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डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसका छठां भाग –

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 – हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 – सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 – ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं?


भाग 6 – काहे को ब्याहे बिदेस

चन्दर बीच बंगले में पीढ़े पर बैठा भोला ठाकुर के आने का इंतज़ार कर रहा था. उसे ये पता नहीं था कि भोला, जो पिछवाड़े सिर्फ एक चिलम लगाने गया था, एक के बाद एक गांजे की कई चिलमों के सेवन के बाद लम्बलेट हो चुका है. खिड़की से किसी चेहरे के झांकने की आहट पर चन्दर ने आशा भरी नज़रें दौड़ाईं और तुरन्त ही गुहार लगाई –

अरे भाई साहब,ये भोला ठाकुर का ज़रा पता करिये ना,आधी हज़ामत बना के, न जाने कहां चल दिए!

उस चेहरे पर उपहास की तीव्र लहर आई और आ के चली गई. तुरंत ही सहानुभूति भरे लहजे में जवाब आया –

अभी देखते हैं पहुना..!

उस मददगार ने भोला ठाकुर को तो नहीं खोजा लेकिन अपने जैसे कई और मददगारों को इत्तिला दे दी. जो भी आता, चन्दर के हालात पर सहानुभूति दर्शाता, भोला ठाकुर को खोज कर लाने का वादा करता और गायब हो जाता. देखते ही देखते चन्दर की आधी बनी दाढ़ी-मूंछ वाली तस्वीर गांव में वायरल हो चुकी थी. चन्दर समझ चुका था कि कांड हो गया है. गमछे से चेहरे को ढके वो अंदर कमरे की ओर भागा. गनीमत थी कि एक शेविंग किट उसके बैग में हमेशा मौजूद रहता थी.

सिर्फ आज का दिन… और उसके बाद दोनों पंछी उड़ जाने हैं कल इस कुरुक्षेत्र से दूर! किसी पर भरोसा नहीं करना है. हर एक शख़्स यहां अवसर की ताक में है.

चन्दर ने खुद को सम्भालते हुए मन ही मन कहा.

उधर आंगन में अगल-बगल की सारी महिलाएं एकत्रित हो चुकी हैं.सारी चाचियां, भाभियां और लड़कियां. कल विदाई है पूनम की तो आज ‘कसार’ बनेंगे. कसार यानी भुने चावलों को पीस कर उसमें ढेर सारा घी, लौंग-इलायची, गरी-छुहारों और मेवों से सने बड़े-बड़े लड्डू. एक पूरा कसार खाना किसी के भी बूते की बात नहीं. कसार बांधना भी एक रस्म है और ये कसार औरतें ही बांधती हैं. इन्हें बांधते समय ननदों-भावजों के बीच गाए जाने वाले ‘गारी-गीत’ सप्तम सुर पर पहुंचे हुए होते हैं. गलती से भी इस वक़्त कोई मर्द अगर आंगन में पहुंच गया तो वो भी हाथों-हाथ लिया जाता है. मुजफ्फरपुर से पढ़ रही नीलिमा ने जैसे ही बेतिया वाली भाभी को कसार बांधते देखा उसकी आंखें चमक उठी –

आम के कठवत
जौ के पिसान
सानेली हमार भाभी
बहियां पसार

बेतिया वाली कम थोड़ी थीं… उन्होंने भी नहले पर दहला थमाया-

खाए को मांगे ननदी गरम जिलेबिया
पीने को ठंढा पानी हाय रे ननदिया
सुते के मांगे ननदी,ललकी पलंगिया
लगा के मच्छरदानी,हाय रे ननदिया

इन कसारों के अंदर सास के लिए तोहफे भी छुपाए जाते हैं.बड़की अम्मा ने अलमारी में से एक जोड़ी टॉप्स निकाले और गोरखपुर वाली चाची को थमाया –

सास के लिए ई कान में का मंगाए हैं..तनी देखो ना,ठीक है?

चाची ने उलट पुलट कर देखा और पूछा-

जीजी, खाली पूनम की सास के लिए? उसकी चार-चार गो चचिया-सास लोग के लिए कुछ नही दोगी?

बड़की अम्मा ने मुस्कुराते हुए चार पुराने धराऊं चांदी के सिक्के निकाले और चाची के हाथ पर धर दिए. चाची ने वहीं पलंग पर बैठी पूनम की ओर देख कर मुस्कुराते हुए कहा –

हमरी पूनम का ससुराल में मज़ाक थोड़ी बनने देंगे हम!

कुथौनी के इन पांच कसारों को बाकी कसारों से अलग रखने की ताकीद करती चाची ने दउरे में करीने से सारे कसारों को रखवाया और बाकी सब मिठाइयों की पैकिंग को ध्यान से देखने लगीं. दो-दो दउरे बूंदी के लड्डू, गाजा, खाजा और घेवरों से रसोई-घर गमक रहा था.उन्हें लाल काग़ज़ से ढक कर बांधा गया. कतरनी चूड़े के दो बोरों को बड़े-बड़े दउरों में रख कर उझीला गया और उन्हें भी कागज़ और फ़िर लाल ही कपड़ों से बांधा गया.

कसार बंध गए तो बड़की अम्मा ने सारी औरतों को आवाज़ लगाई –

पूनम के दोंगा में जाने वाला सामान देख लो सब..फिर पैक कर के रखा जाएगा.सबेरे सबेरे विदाई है..बार-बार सामान नहीं खुलेगा.

ओसारे में सारी औरतें पहुंच चुकी थीं. ससुराल की पूरी पटीदारी के लिए कपड़े..बड़ों के सफारी-सूट से लेते हुए छोटे बच्चों के रंग-बिरंगे कपड़े, लड़कियों के सलवार-सूट और औरतों की साड़ियां..! लड़कियों का झुंड सर जोड़े सारी साड़ियों के साथ मैचिंग चूड़ी-बिंदी लगाकर पैक करता जा रहा था.

पूनम दीदी की ननद तो हिरोइन है अम्मा… का जाने तोहर सूट उसको पसंद आएगा कि नहीं?

एक लड़की ने हंसते हुए अम्मा से कहा.

अम्मा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया –

अरे हमरी पुनमी इतना प्यार से उसको पहिराएगी कि वो मना कर ही नही पाएगी!

ये कहती हुई अम्मा की नजरें पूनम को ढूंढने लगीं –

का जाने कहां है ई लड़की.. सांझे से दिखी नहीं!

अम्मा पूनम को खोजती हुई सीढ़िया-घर मे आई ही थी कि किसी के सिसकने की आवाज़ से ठिठक पड़ी. पूनम ही थी…! –

कल ही तो विदाई है.

अम्मा चाह कर भी उसे चुप कराने आगे नहीं बढ़ पाई. डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा धीरे से कमरे से बाहर निकल गई

काहे को ब्याहे बिदेस,
अरे लखिया बाबुल मोरे
हम तो बाबुल तोरे,बेल की लड़ियां
लिपटी-लिपटी रोए जाए
अरे लखिया बाबुल मोरे
हम तो बाबुल तोरे, पिंजरे की चिड़िया
कुहुकी-कुहुकी रोए जाए
अरे लखिया बाबुल मोरे
भइया को दिए बाबा महल-दोमहला
हमें तो दिए परदेस
अरे लखिया बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
अरे लखिया बाबुल मोरे.


…टू बी कंटीन्यूड!


Video देखें:

एक कविता रोज़: अज्ञेय की कविता ‘चीनी चाय पीते हुए’

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