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'डनकर्क': वो वॉर मूवी जिसमें आम लोग युद्ध से बचाकर अपने सैनिकों को घर लाते हैं

‘ऑस्कर वाली फ़िल्में’ सीरीज़ में चौथी फिल्म है राइटर-डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की – Dunkirk.

“बेटा, वो (युद्ध के विनाश के कारण) मानसिक रूप से विचलित है. वो अपने आप में नहीं है. शायद अब वो फिर से कभी अपने आप में न हो पाए.”

– एक बुजुर्ग मि. डॉसन (मार्क राइलेंस) अपनी निजी याट (बोट) लेकर ब्रिटेन से 26 मील दूर उत्तरी फ्रांस के डनकर्क समुद्री तट जाकर ब्रिटिश व गठबंधन सैनिकों को बचाने के लिए निकला है जिनकी संख्या करीब चार लाख है. साथ में उसका बेटा और जॉर्ज नाम का उसका मासूम-प्यारा दोस्त है. रास्ते में समंदर के बीच एक बहुत डरा हुआ ब्रिटिश सैनिक फंसा मिलता है जिसे वे अपनी याट पर चढ़ाते हैं. एक सैनिक की नायकीय छवि के उलट उसे यूं सहमा-घबराया देखकर जॉर्ज जब पूछता है, “मिस्टर डॉसन, क्या वो कायर है?” तो मि. डॉसन यह कहते हैं.

आनंद पटवर्धन की 2002 में प्रदर्शित डॉक्यूमेंट्री ‘जंग और अमन / War and Peace’ में एक दृश्य है. भारत में एक जगह नौसेना के हथियारों की प्रदर्शनी लगी हुई है. इसे देखने आई एक युवती से जब फिल्ममेकर हथियारों की प्रासंगिकता पूछता है तो वो कहती है, “…अभी आए गुजरात भूकंप (में मदद) के लिए पैसा विदेश से दान में आ रहा है, इसलिए देश के पैसे से इन हथियारों का निर्माण ज्यादा ज़रूरी है.”

फिर वो युवती कहती है कि “हम तो यहां मनोरंजन देखने आए हैं… ख़ूबसूरत हथियार हैं.”

उसके सभी विचार डरावने हैं, खास आखिरी. भला हथियार के साथ ख़ूबसूरत का विशेषण कैसे जोड़ा जा कता है? कैसे?

oscar

चाहे भारत में बनी जे. पी. दत्ता की ‘बॉर्डर’ (1995) हो या माइकल बे की ‘पर्ल हार्बर’ (2001) जैसी ज्यादातर वॉर मूवीज़, वो युद्ध में मौतों और ख़ून-ख़राबे को जाने-अनजाने glorify करती हैं. ऐसी फिल्में अंततः अनुपयोगी फिल्में होती हैं. हालांकि ‘बॉर्डर’ के अंत में ‘मेरे दुश्मन मेरे भाई मेरे हमसाये..’ जैसा समझदार, अहिंसा-गीत भी आता है जो बहुत अच्छा होता है और जो युद्धों को ग़ैर-ज़रूरी बताता है.

लेकिन वॉर मूवीज़ का जॉनर मूल रूप से वस्तुपरकता वाला नहीं है. इसमें ख़ून-ख़राबे को Nationalism और Military-industrial complex के प्रपंचों की आड़ में महिमामंडित करने वाली कहानियां ही आमतौर पर कही जाती हैं.

क्रिस्टोफर नोलन की लिखी और डायरेक्ट की हुई ‘डनकर्क’ इस लिहाज से एक अलग फिल्म है. उन्होंने वर्ल्ड वॉर-2 के दौरान के ऐतिहासिक डनकर्क बचाव अभियान पर ये फिल्म बनाई है जब 1940 में ब्रिटेन और उसके साथ गठबंधन वाली सेनाओं को जर्मन फौज युद्ध में पीछे धकेल देती हैं. सैनिकों को भागना पड़ता है. अब उत्तरी फ्रांस के समुद्री तट डनकर्क पर वे फंस गए हैं. उन्हें यहां से बचाकर निकालने की ब्रिटेन की सारी कोशिशें नाकाम हो रही है. बड़े जहाज यहां के पानी में आ नहीं सकते और जो हैं उन्हें जर्मन विमान नष्ट कर रहे हैं. अब ऐसे वक्त में जब प्रधानमंत्री, राजनेता, सेना के जनरल नाकाम है तब ब्रिटिश लोगों को ये मैसेज भेजा जाता है कि वे अपनी-अपनी निजी बोट लेकर जाएं और अपने सैनिकों को बचाकर लाएं. ये कहानी उसी की है.

मि. डॉसन (मार्क राइलेंस) अपने बेटे के साथ डनकर्क के तट पर सैनिकों को लेकर लौटने को हैं कि आसमान से जर्मन सेना का विमान देख लेता है और उनकी तरफ बढ़ रहा है.
मि. डॉसन (मार्क राइलेंस) अपने बेटे के साथ डनकर्क के तट पर सैनिकों को लेकर लौटने को हैं कि आसमान से जर्मन सेना का विमान देख लेता है और उनकी तरफ बढ़ रहा है.

अब इसे देखते हुए कुछ एक्साइटिंग बातें मन में आती हैं.

आर्मी की ट्रेनिंग में हमेशा ऑफिसर या सैनिक को ये मनोविज्ञान दिया जाता है कि वो शारीरिक रूप से विशेष बने और खास तरह का अनुशासन फॉलो करे क्योंकि वो आम आदमी या सिविलियन से ऊंचे दर्जे का है और विशेष है. वर्ल्ड वॉर-2 के दौरान की ये कहानी आकर इस थोथे भेद को मिटा देती है. एक सैनिक अपने देश के लिए लड़ता है उसके लिए उसे सलाम है, लेकिन उतनी ही इज्जत एक किसान की भी होनी चाहिए जो धान उगाता है. उतनी ही इज्जत एक शिक्षक की है जो देश की हर अगली पीढ़ी को शिक्षित करके दुनिया में भेजता है. इसी प्रकार से दूसरे सब पेशे हैं. चाहे वो झाडू़ बुहारने वाला हो या परचून का सामान देने वाला. सम्मान सबका बराबर होना चाहिए. ‘डनकर्क’ में आखिर सैनिकों को बचाने वही सिविलियन आते हैं जो निम्न श्रेणी के समझे जाते हैं.

कहने का मतलब ये है कि हम सब इंसान है और एक-दूसरे का बराबर सम्मान और सुरक्षा की भावना होनी चाहिए. किसी सैनिक के साथ अन्याय हो तो हम उसके साथ हैं. सुनामी और भूकंप में वो हमें आकर रेस्क्यू करते हैं, कभी उन पर कुछ मुसीबत आन पड़े तो हम सब उनकी मदद को आएंगे. ये बड़ी सरल सी पारस्परिकता है लेकिन निहित स्वार्थों वाले राजनेता या सैन्य अधिकारी इस परिभाषा को खराब करते हैं. और भोली जनता उनकी बातों में आ जाती है.

सेना की विशेष स्थिति उसके कामकाज को गोपनीय बनाती है. सेना अपने आप में इतना ताकतवर संस्थान है कि उसमें ज्यादा पारदर्शिता वाला ढांचा होना चाहिए, ज्यादा जवाबदेही होनी चाहिए ताकि उस पावर का दुरुपयोग न हो सके. जैसे फर्जी एनकाउंटर, या न्यायेत्तर हत्याएं, टॉर्चर के प्रतिबंधित बर्बर तरीके. अमेरिका सेना का इतिहास इस मामले में बदनामी भरा है. भारत में आएं तो जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में सेना कई दशकों से सिविलियन इलाकों में तैनात है. सुप्रीम कोर्ट के सामने सैन्य अफसरों के कई संगीन मामले सामने आए जहां उन पर हत्याओं और रेप के इल्ज़ाम लगे. जो भी इन मामलों पर खुलकर बात करने की कोशिश करता है उसके लिए समाज में माहौल बहुत असुरक्षा भरा हो जाता है.

‘डनकर्क’ में एक दृश्य है जहां कुछ ब्रिटिश और स्कॉटिश सैनिक दुश्मन के कब्जे वाले समुद्री इलाके में एक ट्रॉलरनुमा बोट में छुपे हुए हैं ताकि जब समंदर की लहर आए तो बोट तैरे और वे वहां से इंग्लैंड की ओर जा सकें. लेकिन फिर जर्मन सैनिक इस बोट पर गोलियां चलाने लगते हैं. उधर से लहर आती है लेकिन इंजन स्टार्ट नहीं होता तो एक कहता है कि वजन कम करना होगा तभी ये स्टार्ट होगी. सब सैनिकों में भय और आतंक का माहौल है. सबको हर हाल में अपनी जान बचानी है, घऱ जाना है. कोई हीरोइज़्म नहीं बचा है. तभी ब्रिटिश सैनिक एलेक्स (हैरी स्टाइल्स), गिब्सन नाम के सैनिक की तरफ इशारा करके कहता है कि वो एक जर्मन जासूस है और इसे ही सबसे पहले बाहर निकालना चाहिए. इस पर दूसरा ब्रिटिश सैनिक टॉमी (फियोन वाइटहैड) विरोध करता है. क्योंकि गिब्सन ने ही टॉमी और एलेक्स की जान बचाई थी, जो बाद में बताता है कि वो जर्मन जासूस नहीं बल्कि एक फ्रेंच सैनिक है.

अब यहां पर सैनिकों के संवाद देखें :

एलेक्सः मुझे पता है इस बोट में से कौन बाहर निकलेगा. (गिब्सन से) चल बाहर निकल!
टॉमीः तुम इसके साथ ऐसा नहीं कर सकते, वो फ्रेंच है और हमारी तरफ है. जैसे ही तुम इसे बाहर निकालोगे वो लोग (जर्मन) इसका कत्ल कर देंगे.
एलेक्सः मैं मरूं इसके बजाय ये ही मर जाए!
टॉमीः ये न्याय नहीं है.
एलेक्सः जिंदा रहने की लड़ाई ही अन्यायपूर्ण है.
एक तीसरा सैनिकः ये (सरवाइवल) डर है और लालच है. ये वो किस्मत है जो आदमी के अंडकोषों में से धकेलकर डाली गई है.

एलेक्स (हैरी स्टाइल्स), गिब्सन (एनउरिन बर्नार्ड) और टोनी (फियोन वाइटहैड) डनकर्क के तट पर युद्ध की विभीषिका देखते हुए.
एलेक्स (हैरी स्टाइल्स), गिब्सन (एनउरिन बर्नार्ड) और टोनी (फियोन वाइटहैड) डनकर्क के तट पर बैठे घर जाने का रास्ता देखते हुए.

कहानी में आगे गिब्सन के कपड़े पहने वो फ्रांसीसी सैनिक मारा जाता है. अंत में वो दृश्य भी दिखता है जहां टॉमी को मिस्टर डॉसन की सिविलियन बोट में शरण मिलती है और वो उसके आंगन में गिरते ही वो कहता है – “मुझे घर ले चलो.” उसी बोट में एलेक्स भी बैठा होता है और टॉमी के देखकर सिर झुका लेता है.

नोलन ने ‘डनकर्क’ की स्क्रिप्ट को अत्यंत गहन रूप से व्यक्तिपरक बनाया. उन्होंने इसे यूं बनाया है कि दर्शकों को लगे कि वो खुद जर्मन सेनाओं की बमबारी से आतंकित डनकर्क के समंदर तट पर ही उतार दिए गए हैं. कि वे उन सैनिकों के बीच ही हैं जो जान बचाकर इधर-उधर बारूद के धमाकों के नीचे भाग रहे हैं. कि वो उन स्पिटफायर विमानों की कॉकपिट में पायलट के साथ ही बैठे हैं जिनके पीछे जर्मन विमान पड़े हैं और गोलियां बरसा रहे हैं और मार गिरा रहे हैं.

उन्होंने इस फिल्म को ऐसे बनाया कि डनकर्क इवेंट में मानवीय कष्ट के आकार को देखा-महसूस किया जा सके. ख़ुद नोलन का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर फिल्म में राजनेताओं और युद्ध मंत्रणाओं वाली बैठकों (जो कुछ हद तक इस ऑस्कर में छाई दूसरी बड़ी फिल्म ‘द डार्केस्ट आवर’ में देख सकते हैं जो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की बायोपिक है) को ज़रा सा भी नहीं रखा जो कि आम तौर पर वॉर मूवीज में रखा जाता है जिसे देखकर दर्शक बहुत एक्साइटेड होता है लेकिन वो ये नहीं समझ पाता कि युद्ध कभी भी एंटरटेनिंग या मज़ेदार नहीं हो सकता. युद्ध सिर्फ और सिर्फ दुखदायी और घृणित ही हो सकता है.

दुनिया में युद्ध को लेकर जो सबसे उत्कृष्ट और महान फिल्में बनी हैं उनमें स्टैनली कुबरिक की ‘फुल मैटल जैकेट’ को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा और हमारे दौर में नोलन की ये वॉर मूवी भी ऐसी है जो कुछ पीछे ही सही लेकिन इसी कतार में खड़ी होती है.


2018 के एकेडमी अवॉर्ड में ‘डनकर्क’:
‘द शेप ऑफ वॉटर’ के बाद सबसे ज्यादा 8 नामांकन मिले,3 में विजेता रही.

बेस्ट पिक्चर – एमा थॉमस और क्रिस्टोफर नोलन
सिनेमैटोग्राफी – हॉयटे वान हॉयटेमा
डायरेक्शन – क्रिस्टोफर नोलन
फिल्म एडिटिंग – ली स्मिथ  (विजेता) 
ओरिजिनल स्कोर (म्यूजिक) – हांस ज़िमर
प्रोडक्शन डिजाइन – नैथन क्राउली; सेट डेकोरेशन – गैरी फैटिस
साउंड एडिटिंग – रिचर्ड किंग और एलेक्स गिब्सन (विजेता)
साउंड मिक्सिंग – ग्रेग लैंडेकर, गैरी ए. रिज़ो, मार्क वेइंगार्टऩ (विजेता)

सीरीज़ की अन्य फिल्मों के बारे में पढ़ें:
Call My By Your Name – वो आनंदभरा स्थान जहां दो पुरुषों के प्रेम में कोई बाधा नहीं
The Shape Of Water – क्यों 2018 के Oscars की ये सबसे बड़ी फिल्म है
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Three Billboards Outside Ebbing, Missouri – दुनिया को गांधीगिरी का नया आइडिया देने वाली फिल्म
Darkest Hour – गैरी ओल्डमैन के विशिष्ट अभिनय ने इसे 2018 ऑस्कर में बुलंद फिल्म बनाया

(Award tally edited post the Oscar ceremony on March 5, 2018.)
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