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UPA सरकार ने जिस काम पर 4800 करोड़ लगाए, उसे NDA सरकार ने एक झटके में खारिज कर दिया

केंद्र सरकार का कहना है कि 2011 में UPA सरकार के रहते जो आर्थिक सामाजिक जातिगत जनगणना कराई गई थी, उसका डेटा अब इस्तेमाल लायक नहीं है. वो किसी काम का नहीं है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके ये बात कही है. अपने इस निष्कर्ष की वजह भी सरकार ने बताई है.

‘डेटा में तमाम खामिया हैं’

दरअसल महाराष्ट्र सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) और सामाजिक आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग (SEBC) के आरक्षण से संबंधित नीतियां बनाने के लिए केंद्र सरकार से ये डेटा मांगा था. इसी के बाद केंद्र ने कहा है कि 2011 में हुई गणना के इन डेटा में तमाम खामियां हैं. केंद्र सरकार के पास जो OBC की सूची है, उसमें 2479 OBC जातियां हैं. जबकि राज्यों की सूची में ये संख्या 3105 हैं. 2011 के डेटा में उपजातियों को लेकर भी अपर्याप्त जानकारियां हैं. ऐसे में इनका इस्तेमाल आरक्षण संबंधी नीतियां बनाने में नहीं किया जा सकता.

केंद्र सरकार ने 21 सितंबर को दाखिल हलफनामे में ये भी कहा कि जातियों को लेकर किए गए किसी भी फैसले का सामाजिक और राजनीतिक असर होता है. इसलिए कोई भी फैसला लेने पर उसके बड़े परिणाम होने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता.

जातिगत जनगणना की मांग

दरअसल पिछले काफी समय से जातिगत जनगणना की मांग उठ रही है. एक तरफ विपक्ष के तमाम दल और ख़ुद सत्ताधारी भाजपा के भी कुछ नेता हैं, जो ये मांग रख रहे हैं कि जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए. मसलन संघमित्रा मौर्य, जो 2019 में बदायूं से भाजपा के टिकट पर जीतकर सांसद बनी थीं, वो भी इसकी मांग रख चुकी हैं. नीतीश कुमार और रामदास अठावले भी इसके पक्ष में बोल चुके हैं. लेकिन भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र की NDA सरकार इस पर अपना रुख़ स्पष्ट कर चुकी है है, कि नो मीन्स नो.

2011 में हुई थी जनगणना

जातिगत जनगणना का मुद्दा 2010 में भी उठा था. तब देश में कांग्रेस के नेतृत्व में UPA-2 सरकार थी. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और वीरप्पा मोइली थे कानून मंत्री. मोइली ने मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर जातिगत जनगणना कराने की सलाह दी थी. सरकार ने प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में इस पर विचार के लिए एक समिति बनाई. समिति ने जातिगत जनगणना के पक्ष में सुझाव दिया. कहा कि आर्थिक सामाजिक जातिगत जनगणना कराई जा सकती है. सरकार ने करीब 4800 करोड़ रुपये की लागत से जनगणना शुरू कराई.

जनगणना के डेटा को 2016 में प्रकाशित किया गया. लेकिन सबसे बड़ी बात ये रही कि इससे जातिगत डेटा अलग कर दिया गया. मोटे तौर पर जो जातिगत डेटा इकट्ठा हुआ था, उसे सामाजिक न्याय मंत्रालय को सौंप दिया गया. मंत्रालय ने इस डेटा के प्रबंधन और क्लासिफिकेशन के लिए नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई. लेकिन इस कमेटी की कोई रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है. यानी जातिगत जनगणना का कोई डेटा सामने नहीं आया है. इसी डेटा को सार्वजनिक करने की मांग पर केंद्र की NDA सरकार ने अब कहा है कि ये किसी काम का ही नहीं है.


जातिगत जनगणना क्यों नहीं कराना चाहती मोदी सरकार, क्यों अड़े विपक्षी नेता?

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