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'द पोस्ट' - बहादुर जर्नलिज़्म पर बनी ये फिल्म इससे बेस्ट टाइम में नहीं आ सकती थी

‘ऑस्कर वाली फ़िल्में’ - सीरीज़ में हमारी आठवीं फिल्म है डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग की – The Post.

“The press was to serve the governed, not the governors /
प्रेस का काम शासित (लोगों) की सेवा करना था, शासकों (सरकार) की नहीं.”

– इस फिल्म का वो पल, जब ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ और ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ जैसे अखबारों के खिलाफ अमेरिकी सरकार के मुकदमे की सुनवाई करते हुए, अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जज प्रेस की आज़ादी और सरकार की आलोचना के उसके अधिकार के समर्थन में ये कहते हैं.

ये कहानी 1971 की है जब द वॉशिंगटन पोस्ट एक स्थानीय स्तर का अख़बार हुआ करता था. उसकी मालकिन थीं कैथरीन ग्राहम जो अमेरिका में किसी भी बड़े अख़बार की पहली महिला प्रकाशक थीं. अपने पति और पिता की विरासत वाले इस अख़बार को वो शेयर बाजार में लाना चाहती हैं ताकि इसका आकार बढ़ाया जा सके. आज जैसा हो रहा है कि अख़बार की सालाना कमाई कितनी है इस पर मालिकों और उनके कॉरपोरेट सलाहकारों का ध्यान रहता है. उसकी एवज में संपादकीय विभागों की पवित्रता को बर्बाद कर दिया गया है. कैथरीन भी उस भाव में होती हैं कि निवेशकों और बैंकरों की मदद से अख़बार को बड़ा बनाया जाए. हालांकि इस ढर्रे पर चलते हुए भी वो सावधान हैं. वो बैंकरों की शर्तों और एटिट्यूट से बहुत खुश नहीं हैं. उन्हें अपने जुनूनी संपादक पर ज्यादा भरोसा है और वो लगभग उसके साथ खड़ी होती हैं. अंत में हम देख भी पाते हैं कि कैसे एक अख़बार अपनी गंभीर विश्वसनीय खबरों की वजह से ही relevant रह पाता है, कंज्यूमर के लिए सर्विस प्रोवाइडर कंपनी बनकर नहीं.

तो द वॉशिंगटन पोस्ट और कैथरीन दोनों इस दौर में मैच्योर होकर उभरते हैं. इसमें उत्प्रेरक बनते हैं बेन ब्रैडली. अमेरिकी जर्नलिज्म़ के इतिहास में बहुत बड़ा और इज्जतदार नाम. वो एडिटर जिन्होंने वियतनाम युद्ध में लोगों से छुपाई सरकार की गोपनीय जानकारियों वाले गुप्त पेंटागन पेपर्स को अदालत और राष्ट्रपति के खिलाफ जाकर छापा. वो जिनके नेतृत्व में दो रिपोर्टरों ने उस वॉटरगेट कांड का खुलासा किया था जिसके बाद राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा. ब्रैडली 2014 में गुजर गए लेकिन अंत तक वो इस अख़बार से जुड़े रहे.

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‘द पोस्ट’ की कहानी उनकी और कैथरीन की है. मालिक और एडिटर की ये एक आदर्श जोड़ी है. जब कैथरीन उन्हें एडिटोरियल सलाह देने लगती हैं तो वे तुरंत कह देते हैं कि आंख में उंगली करना बंद करो, और कैथरीन तुरंत वहीं रुक जाती हैं. जब राष्ट्रपति निक्सन की बेटी की शादी होने वाली होती है और वो वाइट हाउस में बेन ब्रैडली के घुसने पर रोक लगा देता है तो कैथरीन कहती हैं कि तुम किसी और रिपोर्टर को भेज दो. इस पर बेन जवाब देता है, “हां तुम पब्लिशर हो. तुम मेरी बॉस हो. और मैं तुम्हारे इनपुट्स या राय की कद्र करता हूं. लेकिन नहीं, मैं वाइट हाउस में अपने किसी दूसरे रिपोर्टर को नहीं भेजने वाला हूं. ये कोई आम शादी नहीं है, अमेरिका के राष्ट्रपति की बेटी की शादी है. और मैं ये होने नहीं दे सकता कि उनका प्रशासन हमको बताए कि हमें इस शादी की कवरेज कैसे करनी होगी.”

तो, इस फिल्म की मूल कहानी ये है कि टॉप सीक्रेट पेंटागन पेपर्स द न्यू यॉर्क टाइम्स के हाथ लगते हैं और वो स्टोरी करता है. लेकिन सरकार अदालत से स्टे ले आती है. अब टाइम्स उसे नहीं छाप सकता. लेकिन ठीक उसी समय बेन के अख़बार के पास भी एक सोर्स के हवाले से वो सारे पेपर्स आते हैं. अब अख़बार के वित्तीय सलाहकारों और वकीलों के हाथ-पैर फूल जाते हैं क्योंकि बेन कुख्यात है. वो ‘व्यावहारिकता’ से नहीं सिर्फ पत्रकारिता से चलता है. उसे जर्नलिज़्म के अपने सिद्धांतों के आगे कुछ नहीं दिखता. उसे इससे कोई मतलब नहीं कि किसी न्यूज छापने से कल को अख़बार ही बंद न हो जाए.

एक और जहां एक टीम पूरी कोशिश करती है कि कैथरीन को समझाए कि इन पेपर्स को भूल से भी न छपने दे. क्योंकि राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन किसी गुंडे से कम नहीं है और वो पूरी ताकत के साथ इस अख़बार को बर्बाद करने आएगा. साथ ही अदालत ने भी पेपर्स छापने से टाइम्स को रोक दिया है तो उनका इसे छापना न्यायालय की अवज्ञा माना जाएगा जिसके लिए अख़बार की मालकिन कैथरीन, एडिटर बेन और अन्य लोगों को लंबे समय के लिए जेल जाना पड़ सकता है. लेकिन बाकियों की आशंकाओं के बीच बेन है जो अड़ा हुआ है कि उनका सरोकार और जवाबदेही देश की जनता के प्रति है जिन्हें ये जानना चाहिए कि सरकार ने कैसे लंबे समय तक उनसे वियतनाम युद्ध के बारे में झूठ बोला और देश के कितने सैनिकों को मरवा दिया और अब उनके दिन भर गए हैं.

अब वो पेपर्स छपते हैं कि नहीं, क्या होता है. ये सारे फैसले लेते समय कैथरीन क्या सोच रही होती है. बेन कितनी आक्रामकता से अपने पत्रकारीय मूल्यों को बचाता है. ये सब अंत में पता चलता है.

'द वॉशिंगटन पोस्ट' की प्रकाशक कैथरीन (मैरिल स्ट्रीप) सन्निकट संकट/स्थिति को भांप रही है कि जब पेंटागन पेपर्स उसके एडिटर बेन के हाथ लगंगें तो क्या होगा? क्योंकि वो नहीं रुकेगा चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए, लेकिन उसके पारिवारिक अखबार का भविष्य इससे मुश्किल में पड़ सकता है.
‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ की प्रकाशक कैथरीन (मैरिल स्ट्रीप) सन्निकट संकट/स्थिति को भांप रही है कि जब पेंटागन पेपर्स उसके एडिटर बेन के हाथ लगेंगे तो क्या होगा? क्योंकि वो नहीं रुकेगा चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए, लेकिन उसके पारिवारिक अखबार का भविष्य इससे मुश्किल में पड़ सकता है.

ज्यादातर लोगों को जर्नलिज़्म पर बनी दो फिल्मों के बारे में पता होगा. एक तो All the President’s Men और दूसरी Spotlight. तीसरी है The Post. तीनों अच्छी फिल्में हैं. ज़रूर देखनी चाहिए. तीनों में कॉमन बातें भी हैं.

पहली ‘ऑल द प्रेज़िडेंट्स मेन’ वॉटरगेट कांड पर आधारित थी जिसमें अख़बार द वॉशिंगटन पोस्ट ही था और एडिटर थे बेन. ‘द पोस्ट’ में भी अख़बार ये ही था और एडिटर बेन ही थे. वहीं ‘स्पॉटलाइट’ द बोस्टन ग्लोब नाम के अख़बार की पादरियों द्वारा नाबालिग बच्चों के यौन शोषण पर खुलासे की कहानी थी. इस खुलासे को लीड करने वाले एडिटर थे मार्टिन बैरन जो अब द वॉशिंगटन पोस्ट के एडिटर हैं. वे 2013 में एडिटर बने और ‘द पोस्ट’ में नई जान फूंक दी. ऐसी-ऐसी रिपोर्ट और सीरीज करवाईं कि अगले ही साल 2014 में दो और 2016 में द पोस्ट को एक पुलित्ज़र अवॉर्ड मिला. जर्नलिज़्म की दुनिया इस अवॉर्ड से ऊपर कोई सम्मान नहीं है. अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार.

डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग ने 2017 के शुरू में ‘द पोस्ट’ की स्क्रिप्ट तैयार करवाई और नवंबर में फिल्म रिलीज भी कर दी. सिर्फ नौ महीने में उन्होंने फिल्म बना दी. न सिर्फ उन्होंने बल्कि एडिटर बेन ब्रैडली का रोल करने वाले एक्टर टॉम हैंक्स और अख़बार की मालकिन कैथरीन का रोल करने वाली मैरिल स्ट्रीप ने भी कहा है कि इस फिल्म को 2018 में लाने की आपातकालीन ज़रूरत थी. वैसे तो हर दौर में ही प्रेस पर हमले होते रहे हैं. लेकिन डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से इस देश की पत्रकारिता बहुत बुरे दौर में है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में मौजूदा सरकार के आने के बाद जर्नलिज़्म शायद सबसे गिरे हुए स्तर पर है. फेक न्यूज, प्रोपोगैंडा, पत्रकारों पर हमले, खुद ही तय करना कि कौन से तथ्य को सच मानेंगे और कौन से को झूठ .. ये सब ट्रंप के राज में हुआ है.

इस दौर में ‘द पोस्ट’ का आना बहुत ज़रूरी था और शायद इसे देखकर भारत, अमेरिका या बाकी जगह के पत्रकार समझ पाएं कि क्लासिक जर्नलिज़्म का कोई स्थानापन्न या substitute नहीं है. जो बात 2016 में रामनाथ गोयनका अवॉर्ड्स के दौरान द इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर राज कमल झा ने कही थी कि सत्ता के लोग जब पत्रकारों पर हमले करें या उनकी आलोचना करें तो ये उस पत्रकार के लिए बड़ा सम्मान है. Badge of honour है. ‘द पोस्ट’ में भी बेन ब्रैडली ऐसा ही सोचते हैं कि एक पत्रकार के तौर पर आपको ऐसा ही होना चाहिए कि आप सत्ता की आंख में चुभो, आप उसे राज़ी करने के लिए नहीं बैठे हो.

इसमें भी अगर मीडिया संस्थानों के मालिक अपने एडिटर को पूरी स्वतंत्रता दे तो जर्नलिज़्म का अनूठा दौर आ सकता है. समाज बहुत बेहतर बनाया जा सकता है. ऐसे मालिक, जैसी कैथरीन हैं. पेंटागन पेपर्स छापने को लेकर जब उनके बोर्ड के लोग उन पर दबाव बना रहे होते हैं तब भी वो जो फैसला लेती है वो जबरदस्त होता है. बोर्ड मेंबर आर्थर कहता है कि अगर ये पेपर छपे तो बैंकर अपने हाथ अपने अख़बार में किए निवेश से खींच लेंगे. तो कैथरीन बोलती हैं, “हां, मैं समझती हूं. हमारी, अपनी कंपनी और उसके सभी कर्मचारियों के प्रति जिम्मेदारी है. हमें दीर्घकाल में इस अख़बार के (वित्तीय) स्वास्थ्य का ध्यान भी रखना है. हालांकि.. हमारा प्रोस्पेक्टस इस अख़बार के मिशन की बात भी करता है, जो है – समाचारों का बेहतरीन संकलन और रिपोर्टिंग करना. सही है न? यह ये भी कहता है कि अख़बार इस मुल्क की भलाई और स्वतंत्र प्रेस के सिद्धांतों के प्रति समर्पित रहेगा. तो ये तर्क दिया जा सकता है कि बैंकर्स को पहले ही नोटिस दे दिया गया था.” जब एक दूसरा साथी कहता है कि लेकिन ये extraordinary हालात हैं. तो कैथरीन कहती हैं, “सच में, क्या सच में (असाधारण हालात हैं)? वो भी एक न्यूज़पेपर के लिए. उस न्यूज़पेपर के लिए जो निक्सन के राष्ट्रपति रहते हुए वाइट हाउस को कवर कर रहा है.”

कैथरीन के इस जवाब से वो सदस्य निरुत्तर हो जाता है और एडिटर बेन ब्रैडली मंद मंद मुस्करा रहा होता है. ये एक आदर्श स्थिति होगी अगर ज्यादातर मीडिया मालिक ऐसे ही हों.

2018 के ऑस्कर में ‘द पोस्ट’:
2 नामांकन मिले.
बेस्ट पिक्चर – ऐमी पास्कल, स्टीवन स्पीलबर्ग और क्रिस्टी माकोस्को क्रीगर
बेस्ट एक्ट्रेस – मैरिल स्ट्रीप

सीरीज़ की अन्य फिल्मों के बारे में पढ़ें:
Call My By Your Name – वो आनंदभरा स्थान जहां दो पुरुषों के प्रेम में कोई बाधा नहीं
The Shape Of Water – क्यों 2018 के Oscars की ये सबसे बड़ी फिल्म है
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Lady Bird – क्यों इस अवॉर्ड सीज़न में इस नन्ही सी फिल्म की दीवानगी है?
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Darkest Hour – गैरी ओल्डमैन के विशिष्ट अभिनय ने इसे 2018 ऑस्कर में बुलंद फिल्म बनाया

(Award tally edited post the Oscar ceremony on March 5, 2018.)
(Story first published on March 4, 2018.)
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