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अगर बॉस को पता चला कि मैंने घूमने के लिए छुट्टी ली थी, तो हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी तेरहवीं किस्त-

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 – हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 – सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 – ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6 – डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7 – घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8 – काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9 – औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है

भाग 10 – सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके

भाग 11- ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?

भाग 12- जब देश में फैशन आता है तो सबसे पहले कमला नगर में माथा टेकते हुए आगे बढ़ता है


भाग 13 – वैष्णोदेवी से लौटने के बाद

पूनम जल्दी-जल्दी कुछ पन्नियों में अखरोट और अन्य सूखे फलों के साथ वैष्णो देवी का प्रसाद थोड़ा-थोड़ा रख रही थी. चन्दर ने उसे हैरानी से देखा- ‘ये क्या कर रही हो?’

पूनम ने कहा- ‘अरे! आप माता का प्रसाद अपने ऑफिस में नहीं बांटेंगे?’

चन्दर हंसने लगा- ‘मैडम, बीवी बीमार है, ये कह कर आफिस से छुट्टी ली थी. अगर बॉस को पता चलेगा कि ये छुट्टी मैंने घूमने के लिए ली थी, तो हमेशा के लिए मेरी छुट्टी कर देगा.’

पूनम पलकें झपकाती चन्दर को देखती रही. चंदर ने उसके कांधों पर हाथ रखा और आंखों में शरारत लहराते हुए कहा- ‘वैसे छुट्टी मिल भी गई तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है.’

शर्माती पूनम ने चन्दर का आशय समझ उसे परे ढकेला और कंफ्यूज़ सी बोली- ‘लेकिन आप यहां अड़ोस-पड़ोस में तो प्रसाद दे आइये!’

‘अरे यार! रहने भी दो न. इतना ज़रूरी नहीं ये सब. गांव नहीं है ये.’ कहता चन्दर कांधे पर तौलिया डाले बाथरूम की ओर बढ़ चला. गांव वाली बात से पूनम का मन भारी हो गया. वो सोचती रह गई कि ‘गांव नहीं है ये !’

गांव में तो किसी भी घर से जब कोई धार्मिक स्थान का दर्शन कर आता तो पूरे गांव में नाइन से प्रसाद बंटवाता. मीठी गोलियां जिसे इलायचीदाना कहते. अक्सर पेड़ा भी, पतला-चिपटा चूड़ा, और गले में पहनने वाले धागों के साथ अगर वो स्थान देवी का हुआ तो सिंदूर की पुड़िया भी. दादी पहले तो उस प्रसाद को सिर-माथे से लगातीं फिर सब में बांटती. बच्चों के गले मे धागा डालतीं और सिंदूर को घर की बहुओं को दे देतीं.

पूनम को वो नाइन भरपूर आकर्षित करती . सिर्फ प्रसाद ही नहीं बल्कि गांव में किसी भी घर अगर बहू-बेटियां मायके से ससुराल आतीं-जातीं तो उनके साथ चूड़े के अलावा लड्डू, खाजा, गाजा, घेवर और एकाध और कुछ मिठाइयां भी आतीं. इसे “भार” कहते. गांव की नाइन एक बड़े दउरा में ये सारी चीज़ें धरती और गांव के हर उस घर में बांटती जहां से लेन-देन चल रहा है, या जिस घर से अटिदारी-पटिदारी का झगड़ा-लफड़ा नहीं चल रहा है. बड़े तरीके से वो सारी चीज़ें बराबर बांटती.

खाजा मिठाई
खाजा मिठाई

बचपन में पूनम जब उसके दउरे में ताक-झांक की कोशिश करती, तो वो उसे ऐसे ढकती जैसे भानुमति का पिटारा हो. घर की बहू के हाथ की क्रोशिये की कढ़ाई किये हुए नमूने से ढका वो दउरा पूनम को उतना ही भाता था जितनी वो नाइन. उसके पास दुनिया-जहान की बातें थीं, अदाएं थीं और खबरें थीं. पड़ोस के गांवों तक की चटपटी और रहस्य-हास्य से भरी खबरें. भरपूर अदाओं से किस्सागोई करती नाइन को देखती पूनम सोचती कि इसके पास से मनोहर कहानियों के दस-बीस अंक तो बैठे-बिठाए निकल जाएंगे. किसकी बहू पेट से है पर सास ने ये बात छुपा रखी है कि किसी की नज़र ना लगे, किसके घर चूल्हे अलग करने की नौबत आ गई है, किसने कहां का खेत बेच बिटिया का दहेज सजाया तो किस बहू ने आंगन में खड़े होकर जेठ से ज़ुबान लड़ाई. सारी बातों के बाद दादी जब उसके घर-परिवार का हाल चाल लेतीं तो वो हठात चुप हो जाती. तब उसके होंठ हंसते और आंखें झर रही होतीं. उसे देख कर पूनम विस्मित हो जाती. दुख-सुख बतिया के जब वो उठती तो पूनम सोचती ‘क्या वो हर घर मे इतनी ही बातें करेगी जितनी दादी से अभी की? क्या वो फिर हंसेगी रोते-रोते? वो जाती तो दादी उसे कुछ चावल जिसे “सीधा” कहते, दे देतीं. वो उसे उसी दउरे में एक तरफ रख लेती. वो उसका मेहनताना होता. उसके जाते ही उस ‘बाएन’ (हां, चूड़े सहित उन मिठाइयों को ‘बाएन’ ही कहते थे) को खाने की जल्दी मच जाती बच्चों में. पर दादी पहले थोड़े दाने अपने पैरों तले मसल देतीं नजर-बीजर, जादू-टोना, कारन-वारन हटाने के लिए. और अगर ऐसा कुछ ‘उपरवारी’ है भी तो वो दादी को लगे, बच्चों को नहीं इसलिए बच्चों में बांटने से पहले बाएन खुद चखतीं.

‘दादी भी न!’ सोचती हुई पूनम की आंखें गीली हो गईं. उसने सोचा आज ही दादी को फ़ोन करूंगी.

घूमते-फिरते इतने दिन कैसे निकल गए पता ही नहीं चला. गांव से आने के बाद पूनम की उपस्थिति में चन्दर पहली बार ऑफिस जा रहा था. पूनम ने उसके लंच-बॉक्स में अपनी पाक-कला की सारी निपुणता परोस देने की कोशिश की थी.

‘दरवाजा बंद कर के रखना पूनम और ये भी और सीढ़ी से लगा दरवाजा भी. तुम्हारे पीने भर का पानी तो है, इसलिए अगर पानी वाला आए भी तो अंदर से ही मना कर देना. और सुनो, कैसी भी ज़रूरत हो, मुझे तुरंत फ़ोन करना. फोन को चार्ज रखना और हां, दूध मैं ला कर रख देता हूं अभी…’

‘बस, बस…अरे! हम कोई बच्चे हैं जो आप इतनी फिक्र कर रहे हैं?’ पूनम ने चन्दर को टोकते हुए कहा.

चन्दर को लगा शायद पूनम को उसकी बातें बुरी लग गईं. उसने बात सम्भालने की कोशिश की- ‘अरे यार, मैं जानता हूं तुम घर से बाहर रह चुकी हो और हॉस्टल में रहकर पढ़ाई-लिखाई की है. पर, समझा करो. वो बिहार था, ये दिल्ली है! सेकंडों में लोग उल्लू बना के चंपत हो जाते हैं. मुझे बस तुम्हारी फ़िक़्र है!

‘जानती हूं’ कहती हुई पूनम मुस्कुरा उठी. उसने चन्दर की शर्ट की जेब में बटुआ और रुमाल रखा. वही वाला जिस पर खुद कढ़ाई कर चन्दर का C और पूनम का P लिखा था. चन्दर मुस्कुराते हुए सीने पर हाथ बांधे खड़ा उसे देखे जा रहा था.

‘ओके फिर बाय’ आंखों से स्नेह बरसाते चन्दर ने कहा.

‘हां बाय. ध्यान से जाना.’ बदले में शर्म से झुकी जाती आंखों को उठाते हुए जवाब मिला.

‘अरे, रुको. लंच-बॉक्स तो ले लो.’

‘ओह्ह, हां…थैंक्यू…चलो फिर…बाय.’

लजाती पूनम अबकी मुस्कुराती हुई ‘बाय’ कह पलट गई.

अगले ही पल दरवाज़े पर कदमों की आहट से जान लिया कि चन्दर ही है. उसकी नज़र टेबल पर पड़े हेलमेट पर पड़ी. उसने सर पर हाथ मारा और गेट खोल हेलमेट आगे बढ़ा दिया.

सर खुजाते चन्दर ने हेलमेट थामा. फिर उसकी ज़ुबान पर ‘बाय’ आने ही वाला था कि पूनम ने कहा- ‘हां बाय-बाय’

दोनों हंस पड़े. उधर चन्दर ने बाइक स्टार्ट की इधर पूनम दौड़ के छत पर आ गई. दोनों की आंखों ने फिर हाले-दिल कहा-सुनाया और मुस्कुराती पूनम अंदर आ गई.

इस दृश्य की साक्षी रहीं बगल की बाल्कनी में खड़ी पंजाबी आंटी. मुस्कुराते हुए उन्होंने अपने चश्मे को आंखों पर अच्छे से सेट किया और बुदबुदा उठी- ‘चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात.’


…टू बी कंटीन्यूड!


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