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NHAI ने सालों पहले निजी फर्म का 20 लाख का पेमेंट रोका था, अब साढ़े 4 करोड़ देने पड़ेंगे!

हम टाइम पर टैक्स या बैंक की किस्त ना दें तो क्या होता है? जनाब पेनल्टी के साथ पूरा भुगतान करना पड़ता है. लेकिन ऐसा हमेशा आपके-हमारे साथ ही नहीं होता. कभी-कभी सरकार या उसके विभाग भी गलती कर जाते हैं. ये इसीलिए आपको बता रहे हैं कि केंद्र सरकार के बड़े विभाग NHAI को कई सालों तक एक निजी फर्म का पैसा रोकना भारी पड़ गया. दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे बीते सालों का सारा पेमेंट ब्याज समेत भरने का आदेश दिया है. 9 साल पहले भर दिया जाता तो केवल 20 लाख रुपये देने होते, लेकिन अब देने पड़ेंगे साढ़े चार करोड़ रुपये. नहीं भरने पर और भी ज्यादा ब्याज लग सकता है.

मामला क्या है?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2010 में NHAI यानी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने एक निजी फर्म के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था. इसके मुताबिक फर्म को 11 टोल प्लाज़ाओं पर इकट्ठा होने वाले टोल टैक्स की निगरानी करनी थी. बदले में फर्म NHAI को बिल भेजती थी, जिनका भुगतान किया जाता था. लेकिन बाद में 2011 में कुछ कारणों से NHAI ने फर्म के लिए भुगतान रोक दिया. इसी के खिलाफ फर्म हाई कोर्ट चली गई.

अखबार के मुताबिक, कोर्ट में NHAI ने दावा किया कि फर्म ने कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार समय पर काम नहीं किया और सारी रिपोर्टें भी देर से सौंपीं. इसीलिए पेमेंट में देरी की गई. लेकिन कोर्ट ने फर्म के फेवर में फैसला सुनाया. बताया गया है कि इसके बाद NHAI फर्म को लगभग साढ़े चार करोड़ रुपये का भुगतान करेगी. जबकि 2010 में उसे सिर्फ 20 लाख रुपये देने थे. लेकिन 9 साल बाद उसे 27 प्रतिशत की ब्याज दर के हिसाब से करोड़ों का भुगतान करना होगा.

मामले की क्रोनोलॉजी समझिए

– 2010 में 11 टोल प्लाज़ाओं से इकट्ठा होने वाले टोल टैक्स की निगरानी के लिए NHAI ने निजी फर्म से समझौता किया.

– इसके बदले विभाग फर्म को बिलों का भुगतान करता था.

– लेकिन एक साल बाद ही 2011 में NHAI ने पेमेंट रोक दिया.

– 2011 में फर्म ने खुद को MSME डेवलपमेंट ऐक्ट के तहत पंजीकृत कराया.

– समय पर पेमेंट ना मिलने की वजह से कंपनी MSME मंत्रालय द्वारा शुरू की गई MSME समाधान- विलंब भुगतान निगरानी प्रणाली के पास पहुंची.

– लेकिन वहां की काउंसिल मामले को नहीं सुलझा पाई. सो उसने दिल्ली के इंटरनेशनल आर्बिट्रैशन सेंटर को ये केस रेफर कर दिया.

– जून 2018 में सेंटर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि NHAI फर्म को 2.24 करोड़ रुपये का भुगतान करे. साथ में हर महीने के हिसाब से 27 प्रतिशत ब्याज का भी पेमेंट किया जाए.

– इस फैसले को अमल में लाने के लिए फर्म 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गई.

– नवंबर 2018 में कोर्ट ने आर्बिट्रैशन सेंटर के फैसले को सही ठहराया. उसने एनएचएआई को 4.18 करोड़ रुपए का भुगतान करने के लिए कहा.

– कोर्ट के फैसले के बाद विभाग ने फर्म को पेमेंट देना शुरू किया. जुलाई 2019 तक उसने 3.79 करोड़ रुपये का पेमेंट कर दिया गया था.

– लेकिन फिर फर्म ने अतिरिक्त ब्याज दर के साथ 83.78 लाख रुपए का और भुगतान किए जाने की मांग रखी. हाई कोर्ट ने फिर कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एनएचएआई को पेमेंट करने का निर्देश दिया.

– इस पर विभाग ने लीगल एडवाइजर से राय ली. उसने हिदायत दी कि अगर NHAI को और ज्यादा ब्याज दर से बचना है तो उसे नवंबर 2018 से लेकर जुलाई 2019 तक का भुगतान अतिरिक्त इंटरेस्ट पर कर देना चाहिए.

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, मामले से जुड़े जो दस्तावेज उसके पास हैं, उनमें इस एडवाइज का जिक्र है.

इस मामले पर सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने प्रतिक्रिया दी है. NHAI उन्हीं के मंत्रालय के तहत आता है. अखबार के मुताबिक, उसने गडकरी से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि मंत्रालय पूरे मामले की जांच करेगा.

(आपके लिए ये स्टोरी हमारे साथी आयूष ने लिखी है.)


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