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आंबेडकर के नाम में 'रामजी' लगा देने से क्या हासिल होता है?

शेक्सपियर उत्तर प्रदेश में होते तो कभी ये पूछने की हिम्मत न करते कि नाम में रखा क्या है. वो ये जानते कि यहां सरकारें आने-जाने के साथ ही जगहों के नाम बदल जाते हैं, तो गुलाब का भी बदल सकता है. खुशबू बदली नहीं जा सकती लेकिन नए नाम के साथ नई ब्रैंडिंग तो की ही जा सकती है.

ये हम इसलिए कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने भारतीय संविधान के जनकों में से एक ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर’ का नाम बदलकर ‘डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर’ कर दिया है. रामजी बाबा साहब के पिता का नाम था. इसके अलावा ‘अंबेडकर’ को ‘आ’ की मात्रा लगाकर ‘आंबेडकर’ कर दिया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार का वो आदेश जिसमें अंबेडकर के नाम में संशोधन की बात की गई है.
उत्तर प्रदेश सरकार का वो आदेश जिसमें अंबेडकर के नाम में संशोधन की बात की गई है.

ये बदलाव उत्तर प्रदेश के सभी सरकारी विभागों और हाईकोर्ट (लखनऊ और इलाहाबाद) में लागू होगा. यहां से जारी होने वाले किसी भी कागज़ पर आईंदा बाबा साहब का नाम डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ही लिखा जाएगा. उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव (सामान्य प्रशासन) जीतेंद्र कुमार कह रहे हैं कि अंबेडकर ने संविधान की अष्टम अनुसूचि (आठवां शेड्यूल) पर इसी नाम के साथ दस्तखत किए थे. इसलिए राज्य सरकार आईंदा इस ‘सही’ नाम का ही इस्तेमाल करेगी.

संविधान की अष्टम अनुसूचि, जिसमें अंबेडकर के हस्ताक्षर हैं, देवनागरी में.
संविधान की अष्टम अनुसूचि, जिसमें अंबेडकर के हस्ताक्षर हैं, देवनागरी में.

महाराष्ट्र की प्रथा को लेकर यूपी में हलचल

कांशीराम ने जिस राज्य में दलित राजनीति को स्थापित करके मायावती जैसे नेता दिए, वहां देश के सबसे बड़े दलित नायक के नाम में ‘रामजी’ डालने की कवायद एक और ‘राम’ ने ही शुरू की. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने पिछले एक साल से इसके लिए एक मुहिम शुरू कर रखी थी. मीडिया में नाइक का बयान आया है कि मराठी परंपरा के अनुसार बेटे के नाम में पिता का नाम भी लगता है. तो अंबेडकर के नाम में उनके पिता का नाम भी जोड़ा जाना चाहिए. इसके लिए राम नाइक ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और ‘भारतरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर महासभा’ के निदेशक डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल को एक चिट्ठी लिखी थी.

इसमें मांग की गई थी कि उत्तर प्रदेश में बाबा साहब का नाम हिंदी में ‘डॉ. भीमराव आंबेडकर’ और अंग्रेज़ी में ‘Dr. Bhimrao Ambedkar’ किया जाए. राज्य सरकार पहले ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर’ और अंग्रेज़ी में ‘Dr. Bhim Rao Ambedkar’ लिखती थी. दिलचस्प बात है कि राम नाइक ने जो चिट्ठी डॉ. निर्मल को लिखी है, उसमें अंबेडकर के नाम में ‘रामजी’ लगाने वाली बात नहीं है. खुद डॉ. निर्मल की संस्था के नाम में ‘रामजी’ नहीं आता है.

राम नाइक के खत में रामजी वाली बात थी ही नहीं.
राम नाइक के खत में रामजी वाली बात थी ही नहीं.

जिन्हें इतना ‘सही’ नाम पसंद नहीं

उत्तर प्रदेश सरकार के निकाले आदेश में बाबा साहब के नाम में संशोधन का ज़िक्र है. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है, तो उसे इस आदेश से कोई समस्या नहीं (होती भी कैसे?). लेकिन समाजवादी पार्टी ने कह दिया है कि भाजपा सपा-बसपा गठबंधन से डरी हुई है, इसीलिए इस तरह के फैसले लेकर दलितों को बताने की कोशिश कर रही है कि वो उनका कितना ध्यान रखती है.

ये छोटू सी आपत्ति है. यूपी सरकार के फैसले पर असली आपत्ति जताई है भाजपा सांसद उदित राज ने. उनका कहना, ‘अंबेडकर को वैसे ही जाना जाए, जैसे वो चाहते थे, तो ही सही है. इस फैसले से अब अनावश्यक विवाद खड़ा हुआ है और दलित नाराज़ हैं. इस तरह से तो श्रीमती सोनिया गांधी के नाम से भी गांधी हटा देना चाहिए क्योंकि उनके पूर्वज तो नेहरू थे. राम नाइक या किसी भी और को इसमें नहीं पड़ना चाहिए था, इससे कोई फायदा नहीं.’ उदित राज कभी राम राज होते थे. 2001 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया और तब से वो उदित राज हो गए.

केंद्र के एनडीए गठबंधन में हिस्सेदार रिपब्लिकन पार्टी के प्रमुख और सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवले ने अंबेडकर का नाम बदलने पर किसी विवाद से इनकार किया, लेकिन अपनी बात में ये भी जोड़ा कि बाबा साहब को वो हमेशा से भीमराव आंबेडकर कहते आए हैं, और आगे भी वही कहेंगे.

भगत सिंह को सिलसिलेवार ढंग से 'सरदार भगत सिंह' बना दिया गया है.
भगत सिंह को सिलसिलेवार ढंग से ‘सरदार भगत सिंह’ बना दिया गया है.

अंबेडकर खुद को क्या कहते थे?

भगत सिंह नास्तिक थे. इसलिए उनकी वही तस्वीर ज़्यादा सच्ची है, जिसमें वो एक हैट पहने नज़र आते हैं. उसमें उनकी दाढ़ी नज़र नहीं आती. लेकिन वक्त के साथ लगातार कोशिश हुई है कि भगत सिंह को दाढ़ी और पगड़ी के साथ ‘सरदार’ भगत सिंह दिखाया जाए. एक खास पहचान को उनपर मढ़ा जा रहा है. तो क्या अंबेडकर के नाम में ‘रामजी’ लगाना ऐसी ही कोशिश है?

ये सवाल हमने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के राजनीतिशास्त्र (पॉलिटिकल साइंस) विभाग में राजनैतिक चिंतन (पॉलिटिकल थॉट) पढ़ाने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कृष्णस्वामी दारा से किया. डॉ. दारा ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से अंबेडकर पर शोध किया है. उन्होंने कहा,

”रामजी उनके पिता का नाम था. तो मराठी चलन का हवाला देकर अंबेडकर के नाम में रामजी जोड़ने में अपने-आप में कोई बुराई नहीं है. अंबेडकर ने खुद अपने नाम को हमेशा ‘बी आर’ या ‘बी आर अंबेडकर’ लिखा. इसमें से आर रामजी भी हो सकता है और राव भी. लेकिन ये बात अपनी जगह कायम है कि उत्तर प्रदेश में अंबेडकर के नाम में ‘रामजी’ लगाने का राजनैतिक नफा-नुकसान होगा ही.

रही बात अंबेडकर की विरासत को मिटाने या हथियाने की, तो ये ध्यान रखा जाए कि अंबेडकर ने हिंदू धर्म की जो आलोचना की है, वो उनके नाम में ‘राम’ आ जाने से फीकी नहीं पड़ जाएगी. उन्होंने अपना नाम बदलने की कभी कोशिश नहीं की. लेकिन हिंदू रीति-रिवाज़ों और आस्था परंपरा को लेकर अपने विचारों पर भी वो दृढ़ थे. ‘भीमराव रामजी आंबेडकर’ हिंदू धर्म के कुछ करीब लग सकता है, लेकिन असल बात हमेशा इसके उलट ही रहेगी.”

भाषा की कारीगरी अंबेडकर के विचारों को लील भले नहीं सकती, लेकिन इन दिनों तेजी के साथ दक्षिणपंथ ‘दूसरों’ के प्रतीकों को अपने हिसाब से एक मुफीद पहचान देने में जुटा है. एक औसत आदमी अंबेडकर के लिखे को पढ़कर समझेगा, इसकी संभावना कम ही है. वो उसी पर ध्यान देगा, जो उसे अंबेडकर के नाम के साथ ज़्यादा दिखाई, ज़्यादा सुनाई देता है. माने ब्रैंडिंग. इस लिहाज़ से एक सताई हुई कौम के नायक के ‘राम’ की शरण में चले जाने के क्या नतीजे होंगे, विचार का विषय होना चाहिए.


*इस मामले में आंबेडकर परिवार का पक्ष जानने के लिए ‘दी लल्लनटॉप’ ने बाबा साहब के पोते प्रकाश आंबेडकर से बात करने का प्रयास किया. लेकिन खबर प्रकाशित किए जाने तक उनकी प्रतिक्रिया हमें नहीं मिली थी. यदि वो अपना पक्ष रखते हैं तो उसे खबर में शामिल कर लिया जाएगा.


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