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ये तो आंखें हैं किसी की... पर किसकी आंखें हैं?

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसका पांचवा भाग –

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 – हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 – सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे


भाग 5 – भूत पिसाच निकट नहिं आवे महावीर जब नाम सुनावें

इतनी गहरी कोलतारी रात पहले कभी न देखी थी. बादलों ने चांद को आंखें दिखा न जाने किस लोक भेज दिया था. झींगुरों ने बारिश की टिप-टाप को अपनी झाए-झाए से दबा रखा था. उसने खाट पर चित्त पड़े अपने शरीर को बमुश्किल अधलेटी अवस्था में लाया और अंधेरे में अपनी आंखें गड़ा दीं. वह किसी भी जीवित मनुष्य की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपस्थिति को थाहने की कोशिश करने लगा, पर झींगुरों और मेढकों के अलावा उसका कोई हमदर्द वहां न था. आंखें धीरे धीरे अंधेरे के अनुकूल हुईं तो कुछ परछाइयां बचपन मे सुने तमाम डरावने किरदारों का साक्षात्कार करवाने पर उतारू हो आईं. उल्टे पैरों वाली चुरइन (चुड़ैल), ‘घेंटकटवे’ और पानी मे डुबा के मारने वाले ‘बूड़े’ उससे दोस्ती करने आने लगे. बारिश की हल्की बूंदों में भी वह अपने पसीने को महसूस कर सकता था –

अरे…वो ये सब क्या सोच रहा है! साइंस का स्टूडेंट था वो. भूत प्रेत सब वहम है, ऐसा कुछ नहीं होता..!

बारिश भी हल्की टिप-टाप के बाद रुक गई थी.

बंधे हाथों को कैसे खोलूं? अरे वो क्या है? कहीं… न, ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं? उसका शरीर कहां है? ईश्वर!

उसने घबरा के अपनी आंखें दूसरी तरफ फेर लीं पर उसका ध्यान अभी भी उन आंखों पर ही था अचानक उसे किसी की सांसों की गर्मी अपने चेहरे पर महसूस हुईं. नहीं, ये वहम नहीं हो सकता. दिल, धड़कने के पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त करने पर तुला था. मन ही मन ‘जल तू जलाल तू, आई बला को टाल तू… भूत पिसाच निकट नहिं आवे महावीर जब नाम सुनावें… ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै…‘ सारे मंत्रों के अद्भुत रीमिक्स को, भय से किटकिटाते दांतों का ताल देते हुए, जैसे ही उसने अपनी गर्दन उस ओर घुमाई… अत्यंत क़रीब आ चुकी उन आंखों को शरीर मिल गया. भौं-भौं करती रहस्यमयी आंखों वाली वो काया पूंछ हिलाती दूर चली गई…

उफ्फ!! इस कुत्ते की तो…

बादल छंटने लगे थे और चांद अवसर की ताक में था. तभी दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई. कोई तेज़ी से उसकी तरफ़ आ रहा था… पूनम!!

आंखों को भरोसा ही नहीं हुआ कि ये वही है. हड़बड़ाई सी पूनम जल्दी जल्दी उसके हाथों के बंधन खोलने लगी. वो एकटक उसे देखे जा रहा था. आसमान हंसता हुआ उनपर रौशनी बरसा रहा था. ऊपर चांद…और चांद तले चन्दर और पूनम..!

का जाने कहवां अन्हरिया छुपाइल
दिनवा से दस गुना रतिया सोहाइल
अइसन बुझाला कि सगरो अंगनवा
फुलवा भईल कचनार
रसे रसे चंदा बसुरिया बजावे
नदिया में लहरेला प्यार

सुबह चिड़ियों के चहचहाने पर उसकी आंखें खुली. दिल ने चाहा थोड़ी देर और सो जाए पर छठी इंद्री सचेत हो उठी. झटके से उसने अपनी बगल को झांका. वहां कोई नहीं था. वह थोड़ा निश्चिंत हुआ. दरवाज़ा खटखटाती हुई चाय सहित साली साहिबा ने प्रवेश किया-

गुड मॉर्निंग जीजाजी. नींद तो अच्छी आई न आपको? लेकिन आप तो बाहर…

साली की मज़ाक उड़ाती आंखें और हंसते होंठ उसे ज़हर लग रहे थे.

गोरखपुर

चाय का कप हाथ मे लिए वो बिना उसकी तरफ देखे बाहर निकल गया. बाहर के छोटे बंगले में लोगों की बैठकी जम चुकी थी. सभी उसे देखते ही एकदम से हंस पड़े. वह कुछ समझ नहीं पा रहा था. बरामदे में बैठे गांव के एक छोरे ने अपना मोबाइल सेल्फी मोड में ऑन कर उसे थमा दिया.

सिंदूर, बिंदी, लाली और मोटी-मोटी भवों के साथ लाल रक्ताभ गाल लिए वह जोकर लग रहा था. इतना ही नहीं हाथ-पैरों पर भी आलता और नेल पॉलिश लगी हुई थी. सालियों ने अपना हुनर दिखा ही दिया था. खिसियानी सी हँसी हंसता वो वापस आंगन की ओर लपका. सालियां हंसे जा रही थीं.

का जी, ई सब सौक भी रखते हैं का आप?

– चेहरा धोते चन्दर से एक ने मज़े में पूछा.

जी..कोई दिक्कत है?

– दांत पीसते हुए जवाब मिला. साथ में सलाह भी –

मज़ाक करने का कुछ नया तरीका निकालिए आप लोग. हाथ पैर सोते में रंग देना या रात में खाट सहित बाहर पहुंचा देना, ई सब तो सौ साल पुराना मज़ाक है. सब पढ़ाई-लिखाई बेकार है आप लोग का.

इससे पहले कि सालियां कुछ जवाब देतीं वो बाहर निकल आया.

दो दिन बाद ही तो विदाई थी लड़की की. सभी दोंगे की तैयारियों में लगे थे. ससुराल से जितनी साड़ियां और जितने दउरे मिठाइयों और कतरनी चूड़े के आए थे, उससे कुछ बढ़ा के ही सामान जाएगा न मायके से. लेडीज़ डिपार्टमेंट को अगले दिन गोरखपुर जाकर साड़ियों की खरीदारी करनी थी. नौ बजिया पैसेंजर से सब चलेंगी. सुबह-सुबह दही-चूड़ा खाकर टाइमली निकल जाना ठीक रहेगा, खाने के चक्कर मे पड़ने से देर हो सकती है. रास्ते मे ‘पनियहवा स्टेशन’ पर दोपहर के खाने का इंतज़ाम हो जाएगा. पनियहवा स्टेशन का भी ग़ज़ब का क्रेज है उधर. नदी से निकली ज़िंदा मछलियां जिन्हें ताज़ी ताज़ी ही तल के परोसा जाता है. साथ मे या तो आप सूखा चूडा लें या फिर लिट्टी. यहां हर तरह की मछलियां मिलती थीं.

छोटी मछलियों से लेकर रोहू और कतला तक. अगर आप पैसेंजर या अपनी गाड़ी से जा रहे हैं तब तो कोई टेंशन नहीं. मछली का लुत्फ आराम से लें नदी किनारे. एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेनें या तो रुकतीं ही नहीं या बहुत कम समय के लिए रुकती हैं. शौकीनों ने इसका हल भी खोज निकाला था. मोबाइल पर अपनी पसंद की मछली का आर्डर दे देते हैं. बोगी नंबर बताया और गेट पर खड़े खड़े एक हाथ से पैसे दिए दूसरे से मछली ली. एकदमे नया ट्रेंड. मतलब पनियहवा से गुजरे और वहां की मछलियां नहीं खाईं ये हो ही नहीं सकता. वैसे लोलुप जिह्वा तो सिसवा बाज़ार स्टेशन के लाल-लाल आलू-चॉप पर भी विद्रोह करने लगती है.

आंगन में लेडीज़-गैंग में साड़ियों के लेटेस्ट फैशन पर चर्चा शुरू हो चुकी है. कढ़ाई की साड़ियों का फैशन अब जा चुका है और नेट की साड़ियां भी पुराने फैशन की हो चुकीं. दुलहिन को वैसे भी शादी में भारी-भरकम साड़ियां दी जा चुकी हैं. अब कुछ हल्की फुल्की प्रिंटेड सिफ़ान(शिफॉन) की साड़ियां खरीदी जाएं जिन्हें वो डेली पहन सके.

दोंगे के लिए आई कलकत्ता वाली मझली चाची ने अपनी एक्सपर्ट राय दी –

दिल्ली जा के त बिटिया साड़ी नहीये पहिनेगी. उहाँ त बित्ते भर का टीशर्ट- लोअर घर में अउरी बाहर जाने पर जीन्स पहिनेगी..तो बेहतर होगा हमलोग वही दें, जो वो पहीने.

बड़की चाची ने कुछ देर सोचने के बाद सर हिलाते हुए जवाब दिया –

हम्म, लेकिन आज तक किसी के दोंगा में जीन्स आ टीशर्ट नहीं गया है. लोग क्या कहेगा ससुराल में? दोंगा में त साड़ी गिनाता है कि केतना साड़ी आया है मायके से.

किसी का दिमाग काम नही कर रहा था.सबने अंत मे यही निर्णय लिया कि साड़ियां ही खरीदी जाएं. दिल्ली जा के बिटिया का जो मन करे, वो खरीद के पहने. एक चाचा के साथ अगले दिन गोरखपुर जाकर लेडीज़ ग्रुप ने गोलघर और आसपास खरीदारी करने का प्लान पक्का कर लिया.

उधर बाहर बाबूजी हजाम(नाई) के इंतज़ार में बैठे थे. गांव में हर बड़े घर के लिए एक नाई-परिवार फिक्स होता है. खेत के कुछ टुकड़ों के बदले पीढ़ियों से ये हजाम इन घरों की सेवा-टहल में लगे हैं. शादी-ब्याह, तीज़-त्योहार, जन्म-मृत्यु के तमाम कर्म-कांडों में हजाम-हजामिन की उपस्थिति अनिवार्य है. इतवार, बुध और शुक्र को इस परिवार का हजाम ‘भोला ठाकुर’ अपने उस्तरे को झोले में रख समय से पहुंच जाता है.

सबेरे-सबेरे भोला ठाकुर की चाल बता रही थी कि आज की खबर ब्रेकिंग है. बाबूजी ने उसे देखते ही कहा –

का रे भोलवा, जब से तोर पटीदार मुखियई का चुनाव जीता है, तुम सब का त दिमागे सातवे आसमान पर रहता है.

भोला ठाकुर ने उस्तरा सम्भालते हुए कथा शुरू की –

अरे ना ना मलिकार.. खिसियाइये मत. हम तो जादो-टोला में रुक गए थे. नगीना काका के दरवाजा पर बूझिये तो पूरा गांव इकट्ठा है. उनकका छोटका पोता भोटुआ के हवाला से मधुरिया उनके घरे आकर बैठ गई है. पंचायती तो हो के रहेगा.

बाबूजी –

मधुरिया?? ऊ भूजा(मुरमुरे) भुजने वाला दीना गोड़िन की बेटी मधुरिया?

भोला ठाकुर ने बाबूजी की बात काटते हुए और चन्दर पर अपनी ख़बर का असर जांचते हुए कहा –

हां बाबा, वही मधुरिया..वो कह रही है कि उसका और भोटुआ का बियाह हो गया है. घर-पटीदार, अड़ोसी-पड़ोसी सारे समझा के थक गए लेकिन वो कह रही है कि वो दोनों बालिग हैं.

अब तो चन्दर को भी इस ख़बर में इंटरेस्ट आने लगा. बालिग शब्द सुनकर बाबूजी की भुजाओं में चार सौ चालीस वोल्ट का करंट दौड़ गया. आग बबूला होते हुए बोले –

बालिग? ढेर कानून पढ़ ली है का ई बित्ते भर की छोकरी? ई नगिनवा काहे नहीं उसका बाल पकड़ के भूजा भूजने वाला घोंसार(मुरमुरे सेंकने वाला बड़ा चूल्हा) में झोंक देता है?

भोला –

अरे मलिकार..मधुरिया मैट्रिक पास है. सब कानून जानती है. पहिलहीं थाना में कह आई है कि ओकरा जान को खतरा है.

अब तो बाबूजी भी सोच में पड़ गए –

मने ई तो गजबे कलयुग आ गया है भाई! गांव में पढ़ाई के नाम पर पहिलहीं ई लडक़ी सब साइकिले-साइकिल नरक मचाई थी. अब बिना बियाहे किसी के भी घर जा के बैठ जाएगी सब?

अचानक बाबूजी को ख्याल आया –

ई नगिनवा का पोता भोटुआ कहां है? नगिनवा उसका हाथ-पैर काहे नहीं तोड़ रहा है लाठिये-लाठी?

भोला –

मलिकार, उसी की खोज में तो आधा गांव है. वो तो डर के मारे गायब है.

बाबूजी भोला का मुंह ताकने लगे. आज के मजनू’ भोटुआ के क्रांतिकारी किरदार का वर्णन सुन चन्दर की हंसी छूट गई. दोनों उसकी ओर पहले तो आश्चर्य से देखते रहे, फिर उनके भी कहकहे निकल पड़े.

गांव की बदलती बयार के विषय में सोचता चन्दर भी दाढ़ी बनवाने भोला ठाकुर के सामने बैठा. भोला को पहली बार गांव पधारे दामाद के सामने अपनी वाक्पटुता दिखाने का मौका मिला था. उसके दिमाग में भविष्य की प्लानिंग भी चल रही थी. किसी तरह दिल्ली जाकर अपना सैलून खोलने का मौका मिल जाए. इरादे तो और भी बहुत थे, उसने सुन रखा था कि बड़े-बड़े पार्लर में लड़कियों के बाल मर्द ही काटते हैं. इतना ही नहीं मैनीक्योर, पेडीक्योर और बालों में तेल मालिश तक मर्द ही करते हैं. उसने अक्सर सपने में खुद को किसी नाज़ुक बाला की सुनहरी ज़ुल्फ़ों में क़ैद देखा था. तो, भोला ठाकुर को किसी भी तरह दिल्ली वाले दामादजी को प्रभावित करना ही था. ज़ुबान और उस्तरा साथ-साथ चलाने में दक्ष, भोला ठाकुर को अपनी काबिलियत दिखाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलता. एक तरफ की दाढ़ी बना के दूसरी तरफ का बनाने से पहले उसने सोचा ‘क्यों न थोड़ा गांजा चढ़ा ले, ताकि बातों में रस आए.’ दामादजी को ‘एक मिनट में पानी पी के आते हैं’ कह के भोला पिछवाड़े निकल गया. इधर चन्दर जब तक कुछ समझता, उसे आधी बनी मूंछ में छोड़कर, भोला ठाकुर गधे के सिर से सिंग की तरह गायब हो चुका था!


…टू बी कंटीन्यूड!


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