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हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसका तीसरा भाग –

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भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 – सब्र ऐ दिल, कि ये हालत नहीं देखी जाती

ससुराल पहुंचने की जल्दबाजी और बेसब्री अपने ऊरूज़ पर थी. मंज़िलें हैं तो रास्ते हैं… रास्ते हैं तो भारतीय रेल है… और भारतीय रेल है तो सब्र लाज़िमी है. दूल्हे मियां ने भी खुद को समझाया –

सब्र ऐ दिल, कि ये हालत नहीं देखी जाती
ठहर ऐ दर्द कि अब ज़ब्त का यारा न रहा

साइड अपर बर्थ पर तकिए के सहारे उसने खुद को इस तरह टिकाया था मानो ट्रेन जब तक अपने गंतव्य पर पहुंच नहीं जाती, वह चादर से मुंह नहीं निकालेगा. चादर और उसके बीच उस चांद चेहरे के अलावा हवा की भी गुंजाइश बाकी नहीं थी. ख्वाबों में उसे आने की ताकीद करता वो न जाने कब सो गया. अचानक किसी के झकझोरने पर बेसाख़्ता ही उठ बैठा. पल भर को तो वो डर ही गया. कड़ियल मूंछों वाले एक महाशय उसी से मुख़ातिब थे –

का जी,ए सी का टिकट आपका चौकीदारी करने के लिए कटाए हैं? खाली आप सुत रहे हैं और बोगी भर का लोग आपको देख रहा है. हेतना जोर से खर्राटा लेता है कोई?

लोअर बर्थ पर सोई महिला करवट बदलते हुए कुनमुनाई –

एतना महंग टिकट का पइसा बर्बाद हो गया.

उसके बाद तो अपनी सीट पर उकड़ूं बैठे दूल्हे मियां ने नुसरत जी को सुनते रात बिताई.

अल्लसुबह सप्तक्रांति भी अनुमानित समय से सात-आठ घंटों की देरी से स्टेशन पहुंच ही गई. ससुरजी दामाद के स्वागत में दो गाड़ियों के साथ स्टेशन के बाहर ही खड़े मिले. ससुरजी दबंग थे. पुरानी ज़मींदारी नही रही तो क्या, जमींदारों वाली ठसक तो थी. दो दुनाली और कई लाठियों से लैस गाड़ियों को देख कर दामाद घबरा गया –

ये कैसा स्वागत है बे! कहीं दहेज लेने का बदला तो नहीं लेने तो आ गया ई सब!

लेकिन अब तो आ गए थे और ससुर जी मूंछो पर ताव देते एक पैर अपने सफारी जीप पर रखे मुस्कुराते हुए उन्हें ही देख रहे थे.दूल्हे के दिमाग मे आईडिया आया –

चकरा के गिर जाते हैं और याददाश्त खोने का एक्टिंग कर लेते हैं. बेहोश होने का ड्रामा करते समय ई सब आपस मे जो बतियाएगा उससे पता चल जाएगा कि ई सब के मन मे आखिर चल क्या रहा है.

जब तक वो इस आइडिए को अंजाम देता तबतक दो छोकरों ने अति उत्साह में उसे कांधों पर उठा लिया और ‘जीजाजी-जीजाजी’ का नारा लगाते ले चले गाड़ियों की तरफ. उनके उत्साह को देख ये तो साफ हो गया कि सारे बन्दे नेकनीयती से ही आये हैं.

सिल्क का कुर्ता और धोती पहने, ख़ास इत्र, गमकौआ ज़र्दा और लौंग-इलायची की खुशबू से सुवासित पहलवानी व्यक्तित्व वाले ससुर जी की अलग ही छटा थी. पैर छूने पर उन्होंने पीठ पर जो हाथ रखा, दामाद को एहसास हो गया कि ‘कलेजा मुंह को आने’ का प्रैक्टिकल अर्थ क्या होता है. ख़ैर, गाड़ियां अब घर की तरफ कूच कर चुकी थीं. शहर की सीमाओं से निकलते ही ससुर जी ने अपने पानदान से पान निकाल कर दामाद को पेश किया. चूना, कत्था, पीली पत्ती, काली पत्ती, लौंग, इलायची और बारीक कतरे कसैली (सुपारी) के टुकड़ों से सजा पान. पर ना,ससुरजी के सामने गुड-बॉय बनना है न! तो गर्व से कहा –

नहीं खाते हैं

ससुरजी ने आश्चर्य से उसे देखा –

का?

दामाद –

जी,नहीं खाते हैं.

यह सुन ससुर जी ने उसे जिस तरह देखा दूल्हे मियां रुआंसे हो गए –

पान नहीं खाते हैं? अरे! पान तो बड़-बुजुर्ग का आसिरवाद होता है. मर्द के मुंह का सोभा होता है. ई कवनो ऐब थोड़ी है. सौख(शौक) है सौख! आप पान नहीं खाते हैं?

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अफ़सोस से सर हिलाते ससुर जी ने बाकी लोगों पर निगाह डाली.सब समझ गए कि दूल्हे मियां पान नहीं खाते हैं ये बात इस गाड़ी से बाहर नहीं जानी चाहिए. दूल्हा ने अपने बगल में बैठे सहयात्री के मन ही मन हंसने से हिलते पेट को महसूस करते हाथ आगे बढ़ाया और मरी सी आवाज़ में कहा –

लाइए, खा लेते हैं.

इसपर ठहाका लगाते ससुर जी ने कहा –

ई पान आपको पचेगा? मूड़िये घूम जाएगा.चलिये घर चल कर सादी पत्ती के साथ सिर्फ कत्था,चूना और कसैली वाला पान खिला कर श्री गणेश करवाते हैं.

दूल्हे का तो पहला इम्प्रेशन ही खराब हो गया .वह दुखी मन से गाड़ी में बजते मेहंदी हसन के साथ हो लिया

शिकवा न कर, गिला न कर. ये दुनिया है प्यारे यहां ग़म के मारे तड़पते रहे.

सड़कों की स्थिति ये थी कि पीछे बैठा कोई भी शख्स बिना अतिरिक्त श्रम के एक बोरी चावल या चूड़ा सूप में रख कर फटक सकता था. हिचकोले लेती गाड़ी अद्भुत दोलन करती हुई सारे यात्रियों को एक साथ दाएं या बाएं झुलाती बढ़े जा रही थी. दो तोंद वालों के बीच बैठे दामादजी ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो शीशे का कोई पीस ‘हैंडल विद केयर’ की वार्निंग के साथ मोटे थर्मोकोल के बीच रख कर कहीं पहुंचाया जा रहा हो. बरसात में सड़कें अपने भीषण रूप में आ चुकी थीं. डेंगा-पानी खेलती गाड़ी घर तक पहुंचने ही वाली थी कि मानिनी दुल्हन सी अचानक रुक गई. ड्राइवर ने बड़े हाथ-पैर जोड़े पर गाड़ी का मौन न टूटा. दरअसल मुहान के बड़का गड़हा(गड्ढा) में गाड़ी फंस चुकी थी. वो न आगे जाए न पीछे. अब क्या किया जाए? धक्का देने की नौबत आ गई.

ससुर-दामाद और ड्राइवर को गाड़ी में छोड़ बाकी लोग उतरे और धक्का देना आरम्भ किया पर गाड़ी ज़िद पर अड़ी रही. कुछ और एनर्जी की ज़रूरत थी.ससुर-दामाद ने एक दूसरे की ओर देखा,दोनों बीर-बलवान अगले ही पल गाड़ी से उतर पड़े. ससुर जी ने तो धोती को घुटनों तक कर लिया पर बेहद टाइट जीन्स पहने दामाद जी के लिए ये मुश्किल काम था. वो ऐसे ही मैदान में उतर पड़े. सबने मिल कर दम लगाया पर गाड़ी एक इंच भी आगे न बढ़ी.

दूल्हे मियां ने सोचा यही मौका है नंबर बनाने का. शर्ट की आस्तीनें ऊपर कीं और एक सौ बीस डिग्री का कोण बनाते, ज़ोर से ‘जय बजरंग बली’ का जयकारा लगाते गाड़ी की ओर बढ़े ही थे कि बाकी लोगों के सम्मिलित बल की वजह से गाड़ी अचानक ही आगे बढ़ गई. दूल्हे का सारा बल, अगले ही पल दलदल में था.

दूल्हा गड्ढे में ज़मींदोज़ हो चुका था. गाड़ी स्टार्ट होने से खुश ससुरजी ने प्रसन्नता से अपने साथ खड़े दामाद की ओर देखा. वो वहां नहीं था. बाकी लोगों की नज़रों का पीछा करते उन्होंने नीचे देखा तो दूल्हा कीचड़ में सना हतप्रभ सा बेंग(मेंढक) जैसी अवस्था मे दिखा. ना जाने कहां से उसी वक़्त बरसाती मेढकों की टर्र-टर्र भी शुरू हो गई.

सफेद शर्ट और ब्लू जीन्स में अब रंगों का कोई फर्क बाकी नहीं था. अंग-अंग में कीच-रंग समा चुका था. दूसरी गाड़ी से वडाली ब्रदर्स पूछ रहे थे –

ऐ रंगरेज़ मेरे… एक बात बता रंगरेज़ मेरे… ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है…

ख़ैर,अद्भुत स्केटिंग करता, फिसलता- सम्भलता दूल्हा वापस गाड़ी तक पहुंचा.गाड़ी में पड़े एक बोतल पानी से किसी तरह आचमन और शुद्धिकरण की प्रक्रिया हुई. प्रिय के पास पहुंचने का सारा उत्साह उफ़न कर बुझ चुका था पर –

गो आबले हैं पांव में फिर भी ऐ रहरवो
मंज़िल की जुस्तुजू है तो जारी रहे सफ़र

इसी हालत में, कुछ गीले-कुछ सूखे, कुछ स्याह-कुछ सफ़ेद कलेवर में दूल्हा घर पहुंचा. हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इन्तज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं. सबसे पहले शर्माए-सकुचाए से वो ही उतरा पर न जाने क्यों किसी कन्या ने उसपर ध्यान ही नहीं दिया. दूल्हे की आशा भरी नज़रें अब मायूस निगाहों में बदलने लगीं. सालियां दिल्ली से आ रहे सूटेड-बूटेड जीजा की मुन्तज़िर थीं. उन्हें क्या पता था कि उनके जीजाजी असल माटी के भभूत से लिपटे उनके सामने होंगे.

पर दूर किसी चिलमन से झांकती उन आंखों ने पहचान लिया था. दौड़ती भागती आती पायल की छमछम बरसाती के दरवाजे के पहले ही रुक गई. एक लड़की को बुला कर समझाया गया और उसके हाथो में तौलिया और साबुन पकड़ाया गया. दुआर पर ही लगे चापाकल पर दूल्हा नहाने चला. एक बच्चा चापाकल चला रहा था पर ऐसे खुले में नहाने की आदत तो न जाने कब की छूट चुकी थी.

एक तो बरसाती में खड़ी सालियों की निगाहें उसे अपनी पीठ में धंसती महसूस हो रही थीं, दूसरी उनकी खिलखिलाहट. उफ्फ!

पर मरता क्या न करता.जैसे-तैसे नहा के तौलिए के परिधान में खुद को समेटे जीजाजी ने आगे पीछे सालियां के साथ घर मे प्रवेश किया. दूल्हा सोच रहा था क्या ससुराल में किसी ने ऐसे, इस भेस में कभी प्रवेश किया होगा? वो भी पहली बार…


…टू बी कंटीन्यूड!


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