिबा ने पकड़ लिया. उसके रोंगटे खड़े हो गए. राज कॉमिक्स के हीरो की तरह एक सेकंड के सौवें हिस्से में दूल्हे ने गमछे को पकड़ा. पल भर को खानदान की सारी मान-मर्यादा उसके हाथों की पकड़ पर निर्भर हो गई थी.

अब स्थिति यह है कि चौखट के बीचों बीच हर कीमत पर अपने हाथों की पकड़ को और मजबूत करता दूल्हा है, तो दूसरी तरफ मधुमक्खियों की तरह उसे डंक मारने को तैयार सालियों का जत्था है. रस्सा-कस्सी के इस खेल के बीच मौजूद है वो ऐतिहासिक गमछा. खींचा-तानी मची हुई है शिकार और शिकारियों के बीच. सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे. उधर दूल्हे की सारी बुद्धि ये सोचने में लगी है कि किसी तरह गमछे को जाने नहीं देंगे. वो तो भला हो बाहर दुआर से आते ससुर जी का, जिनके आते ही सालियों ने ‘देख लेंगे’ वाले भाव में उसे जाने दिया. कमरे में आकर पहले तो उसने लंबी लंबी सांसे भरीं.

उफ़्फ़! सालियां हैं या गुंडियां. अभी पूरे दो दिन यहां रहना है. इस घर में रहना ऐसा है जैसे नुकीली दांतों के बीच जिह्वा रहती है. मन को शांत करने के लिए उसने उल्टी गिनती शुरू की. उसके बाद फटाफट कपड़े पहन. डियो की बारिश में खुद को नहला, जैसे-तैसे बालों को ठीक करता बाहर निकला. अभी तक उनके दर्शन हुए नहीं थे जिसे लिवाने वो आया था. आंखों को उसने भरसक हर कोने में दौड़ाया था. फ़ैज़ को मन ही मन गुनगुनाता वो अपने ससुर के पीछे-पीछे बाहर को हो लिया-

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले.

शाम हो आई. रसोई घर से धुआं उठना शुरू हो गया था. गांव के हर घर में गैस का चूल्हा है, पर अभी भी मिट्टी के चूल्हों का साथ छूटा नहीं है. शाम होते ही चूल्हे और उसके आस-पास मिट्टी से लीपना, अब भी आदत है गृहिणियों की.

शादी - फीचर

दामादजी आंगन में बैठे चाय पीते बड़े गौर से ये सारे क्रियाकलाप देख रहे थे. भुने हुए चूड़े के साथ पियाजी, सिलबट्टे पर पिसी दाल की कचरी और लहसुन मिर्च की जमीरा निम्बू डाल के बनाई चटनी के साथ तमाम मिठाइयां परोसी गई थी. बेतिया का खास ‘पीजीटी’ दामादजी के लिए मंगवाया गया था. अब इस मिठाई का फुल फॉर्म तो किसी को नहीं पता पर हल्के भूरे चॉकलेटी रंग की ये खास मिठाई वैसे ही बनती है जैसे पेड़ा बनता है. बस इसे देर तक भूनते हैं और खूब घी सहेजे ये मिठाई लाज़वाब होती है. उसने नाश्ते की प्लेट पर निगाह दौड़ाई और फिर उसे घूरती कम से कम बारह जोड़ी आंखों को देखा. उसे पक्का यक़ीन था कि सालियों ने कुछ न कुछ करामात दिखाई होगी नमक मिर्च के अनुपात को कम-बेसी कर के. पर साथ में ससुरजी को देख उसे कुछ हिम्मत हुई. उसे चालाकी सूझी. उसने प्लेट ससुर जी की ओर किया. इससे पहले की ससुरजी जी कुछ लेते, न जाने कहां से एक साली अचानक उनके हाथ से थाली ले लेती है. ससुर जी अचकचा जाते हैं –

बाबूजी,हम अभी देखे हैं, इसमे माछी(मक्खी) गिर गई थी. हम दूसरा लाते है नाश्ता.

ससुर जी तो कुछ नहीं समझे पर वह मुस्कुराते हुए सब समझ गया. उसका दाव भारी पड़ा था. यह उसकी पहली जीत थी. उसे अपनी बुद्धिमानी पर नाज़ हो आया. पर वो जानता नहीं था कि पानी मे रहकर मगर से बैर नही करते.

नाश्ता निपटा कर वह सुसुरजी के पीछे-पीछे हो लिया. बाहर दरबार सज चुका था. पान की खिल्लियां लगा दी गई थी. आस-पास कुर्सियां, मोढें और मचिया के अलावा घास पर लोग बैठे हुए थे.

ससुरजी गांव के दबंग थे. जब वो अपने खास अंदाज़ में ठहाका लगाते हुए सामने वाले से अपनी बात के समर्थन में पूछते –

बोलs बबुआ,गलती की सही?

तो सामने वाले को मजबूरन पूरब को भी पश्चिम कहना होता. उन्हीं दरबारियों में दो तीन लोग लगातार सुर्ती(खैनी) लटने में लगे रहते. सुर्ती जहां मौजूद होती है, वहां ग़ज़ब की समानता होती है. कोई ऊंच-नीच, भेदभाव नहीं. सब एक ही हथेली की खास अंदाज में ताल और चुटकी मार, चूने के साथ एक सार की गई सुर्ती को अपने होठों के नीचे दबाते. गांव की बातों में फिर जो रस आता वो बड़े से बड़े मुद्दों को भी चुटकियो में सुलझा देता.

पर दामादजी शदीद बोरियत के शिकार हो रहे थे. बातों के दरमियाँ ही खाने का वक़्त हो आया. सावन का महीना तो था ही, बादल को घिरते देख गृहस्वामिनी ने दरवाजे की सांकल जोर से बजा के इत्तिला दे दी कि खाने के लिए आंगन में आएं. ये इशारा भी एक परंपरा बन चुकी थी उस घर में. सांकल का बजना यानी दूर दुआर पर बैठे गृहस्वामी को तुरंत याद फरमाया गया है. ससुरजी ने तुरंत ही दरबारी कार्यवाही कल तक के लिए मुल्तवी की और दामादजी को लिए आंगन में प्रवेश हुए. सरसो लहसुन और मिर्च की मिलीजुली खुशबू ने बता दिता था कि सरेयामन की मछली बन रही है. मौसम खराब होने की वजह से जीजाजी का खास ध्यान रखने की ज़िम्मेदारी इकलौती साली साहिबा पर छोड़ बाकी सालियों ने अपने-अपने घर की राह ले ली थी.

पहले तो थाली में लाल-लाल तली झींगा मछली के साथ गरई और सिधरी (मछली की छोटी किस्में) रखी गई. फिर चावल के साथ रोहू. दामादजी को रोहू का मूड़ा(सिर) खाने की ज़िद करती सासुमां ने बड़े प्यार से कहा –

मूड़ा खाने से बेटा होता है बाबू.

हाय, दामादजी की रंगत शर्म से लाल हो गई. कातर नज़रों ने फिर उस परी को ढूंढना चाहा…

पर वो क्या, उसकी झलक तक नहीं मिली. हालांकि उसे पूरा यक़ीन था कि वो उन निगाहों की ज़द में ज़रूर हैं. भर पेट खाकर टहलने के बाद सोने की बारी आई. बिस्तर पर लेटा हुआ जैसे वो उसी का इंतजार कर रहा था. अचानक जैसे उसने पायलों की आवाज़ सुनी. छन छन की यह आवाज़ धीरे-धीरे उसे स्पष्ट सुनाई देने लगी. उसका रोम-रोम ख़ुशी से मचल उठा. हल्की चांदनी छिटकी हुई थी. हाथों में तांबे का जग और गिलास लिए ये वही तो थीं. पर ये पलकें क्यों नहीं खुल रहीं.

पास पड़े मोढें पर पानी रखती वो ठिठकी. चादर को ठीक किया. दूल्हे ने उसके हाथों को थामना चाहा, एड़ी-चोटी का दम लगा दिया कि किसी तरह नींद का सैलाब रुक जाए लेकिन आंखों ने खुलने से इनकार कर दिया.

पर ये दिल…

ये कहां रुकता है मचलने से. ऊपर चांदनी और सामने वो चांद-चेहरा. अचानक गालों पर कुछ शबनमी एहसास हुआ. दिल की धड़कनें बेतरह बेतहाशा भागने लगीं. लेकिन ये क्या! वो तो जा रही है. हाथ बढ़ा कर उसे रोकना चाहा. पर हाथ भी उठ न पाए. नहीं,रोकना ही होगा उसे..अचानक झटके से उसकी आंखें खुल गईं. पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया कि हो क्या रहा है. वो तो घर मे सोया था न!फिर इस घुप्प अंधेरे में… चारपाई के ऊपर… खुले दुआर में… दूर से आते सियारों की हुआँ हुआँ के बैकग्राउंड म्यूजिक और धीरे धीरे टपकती बारिश की बूंदों के बीच वो कब और कैसे पहुंच गया? झटके से उठना चाहा पर हाथ तो चारपाई में बंधे थे. टप से गालों पर फिर एक बूंद गिरी जिसे दिल ने थोड़ी देर पहले बोसा-ए-मुहब्बत समझा था. ‘उफ्फ’…दिल से कराह सी निकली..


…टू बी कंटीन्यूड!


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