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केरल की इस औरत के साथ 'नोटबंदी' ने सबसे ज़्यादा बुरा किया था

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आइए एक कहानी सुनाई जाए. वो नहीं जो दादा-दादी रात को सोते वक़्त बच्चों को सुनाते हैं. सच्ची कहानी. इसी समाज की कहानी. ऐसी कहानी जिसने नोटबंदी के दौरान चौंका दिया था कि कोई गांव ऐसा भी है जहां रह रही एक बुज़ुर्ग महिला को इस बात का ही पता नहीं चला कि पुराने 1000 और 500 के नोट चलने बंद हो गए हैं. इस वजह से उस महिला के 4 लाख रुपए कागज़ के टुकड़े बनकर रह गए. सब जगह गुहार लगाई कि नोट बदल जाएं. क्योंकि उसके पास अपनी जिंदगी गुज़ारने के लिए बस वही पैसे थे. फिर उस औरत की मौत हो गई है. बीमारी से, लेकिन उसके पैसे नहीं बदले जा सके. तो पढ़िए नोटबंदी की ये कहानी :


केरल में एक ज़िला है अर्नाकुलम. इस जिले के एक गांव में एक औरत रहती थी. नाम था सतीबाई. केरल के पशु चिकित्सा विभाग में नौकरी करती थीं. 20 साल पहले रिटायर हो चुकी थीं. अब वो 76 साल की बुज़ुर्ग महिला थीं. पेंशन आती थी और बैंक से जाकर ज़रूरत के पैसे निकाल लाती थीं.

सतीबाई के एक लड़की थी. जिसे वो बहुत प्यार करती थीं, क्योंकि इस दुनिया में उसके सिवा सतीबाई का कोई नहीं था. उनके पति की मौत तभी हो गई थी जब वो एक जवान लेडी हुआ करती थीं. बिना पति के घर चला रही थी. नौकरी करतीं और बेटी को पाल रही थीं. मगर किस्मत में कुछ और ही होना लिखा था. एक साल पहले ही उनकी बेटी की मौत हो गई थी. अब वो घर में अकेली थीं.

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के मुताबिक जब सतीबाई अपनी नौकरी से रिटायर हुई थीं तो उन्हें 10 लाख रुपए मिले थे. जिसमें से उनके पास 4 लाख रुपए बचे थे. और वो घर में ही रखे थे. वो घर में अकेली रहती थीं. गांव में रहने वाले लोगों के साथ उनकी बनती नहीं थी. क्योंकि सतीबाई को लगता था कि लोग उनका पैसा हड़पना चाहते हैं. वो घर से बाहर कम ही निकलती थीं. इसके पीछे एक वजह उनका तनाव भी था. क्योंकि पति और बेटी की मौत के बाद वो थोड़ी चिड़चिड़ी हो गई थीं.

और फिर नोटबंदी का फैसला हो गया. वही नोटबंदी जिसने सर्दी में लोगों को बैंकों और एटीएम की कतारों में खड़े होने को मजबूर कर दिया था. वही नोटबंदी जिसके ज़रिए दावे किए जा रहे थे कि काला धन बाहर आ जाएगा. मगर कितना कालाधन बाहर आया, कोई आंकड़ा सामने स्पष्ट नहीं. बल्कि एक पहलू इस नोटबंदी का ये रहा कि काम-धंधे चौपट हो गए थे. बार-बार नई करंसी बदलने के लिए सरकारी नियम बदल रहे थे. लोग परेशान इधर से उधर दौड़ रहे थे. मगर इन सबसे सतीबाई बेखबर थीं.

सतीबाई को पता ही नहीं था कि क्या चल रहा है. वो अपने घर में अपनी जिंदगी के दिन काट रही थीं. साल 2017 में ही जनवरी के आखिरी वीक में वो घर से बाहर निकलीं. परचून की दुकान से कुछ सामान लेने के लिए. हाथ में 500 का नोट था. उन्होंने सामान खरीदा. दुकानदार ने 500 का नोट लेने से मना कर दिया. कहा अब ये नोट नहीं चलते. नया नोट दो. ये सुनकर सतीबाई भौंचक रह गईं. वो दुकानदार से बहस करने लगीं. इसके बाद वो दूसरी दुकानों पर गईं. नोट वहां भी नहीं चला. ये जानकर सतीबाई परेशान हो गईं. परेशान होने की वजह थी उनके घर में पड़े 4 लाख रुपए.

सतीबाई घर वापस आईं और नोट थैले में भरे और पहुंच गईं बैंक. स्‍टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर के बैंक अफसर को थैला भरे नोट दिखाए. कहा इनका वो क्या करें. इन नोटों को बदल दें. बैंक अफसर ने उन्हें बताया कि नोट बदलने की सीमा खत्म हो चुकी है, अब सिर्फ एनआरआई लोगों के अकाउंट के ही नोट बदले जा सकते हैं. बैंक अफसर की इस बात पर वो बहुत गुस्सा हुईं. बैंक वालों ने उसकी मदद करने की कोशिश भी की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

गांव की पंचायत वार्ड सदस्य पोली टीपी ने द न्यूज़ मिनट को बताया कि हमने उनके पैसे बदलवाने के लिए एक एक्शन कमेटी बनाई थी. सभी दस्तावेज़ जुटाए और उन्हें लेकर चेन्नई भेजा, ताकि नए नोट बदले जा सकें. वहां पहुंचने पर भी मना कर दिया गया. कहा गया कि समय सीमा ख़त्म हो चुकी है. इसके लिए मंत्रालय से अनुमति की ज़रूरत है. मंत्रालय से संपर्क किया कुछ फायदा नहीं हुआ.

पोली टीपी ने बताया कि वो हार्ट और किडनी की मरीज़ थीं. कुछ हफ्ते पहले हम उन्हें केयर होम ले गए थे. वो बहुत कमज़ोर हो चुकी थीं. हम उनके साथ ही थे, जब उन्हें हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया. उनका अर्नाकुलम जनरल हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था. लेकिन बीमारी की वजह से 17 अगस्त की 2017 की रात को उनकी मौत हो गई.

पुराने नोट पुलिस ने कर दिए थे सीज़ (Source The News Minute)
पुराने नोट पुलिस ने कर दिए थे सीज़ (Source The News Minute)

अगर नोट बदल गए होते तो शायद उनको और बेहतर इलाज मिल सकता था. बल्कि पुलिस ने छापेमारी करके उस औरत के पुराने नोट सीज़ कर दिए थे. ये छापेमारी पंचायत सदस्यों के सामने की गई थी. नोट प्लास्टिक में बंधे हुए अलमारी में रखे मिले थे.

बुज़ुर्ग औरत की ये कहानी नोटबंदी के नाम बनकर रह गई. पता नहीं इस कहानी को कोई किसी को सुनाएगा या नहीं. या उसी तरह रह जाएगी, जैसे ये बुज़ुर्ग औरत नोटबंदी के फैसले से अनजान रह गई थी. वो भी उस ज़माने में जब न्यू इंडिया की बात हो रही है. सुनाते रहिए अब लोगों को इस बुज़ुर्ग की कहानी. करते रहिए शेयर. जोड़ते रहिए काले धन के आंकड़े कि कितना बाहर आ गया. अब ये बुज़ुर्ग इस दुनिया में नहीं रहीं.

ये कहानी नोटबंदी के समय की है.


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए असगर ने की थी.


 

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