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निर्भया केस: चार दोषियों की फांसी से एक दिन पहले कोर्ट ने क्या कहा?

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप के चार दोषियों की फांसी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. दोषियों के तीसरे डेथ वॉरंट के मुताबिक, उन्हें 3 मार्च की सुबह छह बजे फांसी दी जानी है. साथ ही दोषी पवन गुप्ता की दया याचिका खारिज कर दी गई है.

# क्यों बढ़ी तारीख?

चार दोषियों के नाम हैं- पवन गुप्ता, मुकेश सिंह, विनय कुमार शर्मा, और अक्षय कुमार. इनमें से पवन गुप्ता की दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज कर दी है. 7 जनवरी, 2020 को कोर्ट ने फांसी के लिए 22 जनवरी की तारीख तय की थी. उसके बाद मुकेश कुमार ने 15 जनवरी को दया याचिका राष्ट्रपति को भेजी. राष्ट्रपति ने उसे खारिज किया. फिर सुप्रीम कोर्ट ने मुकेश कुमार के क्यूरेटिव पिटीशन को भी खारिज कर दिया.

इसके बाद 17 जनवरी को फांसी की नई तारीख तय हुई. 1 फरवरी. लेकिन फांसी फिर टल गई. विनय ने 29 जनवरी को दया याचिका दायर की. उसे भी राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया. इसके बाद 1 फरवरी को अक्षय ने दया याचिका दायर की, जो 5 फरवरी को खारिज हो गई. फिर फांसी की तारीख तय हुई 3 मार्च.

# अक्षय ने दोबारा दायर की दया याचिका

दोषी अक्षय ने 29 फरवरी को एक बार फिर से दया याचिका दायर की. इससे पहले एक बार राष्ट्रपति उसकी दया याचिका खारिज कर चुके थे. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, अब दोषी अक्षय ने नई दया याचिका लगाई है, जिसमें उसने दावा किया कि पहले दायर की गई दया याचिका में सभी तथ्य नहीं थे.

# खारिज के तुरंत बाद फांसी क्यों नहीं?

दया याचिका के खारिज होने के 14 दिन बाद ही कोर्ट नया डेथ वारंट जारी कर सकता है. इसीलिए जब-जब याचिका खारिज की गई, उसके 14 दिन के अंतराल पर ही नया डेथ वारंट जारी किया गया.

# दोषी के पास सजा से बचने के दो चांस होते हैं?

सुप्रीम कोर्ट में किसी दोषी की फांसी पर मुहर लगने के बाद फांसी से बचने के लिए उसके पास दो विकल्प होते हैं.

1- दया याचिका- जो राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है.

2- पुनर्विचार याचिका- जो सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाती है.

सुप्रीम कोर्ट में किसी दोषी की फांसी पर मुहर लगने के बाद फांसी से बचने के लिए उसके पास दो विकल्प होते हैं. दया याचिका- जो राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है. और पुनर्विचार याचिका जो सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाती है. ये दोनों याचिकाएं खारिज होने के बाद दोषी के पास क्यूरेटिव पिटीशन का ऑप्शन होता है. ये पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाती है. इसमें कोर्ट ने जो सज़ा तय की है उसमें कमी के लिए रिक्वेस्ट की जाती है. यानी फांसी की सज़ा उम्रकैद में बदल सकती है. यह विकल्प इसलिये है ताकि न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो सके.


वीडियो देखें: निर्भया गैंगरेप केस: तीसरी बार जारी हुआ दोषियों का डेथ वारंट

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