नहीं! बंदर नहीं थे हम
नहीं, बंदर नहीं थे हम, ग़लतफ़हमी हुई सबको!
न मुंह पर बाल उगते है, न कोई नक़्श बंंदर-से, सरापा हम है इंसां, और इंसां ही सदा से है. ज़मीं पर आते ही चलने लगे दो पैर पे हम तो, हमारी सोच में गहराई वक़्त-ए-इब्तिदा से है. हमारे बाप-दादा, मां-बहन बचपन से इंसां हैं, जो बंदर रह चुके हैं, वो किसी दूजे जहां में हैं. हमारी उम्र से लंबी है, आदम ज़ात की तारीख़, जो साइंसदान ये कहते हैं, सब के सब गुमां में हैं. नहीं देखा है हमने, बंदरो का आदमी बनना, सो बंदर थे कभी पुरखे, ये मुमकिन हो नहीं सकता. नज़रिया हो ना अपना तो, सदाक़त कैसे कह दे हम, सही हो साइंस के क़िस्से, ये मुमकिन हो नहीं सकता.नहीं, बंदर नहीं थे हम, ग़लतफ़हमी हुई सबको!
लल्लनटॉप में पढ़िए एक कविता रोज़:
‘मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं’ बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समन्दर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है? ‘पंच बना बैठा है घर में फूट डालने वाला’ पाब्लो नेरुदा की कविता का अनुवाद: अगर तू मुझे भूल जाए एक कविता रोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना और सादा पानी पीना…Video देखें: कुमार विश्वास के साथ खेल कहां हुआ:













