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'पंच बना बैठा है घर में फूट डालने वाला'

एक ही कवि ‘सांसों का हिसाब’ भी मांगता है और चलते रहना भी सिखाता है. कभी धिक्कारता है कभी हौसला देता है. वो कवि हैं शिवमंगल सिंह ‘सुमन’. 5 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में जन्मे सुमन पद्मश्री और पद्मभूषण से नवाज़े गए. एक कवि की रचनाओं में इतने आयाम होना हैरत में डालता है. उनकी कविताओं की फेहरिस्त में ‘कितनी बार तुम्हें देखा पर आंखें नहीं भरीं’ है तो ‘तूफानों की ओर घुमा दो नाविक’ भी है. टाइटल से ही समझ आता है दोनों कविताओं का रंग कितना अलग है. आज इनका बड्डे है.

इनकी कविता ‘मेरा देश जल रहा’ आप भी पढ़िए. ये कविता आज और भी प्रासंगिक लगती है. जब नाम के दूसरे हिस्से के लिए घर जलाए जा रहे हैं. जब अपने धर्म को ‘बचाने’ के लिए दूसरे के कुनबे को तहस-नहस करने की चाहत है. ऐसे में ये कविता आईना दिखाती है. हमें भी और मुखिया को भी. देखिए…


‘मेरा देश जल रहा’

घर-आंगन में आग लग रही
सुलग रहे वन-उपवन,
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर-छाजन
तन जलता है, मन जलता है
जलता जन-धन-जीवन,
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन
दूर बैठकर ताप रहा है,
आग लगाने वाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

भाई की गर्दन पर
भाई का तन गया दुधारा
सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बंटवारा
एक अकड़कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगे,
और दूसरा कहता तिल
भर भूमि न बंटने देंगे
पंच बना बैठा है घर में
फूट डालने वाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

दोनों के नेतागण बनते
अधिकारों के हामी,
किंतु एक दिन को भी
हमको अखरी नहीं गुलामी
दानों को मोहताज हो गए
दर-दर बने भिखारी,
भूख, अकाल, महामारी से
दोनों की लाचारी
आज धार्मिक बना,
धर्म का नाम मिटाने वाला
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

होकर बड़े लड़ेंगे यों
यदि कहीं जान मैं लेती,
कुल-कलंक-संतान
सौर में गला घोंट मैं देती.
लोग निपूती कहते पर
यह दिन न देखना पड़ता,
मैं न बंधनों में सड़ती
छाती में शूल न गढ़ता.
बैठी यही बिसूर रही मां,
नीचों ने घर घाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

भगत सिंह, अशफाक,
लालमोहन, गणेश बलिदानी,
सोच रहें होंगे, हम सबकी
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की
देकर खाद खून से सींचा,
अंकुर लेते समय उसी पर
किसने जहर उलीचा.
हरी भरी खेती पर ओले गिरे,
पड़ गया पाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

जब भूखा बंगाल,
तड़प मर गया ठोककर किस्मत,
बीच हाट में बिकी
तुम्हारी मां-बहनों की अस्मत.
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख-बिलख नर-नारी,
कहां कई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी.
तब अन्यायी का गढ़ तुमने
क्यों न चूर कर डाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

पुरखों का अभिमान तुम्हारा
और वीरता देखी,
राम-मुहम्मद की संतानों!
व्यर्थ न मारो शेखी.
सर्वनाश की लपटों में
सुख-शांति झोंकनेवालों!
भोले बच्चे, अबलाओं के
छुरा भोंकनेवालों!
ऐसी बर्बरता का
इतिहासों में नहीं हवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

घर-घर मां की कलख
पिता की आह, बहन का क्रंदन,
हाय, दूधमुंहे बच्चे भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी?
मुंह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे न भारतवासी.
हंसते हैं सब देख
गुलामों का यह ढंग निराला.
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.

जाति-धर्म गृह-हीन
युगों का नंगा-भूखा-प्यासा,
आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा.
ये छल छंद शोषकों के हैं
कुत्सित, ओछे, गंदे,
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फंदे.
तेरा एका गुमराहों को
राह दिखाने वाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला.


ये कविता ‘कविता कोश’ से ली गई है.


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