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असल जिंदगी के फुंसुक वांगड़ू को एशिया का नोबेल पुरस्कार मिल गया है

फुंसुक वांगड़ू. नाम तो सुना ही होगा. राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ जिसमें आमिर खान ने लद्दाख में रहने वाले फुंसुक वांगड़ू का किरदार निभाया था. ये तो हुई फिल्म की बात, मगर असल में जिस किरदार से आमिर का किरदार प्रेरित था उनका नाम है सोनम वांगचुक. लद्दाख में रहकर एक खास तरह का स्कूल चलाने वाले वांगचुक को इस साल का रमन मैग्सेसे अवॉर्ड दिया गया है. इंडिया में सोनम के अलावा मुंबई में रहने वाले डॉ. भारत वाटवाणी को भी ये अवॉर्ड मिल रहा है. ये वो अवॉर्ड है जिसे एशिया का नोबेल पुरस्कार भी कहते हैं.

पेशे से इंजीनियर रहे सोनम अब शिक्षा पर काम करते हैं. जैसा फिल्म में दिखाया गया था कि आमिर लद्दाख में ऐसा स्कूल चला रहै हैं जिससे वहां के स्थानीय लोगों बच्चों और युवाओं की जिंदगी बदल रही है. सोनम वांगचुक असल जिंदगी में वो करते हैं. वांगचुक तब 19 साल के थे जब वो श्रीनगर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से इंजीनियरिंग करते हुए उन्होंने स्कूली बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था. एक शो में अपने बारे में बात करते हुए वांगचुक ने कहा था, “मैं परेशान हूं. बहुत बार मुझसे लोग पूछते हैं कि आप तो फुंसुक वांगड़ू हैं, आपका स्कूल तो थ्री इंडियट्स वाला स्कूल है. मैं हाथ जोड़ कर कहता हूं कि मैं सोनम वांगचुक हूं और ख्वाबों यानी फिल्मी दुनिया से दूर हूं. मैं असली जिंदगी में जमीन पर कुछ काम करता हूं.”

वो आगे कहते हैं, “2008 में लद्दाख में हमारे काम को पुरस्कार देने के लिए मुझे मुंबई बुलाया गया था. CNN-IBN ने हमें रियल हीरो नाम से पुरस्कार दिया. मैं मुंबई पहुंचा. वहां आमिर खान साहब से मिला. वैसे फिल्में नहीं देखता मगर उनकी ‘तारे जमीं पर’ देखी थी. वहां उनसे बात हुई कि लद्दाख और बाल्टिस्तान के बीच एक ग्लेशियर की सुरक्षा में हजारों सैनिक लगाए गए हैं. एक अनुमान के मुताबिक यहां सुरक्षा में रोजाना 5 करोड़ रूपए का खर्च आता है. मैंने ये प्रपोजल आमिर के सामने रखा कि क्या किसी फिल्म के जरिए ये संदेश दिया जा सकता है कि दोनों तरफ के लोग आपस में मिलकर कहें कि यहां से सेना हटाओ और इस पैसे को सुरक्षा की जगह शिक्षा में लगाओ.”

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सोनम वांगचुक और डॉ. भारत वटवानी 31 अगस्त को फिलीपिंस में ये पुरस्कार लेंगे.

इस इवेंट में वांगचुक ये भी कहते दिखते हैं, ” बचपन से सुनते हैं कि देश के लिए जान दे देंगे. मगर मुझे लगता है कि हमें देश के लिए जान नहीं, जिंदगी देने की जरूरत है.” इस पर उस हॉल में बैठे लोगों ने खूब तालियां बजाईं. इनमें गीतकार जावेद अख्तर भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि वांगचुक की ये बात कि देश को जान नहीं, जिंदगी देने की जरूरत है, दिल को छू गई.

लेह के अल्ची जिले में पैदा हुए वांगचुक 1988 में पहली बार तब चर्चा में आए जब उन्होंने स्टूडेंट्स एजूकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL)नाम की संस्था शुरू की. वो एक सिद्धांत पर काम करती है. उस एजूकेशन सिस्टम को आसान बनाना जो ज्यादातर स्टूडेंट्स को खुद में समाहित ही नहीं कर पाता है. वांगचुक ने अपने स्कूल कैंपस में सौर ऊर्जा की व्यवस्था की है. लड़की, कोयला या किसी भी ऐसे ईंधन के उपयोग पर रोक लगाई है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता हो. इसी के चलते इस स्कूल ने ‘थ्री इडियट्स’ के फिल्म क्रू को इसलिए शूटिंग से मना कर दिया क्योंकि वो वहां अपने साथ बहुत कचरा लेकर आए थे. फिर कुछ वक्त बाद पास के एक स्कूल में शूटिंग की गई और इसे सोनम वांगचुक का स्कूल बताया गया.

फिर 1994 में ऑपरेशन न्यू होप नाम से एक और अभियान शुरू किया जिसमें सरकार के सहयोग से दूर बॉर्डर पर चल रहे सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने पर काम किया. तब से वांगचुक देश दुनिया में घूम-घूम कर शिक्षा व्यवस्था में नयापन लाने के मिशन पर काम कर रहे हैं.

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डॉ. भारत वाटवाणी मुंबई में रहते हैं.

सोनम के अलावा ये अवॉर्ड एक औऱ भारतीय को मिल रहा है. नाम है भारत वटवानी. ये देश में मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए काम करते है. मुंबई में रहने वाले डॉ. वटवानी 1988 से श्रद्धा रीहैबिलिटेशन फाउंडेशन नाम से एक संस्था शुरू की थी जो उन बेघर और लावारिस लोगों के लिए काम करती है जो मानसिक रूप से बीमार हैं. ऐसे लोगों के ईलाज, रहने और परिवार से मिलाने का काम करते रहे हैं डॉ. वटवानी.


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