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दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है उसका दूसरा भाग –

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 – दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 – दिवस जात नहीं लागत बारह

सच है! दिन बीतते देर नहीं लगती पर उससे भी बड़ा सच ये है कि इंतज़ार के पल सदियों का समय लेते हैं. ख़रामा-ख़रामा सवा महीने भी सवा सौ सालों का समय लेकर आख़िर बीत ही गए. हर तरफ सब्ज़ रंग समेटे. गरज-बरस कर राग मल्हार गाते घटाओं के साथ झूम के सावन भी आ गया. मतलब, दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया. दूल्हे ने लगातार हनुमान चालीस पढ़कर साले-सालियों की रावण और शूर्पणखा सरीखी छवियों को मन-मानस से धो-पोंछ के हटा देना चाहा और ससुराल जाने की तैयारियों में लग गए. ना, कुछ भी नेगेटिव नहीं सोचना है. अचानक आंखों के सामने झम्म से दुल्हन का चेहरा आ गया. मीर, गालिब, फ़िराक़ और फ़राज़ की शायरी के चश्मे से दुनिया को देखने वाला दूल्हा कुछ सोचकर मुस्कुरा उठा.

ये किसकी जुम्बिशे-मिज़्गां रुबाबे-दिल को छूती है,
ये किसके पैरहन की सरसराहट गुनगुनाती है.

हालांकि ससुराल में उसे कुल जमा दो दिन ही रहना था पर तैयारियां बड़ी जतन से की जाने लगीं. सुबह उठने पर सैर के लिए नहर तक जाने का सोच रखा था. इसके लिए खास स्पोर्ट्स शूज और ट्रैक सूट के साथ ब्रांडेड इयरफोन खरीदे गए.

सावधानी ही सुरक्षा है!

– राह चलते गांव का कोई शोहदा टोक न दे, रोक न दे, इसलिए कानों में ईयरफ़ोन होने का भरम बनाए रखना था कि उसने कुछ सुना ही नहीं. अपनी इस चालाकी पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए उसने अपने ही हाथों अपनी पीठ थपथपाई. नहर से लौटकर नहा-धोकर पहनने के लिए चार जोड़ी नए पैंट-शर्ट और रात में सोने के लिए नफीस चिकनकारी का लखनवी कुर्ता पैजामा, चेतन भगत के अंग्रेजी वाले उपन्यास(हिंदीअनुवाद वाले नहीं), माउथवॉश, ससुर जी के लिए गीता-प्रेस से एक महीना पहले ही मंगवा कर रख लिए गए ‘कल्याण’ के विशेषांक. सब चाक चौबंद! वो धीरे से बुदबुदाया –

कुछ छूट तो नहीं रहा? नहीं.

पर ये वक़्त क्यों नहीं बीतता?

नेट से चेक करना पड़ेगा. सप्तक्रांति सही टाइम पर तो आ रही है न? बालों का कुछ करा लें क्या? ना, जेल से काम चल जाएगा.

दूल्हा

तभी वह ज़ोर से चिल्लाया –

ओ तेरी. डिओडरेंट तो भूलिए गए. ई तो कांड हो जाता. रुमाल है न?

आखिरकार सारे सामानों पर हज़ारवीं बार नज़र डालने के बाद उसने बैग की चेन बन्द की.

अचानक ख्याल आया –

एक साल में कहीं वो बदल तो नहीं गई होगी? अगर बदल गई होगी, मोटा गई होगी तो हम पहचानेंगे कैसे? उसकी बहन भी तो उसी के जैसी है. एक काम करेंगे, उसको पहिले ही बोल देंगे कि तुम गुलाबी रंग का कपड़ा पहनना उस दिन.

दूल्हे को अपने मैथिल मित्र की शादी का एक दृश्य याद आ गया. ‘नैना -जोगिन’ रस्म थी जिसमें होने वाली दुल्हन और साली को चुन्नी से ढक कर बैठा देते हैं और दुल्हा को अपनी दुल्हन की पहचान करनी पड़ती है. दूल्हा जिसे भी अपनी दुल्हन बताएगा उसी से उसकी शादी होगी. ऐसा उसे बताया गया था. ये सुन के पहली बार किसी मैथिली शादी के दर्शक बने हमारी कहानी के दूल्हे मियां का तो दिमाग हिल गया था.

दूल्हा चिन्ही लियs अहां अपन दुलारी के…

– गीत गाती सहेलियां और कंफ्यूज़ कर रही थीं. खैर उस मैथिली शादी में तो ऐसी कोई गलती नहीं हुई. पर साली का ख्याल आते ही दूल्हे मियां और रुआंसे हो गए. दरअसल उसकी शादी के समय फ़िल्म ‘बकलोल दूल्हा’ रिलीज़ होने वाली थी. शादी के दिन द्वार-पुजाई के समय ही जीजा का जायजा लेती साली साहिबा ने मज़े लेते हुए कहा –

जीजाजी,पेपर में छपा है, बकलोल दूल्हा तैयार, रिलीज़ के लिए.

सभी ज़ोर से हंस पड़े थे. शादी के दो दिन बाद जब गौना की रस्म के लिए दुबारा नौशे(दूल्हा) अपने भाई बंधुओं के साथ आया तो सखियों संग कहकहे लगाती साली साहिबा ने डिसअपॉइंटिंग नजरों से देखते हुए,अख़बार के उस पन्ने को उनकी आंखों के सामने लहरा दिया, जिसमे बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था –

‘बकलोल दुल्हा फ्लॉप!’

दूल्हे के दिमाग मे किसी फारवर्ड मोड पर लगाई गई फ़िल्म की तरह बातें आ-जा रही थीं. उसने हड़बड़ा कर स्टॉप का बटन दबाया और मन ही मन ‘हर हर महादेव’ का नारा लगाते हुए उठ खड़ा हुआ. ‘मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है’ तो ‘मंज़ूरे ख़ुदा’ के सहारे अपनी प्रेम की नैय्या में पतवार डाले हमारा बांका जवान चल पड़ा. दिल्ली स्टेशन को धीरे धीरे छोड़ती ट्रेन मंज़िल के मुन्तज़िर बढ़ी जा रही थी. कई रातों से जागे दूल्हे मियां को नींद लेनी ही थी ताकि अगली सुबह वो तरो ताज़ा दिखे. आंखों में उस चांद चेहरे को बसाए उन्हें फराज़ याद आए –

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं,
अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं.

अब तो बस यही उम्मीद है कि सप्तक्रांति सही समय पर कल मंज़िल तक हमारे दूल्हे मियां को पहुंचा दे…


…टू बी कंटीन्यूड!


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