The Lallantop

नहीं, बंदर नहीं थे हम, ग़लतफ़हमी हुई सबको

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए हुसैन हैदरी को

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop
इंदौर, मध्यप्रदेश के हुसैन हैदरी अपनी नज़्म ‘हिंदुस्तानी मुसलमान’ से चर्चा में आए और बाद में फिल्मों के लिए लिरिक्स लिखने लगे. हाल ही में रिलीज़ हुई अनुराग-कश्यप की फ़िल्म ‘मुक्काबाज़’ में उनके द्वारा लिखी लिरिक्स काफी लोकप्रिय हुई हैं. दूसरी तरफ इन दिनों ‘बंदरों’ के बारे में एक केंद्रीय मंत्री का बयान खूब चर्चा बंटोर रहा है जिसमें उन्होंने कहा है कि – 'हमारे पूर्वजों ने कभी कपि के मनुष्य बनने का ज़िक्र नहीं किया और इंसान जब से धरती पर देखा गया है इंसान के रूप में ही देखा गया है. इसलिए, डार्विन का सिद्धांत बैज्ञानिक रूप से गलत है.' केंद्रीय मंत्री के इसी कथन को आधार बनाकर हुसैन हैदरी द्वारा लिखी एक नज़्म आपको दी लल्लनटॉप के माध्यम से पढ़वा रहे हैं:

नहीं! बंदर नहीं थे हम

नहीं, बंदर नहीं थे हम, ग़लतफ़हमी हुई सबको!

न मुंह पर बाल उगते है, न कोई नक़्श बंंदर-से, सरापा हम है इंसां, और इंसां ही सदा से है. ज़मीं पर आते ही चलने लगे दो पैर पे हम तो, हमारी सोच में गहराई वक़्त-ए-इब्तिदा से है. हमारे बाप-दादा, मां-बहन बचपन से इंसां हैं, जो बंदर रह चुके हैं, वो किसी दूजे जहां में हैं. हमारी उम्र से लंबी है, आदम ज़ात की तारीख़, जो साइंसदान ये कहते हैं, सब के सब गुमां में हैं. नहीं देखा है हमने, बंदरो का आदमी बनना, सो बंदर थे कभी पुरखे, ये मुमकिन हो नहीं सकता. नज़रिया हो ना अपना तो, सदाक़त कैसे कह दे हम, सही हो साइंस के क़िस्से, ये मुमकिन हो नहीं सकता.

नहीं, बंदर नहीं थे हम, ग़लतफ़हमी हुई सबको!


लल्लनटॉप में पढ़िए एक कविता रोज़:

‘मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं’ बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समन्दर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है? ‘पंच बना बैठा है घर में फूट डालने वाला’ पाब्लो नेरुदा की कविता का अनुवाद: अगर तू मुझे भूल जाए एक कविता रोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना और सादा पानी पीना…
Video देखें: कुमार विश्वास के साथ खेल कहां हुआ:

Advertisement
Advertisement