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किसानों की ख़ुदकुशी दर 42 परसेंट बढ़ी, भाषणों का अचार डालें?

यहां रैली, वहां रैली. सीना ठोक के भाषण. उसमें वादे. कभी किसानों को, कभी मजदूरों को. जगह-जगह ये ही कि हमने किसानों के लिए ये किया हमने वो किया. सरकारें बदलती हैं मगर किसानों की हालत नहीं. पहले भी दम तोड़ रहे थे. और अब भी दम तोड़ रहे हैं. बस आंकड़ों में इजाफा हो जाता है. पता नहीं कब किसानों के अच्छे दिन आएंगे. जो अपनी फैमिली के लिए एक साया बनकर रहेंगे. उनको बीच में छोड़कर नहीं जाएंगे. लेकिन ख़ुदकुशी किसी समस्या का हल नहीं होता, ये बात किसानों को भी समझ लेनी चाहिए. ये रिपोर्ट आपको बता रही है कि मौजूदा सरकार के दावे सिर्फ रैलियों तक ही सीमित हैं. किसान पहले भी मर रहे थे. और अब भी मर रहे हैं. सिर्फ भाषण जारी हैं. क्या भाषणों का अचार डाला जाएगा?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक साल 2015 में सूखे और कर्ज की वजह से 12602 किसानों और कृषि मजदूरों ने ख़ुदकुशी कर ली थी. ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों और कृषि मजदूरों के ख़ुदकुशी मामले दो फीसदी बढ़ गए. क्योंकि साल 2014 में 12, 360 किसानों और कृषि मजदूरों ने ख़ुदकुशी की थी.

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2014 और 2015 दोनों ही साल देश के बड़े हिस्से ने सूखे की मार झेली. इस दौरान देश के कई स्टेट सूखाग्रस्त घोषित किए गए. इन मौतों में करीब 87.5 फीसदी मौतें सात राज्यों में हुई हैं. सबसे ज्यादा खराब हालत महाराष्ट्र की रही. यहां मौत का आंकड़ा बड़ा है. साल 2015 में 4291 किसानों ने अपनी जिंदगी को ख़त्म कर लिया. इसके बाद कर्नाटक (1569), तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) हैं.

बिजनेस स्टैण्डर्ड में छपी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में जो 12 हजार 602 लोगों ने ख़ुदकुशी की, उनमें 8 हजार 7 किसान थे और 4595 कृषि मजदूर. साल 2014 में खुदकुशी करने वालों में 5650 किसान और 6710 कृषि मजदूरों थे. इन आंकड़ों पर गौर किया जाए तो किसानों की ख़ुदकुशी के मामले में एक साल में 42 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई. जबकि कृषि मजदूरों की सुसाइड दर में 31.5 पर्सेंट की कमी आई है.

रिपोर्ट में उन सभी को किसान माना गया है जिनके पास अपना खेत हो या फिर लीज पर ज़मीन लेकर खेती करते हैं. उन लोगों को कृषि मजदूर माना गया है जो दूसरे खेतों पर मजदूर के तौर पर काम करते हैं. किसानों, कृषि मजदूरों की ख़ुदकुशी के पीछे कंगाली, कर्ज और खेती से जुड़ी दिक्कतों को बड़ी वजह बताया गया है. ये वो तीन वजह थीं जिनकी वजह से करीब 38.7 फीसदी किसानों ने अपनी जिंदगी को खत्म कर डाला. आंकड़ों ये भी बताते हैं कि सुसाइड करने वालों में 73 फीसदी किसानों के पास सिर्फ दो एकड़ या उससे भी कम जमीन थी.

सरकार के सामने ऐसी क्या परेशानियां आ जाती हैं, जो किसानों की हालत नहीं सुधार पाते. आप रैलियों में इन नेताओं के भाषणों को सुनिए आपको लगेगा, वाह ये तो तकदीर ही बदल देगा. कर्जा माफ़ी के ऐलान. और भी बहुत छूट. आखिर ये सब कहां चले जाते हैं जो किसान ख़ुदकुशी कर लेते हैं. सबसे बुरी हालत उनकी होती है, जो छोटे किसान होते हैं. मौजूदा सरकार तो डिजिटल सरकार है फिर क्यों कृषि को तकनीक से लैस नहीं करती, क्यों पिछली सरकारों के हिसाब से ही कर्जा माफ़ी की स्कीम पर डिपेंड है. जो किसानों तक पहुंच भी नहीं पाता.


 

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