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कांग्रेस के पास कैप्टन, तो अकाली दल ला रहा है जनरल

इस बार पंजाब में विधानसभा चुनाव दिलचस्प होने वाला है. ना सिर्फ इसलिए कि आम आदमी पार्टी ने आकर पुराने गणित को अच्छा-खासा डिस्टर्ब कर दिया है, बल्कि इसलिए भी कि यहां के ‘कैप्टन’ की काट के लिए शिरोमणि अकाली दल एक ‘आर्मी चीफ’ को ले आई है. तिस पर तड़का ये कि ये दोनों ही अफसर सन् 65 की लड़ाई में लड़े थे. यानी कभी साथ लड़े फौजी अब आमने-सामने होंगे.

पटियाला पंजाब में एक हाई प्रोफाइल सीट है जिस पर सूबे के कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह को 2002 से अब तक कोई हरा नहीं पाया है.

आज के हिन्दुस्तान टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से ये खबर दी है कि जनरल जे जे सिंह (रिटायर्ड) पटियाला विधानसभा सीट से कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं. जनरल जोगिन्दर जसवंत सिंह हिन्दुस्तान की फ़ौज के पहले सिख सेना प्रमुख (चीफ ऑफ़ स्टाफ) थे. अभी आधिकारिक घोषणा होनी बाकी है, लेकिन जे जे सिंह पटियाला पहुंच चुके हैं और उनके बयानों से साफ़ है कि वे किसी बड़े मकसद के लिए ही वहां पहुंचे हैं.

‘मैं कोई भी चैलेंज सिर्फ जीतने के लिए लेता हूं. ये वक़्त पटियाला का क़र्ज़ चुकाने का है.’ – जनरल जे जे सिंह

कौन हैं जनरल जे जे सिंह?

पिक्चर: Reuters
पिक्चर: Reuters

जे जे सिंह अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के फौजी हैं. इनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल जसवंत सिंह मारवाह ने दूसरा विश्वयुद्ध लड़ा था और दादा सिपाही आत्मा सिंह मारवाह ने पहला विश्वयुद्ध. 17 सितंबर 1945 को जब सिंह पैदा हुए, तब परिवार भावलपुर स्टेट (अब पकिस्तान में) के ‘सम्मा सत्ता’ में था. आज़ादी के बाद बंटवारे में परिवार पटियाला आकर बसा.

जे जे सिंह 1964 में जब राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) की पासिंग आउट परेड के बाद अपने पिता से ऑफिसर्स पिप्स (कंधे पर लगते हैं) ले रहे थे, तब उनके दादा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘भगवान ने चाहा तो एक सिपाही का बेटा कर्नल बनेगा और कर्नल का बेटा जनरल बनेगा.’ उनकी कही दोनों बातें सही हुईं.

अरुणाचल में 9 मराठा लाइट इन्फेंट्री के कमांडर रहते हुए उन्हें विशिष्ट सेवा मेडल मिला. 1987 से 1990 तक अल्जीरिया में भारत के पहले डिफेंस अटैशे भी रहे. घाटी में 79वीं ब्रिगेड के कमांडर के तौर पर उन्होंने तब फौजी ऑपरेशन्स में हिस्सा लिया जब वहां उग्रवाद चरम पर था. एक मुठभेड़ में वे घायल हुए और अपनी बहादुरी के लिए उन्हें सेना का वॉर वाउंड मेडल मिला. जनवरी 2005 में सेना प्रमुख बनने से पहले उन्होंने कई अलग-अलग अलग ज़िम्मेदारियां निभाईं.

लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा याद किया जाता है करगिल युद्ध के दौरान फौज के चेहरे के तौर पर. तब वे डायरेक्टर जनरल ऑफ़ मिलिट्री ऑपरेशन्स (DGMO)थे. टीवी और अख़बारों में सेना के ऑपरेशन की जानकारी ये ही देते थे. युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए जे जे सिंह को अति विशिष्ट सेवा मेडल मिला.

पिक्चर: Reuters
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सिंह रिटायर होकर अरुणाचल प्रदेश के गवर्नर बने. अप्रैल 2016 में उनको हिन्दुस्तान और फ्रांस के बीच संबंध सुधारने के लिए फ्रांस का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान Legion d Honneur दिया गया.

क्या है अकाली स्ट्रेटेजी?
जे जे सिंह और अकाली दल की नजदीकियां पिछले 6 महीने में ज़्यादा बढ़ी है. अकाली दल अमरिंदर के खिलाफ एक मज़बूत कैंडिडेट उतार कर अमरिंदर पर ज़्यादा समय पटियाला में गुज़ारने का दबाव बनाना चाहता है. उनका अंदाज़ा है कि इस से अमरिंदर को बाकी प्रदेश में प्रचार का वक़्त कम मिलेगा. इसलिए उन्होंने सिंह को चुना है, जिनकी हस्ती कैप्टन के टक्कर की है और जिनका ननिहाल और ददिहाल दोनों पटियाला में ही है.

पर यहां जनरल आराम से जीत नहीं पाएंगे

lok-sabha-speaker-accepts-resignation-of-amarinder-singh1इस सब के बावजूद जे जे सिंह और शिरोमणि अकाली दल की राह आसान नहीं है. जे जे सिंह का प्रोफाइल कितना भी दमदार हो, अमरिंदर सिंह की राजनीति में साख और अनुभव के आगे कुछ नहीं है. अमरिंदर न सिर्फ पटियाला राजपरिवार से आते हैं, बल्कि साढ़े तीन दशक से भी पहले से सियासत के दांव-पेच खेल रहे हैं. राजीव गांधी के कहने पर सियासत में आए अमरिंदर ने लोकसभा के लिए पहला चुनाव 1980 में जीत लिया था. हार-जीत-बगावत-गुटबाज़ी वगैरह का उन्हें अच्छा-खासा अनुभव है. पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं. पूरे राज्य में पहचाना हुआ चेहरा हैं. इसीलिए जब उन्होंने 2014 में अमृतसर से अरुण जेटली के खिलाफ चुनाव लड़ा, तो बहुत कम लोगों को उनके जीतने पर संशय था.

इसलिए अगर जनरल कैप्टन के खिलाफ जंग में उतरते हैं, तो उन्हें अपना पूरा जोर लगाना होगा.


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