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वो आनंदभरा स्थान जहां दो पुरुषों के प्रेम में कोई बाधा नहींः 'कॉल मी बाय योर नेम'

ऑस्कर 2018 की एक मस्ट वॉच फिल्म.

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ऑलिवर और एलियो एक दुपहरी में साथ वक्त बिताते हुए. ये ऐसी ही एक आउटिंग हैं जिनमें दोनों करीब आते हैं. (फोटोः सोनी पिक्चर्स क्लासिक्स)
“तुम अपनी लाइफ कैसे जीते हो ये तुम्हारा निजी मसला है, लेकिन बस ये याद रखना, कि हमारे दिल और शरीर हमें सिर्फ एक बार ही दिए जाते हैं. और तुम्हे पता चले, उससे पहले ही तुम्हारा दिल थककर खत्म हो चुका होता है. जहां तक शरीर की बात है तो एक ऐसा समय आता है जब कोई इसकी ओर देखता भी नहीं है, कोई इसके करीब आना चाहे ये तो दूर की बात है. अभी तुम्हे शोक है, दर्द है. इसे मारना मत. इसी के साथ इस रिश्ते के आनंद को तुमने महसूस किया है.”
- प्रोफेसर पर्लमैन अपने 17 बरस के बेटे एलियो से कहते हुए. एलियो को हाल ही में पिता के एक अमेरिकी स्टूडेंट ऑलिवर से प्रेम हुआ था और दोनों में संबंध भी बने. लेकिन ऑलिवर के जाने के बाद एलियो दुखी और कन्फ्यूज है. ऐसे में उसके दुर्लभ समझदारी वाले पिता इस विषय में उससे लंबी बातचीत करते हैं.
ये कहानी 1983 की है. उत्तरी इटली में फलों (खासकर आड़ू), फूलों और हरियाली से लदे खूबसूरत ग्रामीण इलाके में एक बड़ा घर है. जहां बुद्धिमान और आर्टिस्टिक लड़का एलियो (टिमथी शालामे) रहता है. सिर्फ 17 बरस का है. पिता आर्कियोलॉजी के प्रोफेसर हैं - प्रो. पर्लमैन (माइकल स्लटबर्ग). मां ट्रांसलेटर हैं. एलियो म्यूजिक बनाता है, टाइम पास करता है, पढ़ता है या अपने दोस्तों के साथ समय बिताता है. इस बीच उसके पिता का एक अमेरिकन स्टूडेंट ऑलिवर (आर्मी हैमर) अपने प्रोजेक्ट के सिलसिले में कुछ दिन रहने आता है. दोनों के व्यक्तित्व अलग अलग हैं. शुरू में एलियो को उससे थोड़ी बहुत ईर्ष्या होती है और उसे दिखाने की कोशिश करता है कि उसके लिए वो महत्वपूर्ण नहीं है. लेकिन बाद में एलियो उसके प्रति आकृष्ट हो जाता है. आगे जाकर दोनों में प्रेम हो जाता है. वे शारीरिक भी होते हैं. साथ घूमते हैं, फिरते हैं, बातें करते हैं, पोखर में नहाते हैं, साइकिल पर बाजार जाते हैं. जैसे किसी स्त्री पुरुष का प्रेम होता है, उतना ही स्वाभाविक और सहज लगने वाला इन दोनों का प्रेम भी होता है. ये रिश्ता एलियो के लिए किस तरह का अनुभव लेकर आता है ये अंत तक दिखता है.
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इटैलियन डायरेक्टर लूका गुआदानीनो ने इस फिल्म को बेहतरीन ढंग से बनाया है. ये उनकी Desire (लालसा/कामना) Trilogy की तीसरी फिल्म है. पहली थी 2009 में रिलीज हुई ‘आई एम लव’ और दूसरी थी 2015 में आई ‘अ बिगर स्प्लैश.’ प्रेम या जिंदगी का उपभोग करने के जो अमूर्त भाव हमारे मन में दौड़ा करते हैं, उन्हें बड़े परदे के विजुअल्स के जरिए संप्रेषित करके दिखा पाना ही सिनेमा माध्यम की सबसे आगे की महत्वाकांक्षा रही है. ‘कॉल मी बाय योर नेम’ के अंदर का जो माहौल है, जो लोकेशन हैं, दोनों पुरुषों के बीच जो रिश्ते की नेचुरल ग्रोथ है, जो उनकी नोक-झोंक है, बेचैनी है, विरह है वो बहुत ही बारीक और बहुआयामी ढंग से दिखता है. इस फिल्म के हर फ्रेम में जैसे रंग हैं और जैसी चिलचिलाती धूप है, पोखर में नहाने की जो ठंडक है, हाफ शर्ट और बॉक्सर्स पहनकर प्रदूषणरहित, ट्रैफिक रहित सड़कों पर साइकिल चलाते हुए एलियो-ऑलिवर का जो घूमना-फिरना है वो सब इतना सुग्राह्य और जीवंत है कि दर्शक उनकी दुनिया में स्थानांतरित हो जाता है.
ये फिल्म हमें कुछ ख़ास बातें दे जाती है. समलैंगिक रिश्तों के सिनेमा में जो चित्रण रहे हैं उस लिहाज से ये बहुत प्रगतिशील और मैच्योर चलचित्र है. इस जॉनर में ऐसी संवेदनशील फिल्में बहुत ज्यादा नहीं बनीं. फिल्म में एक बड़ी आनंददायक बात ये है कि इसमें कोई मार-पीट, हिंसा, दुख भरे दिन, थोपी गई नैतिकता, मन की अभिलाषाओं को कुचलने की स्थिति या हमारी नितांत निजी स्वतंत्रता को सीमित करने वाला माहौल नहीं है. पूरी फिल्म इस मामले में एक आदर्श नमूना है कि इंसान का प्रेम और लाइफ को एंजॉय करने और उसमें आगे बढ़ने का खिला-खिला, खुश माहौल कैसा होना चाहिए. जहां तक पहुंचना समुदायों और समाजों का लक्ष्य होना चाहिए.
एक पुरातत्व सर्वेक्षण के दौरान प्रो. पर्लमैन अपने बेटे एलियो और ऑलिवर की ओर देखते हुए. सिनेमा इतिहास में बेस्ट पेरेंट्स की सूची अगर बनी तो वे शीर्ष पर हो सकते हैं. (फोटोः सोनी पिक्चर्स क्लासिक्स)
एक पुरातत्व सर्वेक्षण के दौरान प्रो. पर्लमैन अपने बेटे एलियो और ऑलिवर की ओर देखते हुए. सिनेमा इतिहास में बेस्ट पेरेंट्स की सूची अगर बनी तो वे शीर्ष पर हो सकते हैं. (फोटोः सोनी पिक्चर्स क्लासिक्स)

‘कॉल मी बाय योर नेम’ में सबसे विलक्षण लोग एलियो के पिता और मां के पात्र हैं. खासकर उसके पिता जो अपने बेटे की अपारंपरिक यौन उन्मुखता का अनुमान लगा लेते हैं और पता लगने पर वे खुद आगे बढ़कर उसे और उसके प्रेमी पुरुष को कुछ दिन साथ बिताने और घूमकर आने के लिए भेजते हैं. ये देखते हुए हैरानी होती है क्योंकि समाज से और माता-पिता से ऐसी स्वीकार्यता की आदत नहीं हो पाई है. लेकिन प्रोफेसर पर्लमैन जैसे पात्र दुनिया के सिनेमा में अप्राप्य हैं. ऐसा पिता नहीं देखा. जब एलियो ऑलिवर के साथ घूमने के बाद उससे बिछड़कर घर लौट आता है और उसकी विरह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा होता तब पिता उसे अपने पास बैठाते हैं और काफी देर बातें करते रहते हैं. वो उसे बताते हैं कि कैसे उसे अपने शरीर और मन की आज़ादी को खाली नहीं जाने देना चाहिए. उसे जो मन में आए, जितना मन में आए करना चाहिए. उसे अपने समलैंगिक रिश्ते को भी दिव्य मानना चाहिए जो किस्मत वालों को ही मिलता है. पिता बेटे को सहज करने के लिए खुद अपना अनुभव भी बताते हैं कि कैसे वो भी इस अनुभव को पा चुके हैं लेकिन एलियो जितना आगे वो इसमें नहीं बढ़ पाए थे.
प्रोफेसर पर्लमैन एलियो से जो कहते हैं वो हर पिता को अपने बेटे से कहना चाहिए, "देखो, तुम्हारी एक बहुत ही खूबसूरत दोस्ती थी (ऑलिवर के साथ). शायद दोस्ती से भी ज्यादा कुछ था. और मैं तुमसे ईर्ष्या करता हूं. मेरी जगह होते, तो ज्यादातर माता-पिता ये कामना करते कि ये सारी चीज (समलैंगिकता) गायब हो जाए. वो प्रार्थना करते कि उनके बेटे सकुशल इस स्थिति से बाहर आ जाएं. लेकिन मैं ऐसा पिता नहीं हूं. हम, चीजों से अपना इलाज तेजी से करवाने के लिए अपने आप में से इतना कुछ चीरकर निकाल लेते हैं कि 30 की उम्र तक आते-आते दिवालिया हो जाते हैं. और हर बार जब हम किसी नए (व्यक्ति) के साथ कुछ शुरू करते हैं तो हमारे पास दूसरे को देने के लिए बहुत कम होता है. सिर्फ खुद कुछ महसूस करवाने के लिए, हम कुछ भी महसूस नहीं करते. लानत है. क्या निरर्थकता है!"
ईजिप्ट मूल के राइटर आंद्रे एसिमन ने 2007 में ‘कॉल मी बाय योर नेम’ नाम का नॉवेल लिखा था. इसी पर ये फिल्म बनी है. फिल्म का शीर्षक एलियो और ऑलिवर के उन अंतरंग पलों के दौरान पैदा होता जब वे एक दूसरे को कहते हैं कि “तुम मुझे अपने नाम से पुकारो, मैं तुमको अपने नाम से पुकारूंगा.” अर्थ ये कि ‘प्यार में तुम मैं हो जाओ और मैं तुम हो जाऊं’.
जेम्स आइवरी ने नॉवेल से इस फिल्म का स्क्रीनप्ले लिखा है. वे एडेप्टेड स्क्रीनप्ले का ऑस्कर जीतने के प्रबल दावेदार हैं. जेम्स ने अपने 50 साल से लंबे करियर में कई फिल्में डायरेक्ट की हैं. उनकी ‘शेक्सपीयर वाला’ (1965), ‘बॉम्बे टॉकी’ (1970) और ‘हीट एंड डस्ट’ (1983) ज़रूर देखें जिनमें शशि कपूर ने अभिनय किया है. बेस्ट एक्टर के लिए नॉमिनेट हुए टिमथी शालामे के काम की बहुत प्रशंसा की जा सकती है. टीवी सीरीज ‘होमलैंड’ और क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘इंटरस्टेलर’ में काम कर चुके टिमथी अभी सिर्फ 22 साल के हैं और 1939 के बाद बेस्ट एक्टर के लिए नामांकित होने वाले वे सबसे कम उम्र के अभिनेता हैं.


ऑस्कर 2018 में ‘कॉल मी बाय योर नेम’: चार नामांकन मिले, एक में विजेता रही.
बेस्ट पिक्चर - पीटर स्पीयर्स, लूका गुआदानीनो, एमिली जॉर्जेस, मार्को मोरबिटो बेस्ट एक्टर - टिमथी शालामे एडेप्टेड स्क्रीनप्ले - जेम्स आयवरी (विजेता).  म्यूजिक (ओरिजिनल सॉन्ग) - सफजन स्टीवन्स, "मिस्ट्री ऑफ लव"



सीरीज़ की अन्य फिल्मों के बारे में पढ़ें: The Shape Of Water – क्यों 2018 के Oscars की ये सबसे बड़ी फिल्म है
Get Out – शॉकिंग, विषैली और भयानक फिल्म जो बहुत सही समय पर आई है
Dunkirk – वो वॉर मूवी जिसमें आम लोग युद्ध से बचाकर अपने सैनिकों को घर लाते हैं
Lady Bird – क्यों इस अवॉर्ड सीज़न में इस नन्ही सी फिल्म की दीवानगी है?
Three Billboards Outside Ebbing, Missouri – दुनिया को गांधीगिरी का नया आइडिया देने वाली फिल्म
Darkest Hour – गैरी ओल्डमैन के विशिष्ट अभिनय ने इसे 2018 ऑस्कर में बुलंद फिल्म बनाया
The Post – आज के डरे हुए मीडिया के लिए एक बड़ी urgent फिल्म
(Award tally edited post the Oscar ceremony on March 5, 2018.)

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