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दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है उसका पहला भाग.

Shadi Laddu Motichoor - Banner

एपिसोड 1 – सब दिन होत न एक समाना

दिल्ली वाले दामाद जी शादी के बाद पहली बार गांव आए. गांव के सारे छवारिक उनको शिकारियों की तरह ताड़ रहे थे. उनका पहनना- ओढ़ना, हंसना-बोलना, खाना-पीना सब कुछ दुश्वार हुआ जा रहा था. कपड़े, जूते, घड़ी, मोबाईल, रुमाल… हर एक चीज़ उन सबकी आंखों की एक्सरे मशीन से होकर गुजरती. चाहे कितनी भी मशहूर या ओरिजिनल ब्रांड क्यों न हो, उसे ओल्ड या फर्स्ट कॉपी कहकर मज़ाक ही उड़ाया जाता. बेचारे वैसे भी डरते-डरते ससुराल पहुंचे थे. अगर ‘दोंगा का साईत’ नहीं होता तो आते भी नहीं.

शादी में साले-सालियों ने उनके भाई-बंधुओं का जो हश्र किया था, अभी भी सोच के झुरझुरी आ जाती है. पर आते नहीं तो कनिया जाती कैसे उनके साथ? शादी के बाद साल भर तो ससुराल में ही रोक ली गई थीं. घर का कायदा-कानून भी तो सिखाना था! एक बार दिल्ली चली गई तो फिर कहां हाथ आने वाली थी? फिर तो होली-दिवाली में आ जाए उतना ही बहुत है.

तो  दूल्हा दिल्ली में और दुलहिन ससुराल में! ‘वाट्सएप्प’ ने इस दूरी में और भी आग लगाने का काम किया. इंटरनेट नवकी दुलहिन के कमरे में ढंग से  पकड़ता नहीं. जियो ने इस दौरान जितनी मलामतें सुनी होंगी न. मुकेश अम्बानी की हिचकियां बेतहाशा बढ़ गई होंगी.

दिल्ली का सांकेतिक फोटो (रायटर्स)
दिल्ली  (रायटर्स)

‘आज खाने में क्या था?’ या ‘आज किस रंग की साड़ी को तुम्हें स्पर्श करने का सौभाग्य मिला?’

इसका जवाब उस व्यंजन की तस्वीर भेज के या उस परिधान में लिपटी अपनी तस्वीर के साथ  दिया जाना तय हुआ था. पर हाय रे नेटवर्क! स्थिति ये होती कि पलंग पर चढ़ के खिड़की के सींखचों में मोबाइल को टिकाए खड़ी है कनिया. निठाह अध-रतिया में. रह-रह के दूर सरेह में बोलता सियार उनकी छुई-मुई काया को डर से कंपा देता पर ‘ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजै,एक आग का दरिया है और डूब के जाना है.’

इसी प्रेमाग्नि की धाह के सहारे मोबाइल नामक अस्त्र से लैस वो लगी रहती. धीरे-धीरे अपलोड होती तस्वीर अंत तक पहुंच कर जब अचानक ही फिर से अपलोड होने की मांग करती, तब घंटा भर सास के पैर दबाने के बाद निढाल हुई कनिया का धैर्य जवाब दे जाता. फिर क्या, उधर तस्वीर के बजाए इधर शिव का तीसरा नेत्र खुल जाता. और फिर सीधे पतिदेव को ब्रह्मास्त्र के रूप में अगले दिन एक मैसेज जाता. ‘अगर यहीं पे रखना था तो काहे बियाह किए हमसे? साल भर का गौना ही करवा लिए होते तो अच्छा था. कम से कम अपने नईहर में छत पर चढ़ कर इंटरनेट तो ढंग से पकड़वा लेते.’

दुलहिन को तस्वीर नहीं भेज पाने से ज्यादा अफसोस इस बात का होता कि ख़ामख़ा एक घंटा लगा कर तैयार हुए और कमबख्त इस इंटरनेट ने पूरी रात खराब कर दी.

तस्वीर साभार - rajyasameeksha.com
गांव (तस्वीर – rajyasameeksha.com)

इधर बेचारे पतिदेव के टेलीफोनिक रोमांस का बैंड बज जाता. बस अब और नहीं! उन्होंने कमर कस के मां-बाबूजी के आगे सुबह शाम अरज लगानी शुरू की. इतनी प्रार्थना पर तो ब्रह्माजी भी पिघल जाते, वो तो फिर भी माता-पिता थे. ‘सब दिन होत न एक समाना’

तो, शुभ लगन देख के दुलहिन के दिल्ली जाने से पहले सोचा गया कि लगे हाथों दोंगा (दुलहिन जब पहली बार मायके जाए) भी निपटा दिया जाए ताकि बाद में आने जाने में दिक्कत न हों. दोंगे की तैयारियां होने लगीं. दुआर पर हलवाइयों ने बड़े-बड़े कड़ाह चढ़ा दिए.पांच दउरा मिठाई जिसमे बड़े-बड़े लड्डू, खाजा, गाजा और बगहा में बनने वाले वाले स्पेशल घेवर और बगहा की ही धुवास वाली इमरती के साथ दो बोरा मरचा का चूड़ा और 15 नई साड़ियों के साथ दुलहिन के दोंगे का सामान सजाया गया. दाई, नाऊ और पंडिताइन की साड़ियां अलग से. लाल बनारसी के ऊपर ब्याह वाली लाल चादर(चुनरी) ओढ़े, पांव में महावर, पायल, बिछिया, कमर में करधनी, शादी में चढ़ाया गया हार, ससुर जी का दिया मुंह-दिखाई का भारी कंगन, टीका, नथ और झुमके में सजी दुल्हन का चेहरा देख सास निहाल हो उठी. तुरंत मन ही मन कोट-माई से  अपनी बहू को हर ऊपरवार नजर-बीजर से बचाने की याचना की. मुहूर्त देख कर उस समय घर में मौजूद देवरों के साथ दुल्हन को मायके विदा किया गया.

जो खाए पछताए, जो न खाए ललचाए (तस्वीर: फीचर्स)
जो खाए पछताए, जो न खाए ललचाए (तस्वीर: फीचर्स)

सवा महीने बाद का दिन उतराया है ससुराल वापसी का. उसके बाद अगर सब ठीक रहा तो ‘दिल्ली दूर नहीं’. इधर मन ही मन मोतीचूर हो रहे लड्डुओं को काबू में रखता दूल्हा  एक-एक दिन कैलेंडर में गोल निशान लगाकर बिता रहा था. आषाढ़ की बारिश ने सावन तक इंतज़ार करने का धैर्य भी नहीं छोड़ा.

लेकिन ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की’.

बीवी को लेने जाने और ससुराल में पहली बार मेहमान बनने के सुख के समानांतर चंट साले-सालियों की भयंकर यादें उसकी सारी खुशियों को भाप में बदल  रही थीं. वो नहीं जानता था कि दुलहिन के अलावा कुछ और भी हैं जो उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.


…टू बी कंटीन्यूड!


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