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मनमोहन सिंह को राज्य सभा में भेजने के लिए कांग्रेस ये तिगड़म भिड़ा रही है

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24 जुलाई 1991. भारत की संसद में इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण बजट पेश किया जा रहा था और इस बजट को पेश कर रहे थे मनमोहन सिंह. वो राजनीति के लिए बने नहीं थे. ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़कर लौटने के बाद उन्होंने अपने करियर की शुरुआत टीचर के तौर पर की थी. योजना आयोग और रिजर्व बैंक और यूपीएससी से होते हुए वो आखिरकार नियति उन्हें संसद तक ले आई थी. ऐसे प्रतिभावान लोगों को चुनाव में जाया करने की बजाए राजनीतिक दल उन्हें राज्य सभा के रास्ते संसद में ले आते हैं. मनमोहन सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ. नरसिम्हा राव उन्हें असम से राज्य सभा में लेकर आए थे. पिछले 28 साल से इस राज्य का राज्य सभा में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. 15 जून 2019 को उनका असम से कार्यकाल ख़त्म होने जा रहा है. तीन दशकों में यह पहली बार होगा कि मनमोहन सिंह संसद से बाहर होंगे और वो भी बजट सत्र से ठीक पहले.

जून 2016 में हुए असम विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था. 126 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस की गिनती 78 से सिमटकर महज 26 पर आ गई. इस तरह मनमोहन सिंह के असम से एक दफा और राज्य सभा जाने की आशाएं धूमिल हो गईं. बीजेपी ने मनमोहन सिंह की जगह असम से कामख्या प्रसाद को राज्य सभा भेजा है.

राज्य सभा कभी भंग नहीं होती. हर सदस्य को छह साल के लिए चुना जाता है. हर दो साल में इसके एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन होता है. राज्य सभा के 2014 में चुने गए सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल 2020 में खत्म हो रहा है. ऐसे में कांग्रेस को मनमोहन सिंह को फिर से राज्य सभा भेजने के लिए 2020 तक का इंतजार करना पड़ सकता है. उससे पहले मनमोहन सिंह को राज्य सभा भेजने के लिए कांग्रेस एक और रास्ते पर विचार कर रही है. यह रास्ता थोड़ा पेचीदा है क्योंकि यह रास्ता गुजरात होकर जाता है.

ये दोनों नेता एक-दूसरे की प्रतिकृति हैं. आप यह कह सकते हैं कि अहमद पटेल कांग्रेस के अमित शाह हैं. या फिर ऐसे भी कि अमित शाह बीजेपी के अहमद पटेल हैं. दोनों गुजरात से हैं जोकि फिलहाल दोनों के दंगल का मैदान बना हुआ है.
ये दोनों नेता एक-दूसरे की प्रतिकृति हैं. आप यह कह सकते हैं कि अहमद पटेल कांग्रेस के अमित शाह हैं. या फिर ऐसे भी कि अमित शाह बीजेपी के अहमद पटेल हैं. दोनों गुजरात से हैं जोकि फिलहाल दोनों के दंगल का मैदान बना हुआ है.

क्या है गुजरात का रास्ता?

2017 में गुजरात विधानसभा से ठीक पहले गुजरात में राज्य सभा के चुनाव हुए थे. अमित शाह और स्मृति ईरानी को बीजेपी की तरफ से उतारा गया था. कांग्रेस की तरफ से अहमद पटेल मैदान में थे. सीटों के गणित के हिसाब से चुनाव बहुत साफ़ था. उस समय 182 सीटों वाली गुजरात विधान सभा में बीजेपी के पास 115 विधायक थे और कांग्रेस के पास 61. लिहाजा 3 में एक सीट कांग्रेस के खाते में जानी थी. लेकिन अमित शाह ने अहमद पटेल के चुनाव को बुरी तरह से फंसा दिया. शंकर सिंह बाघेला अपने 12 विधायकों के साथ कांग्रेस से अलग हो गए. बीजेपी के कई विधायक पलट गए. यह तो भला हो रणदीप सुरजेवाला का कि उन्होंने पूरे चुनाव में कई सारी टेक्निकल खामियां निकाल लीं और अहमद पटेल घिसटते ही सही लेकिन राज्य सभा की रेस जितने में कामयाब रहे. हालांकि बीजेपी ने अभी भी मैदान छोड़ा नहीं है. पटेल के खिलाफ चुनाव लड़ रहे बीजेपी उम्मीदवार बलवंत सिंह राजपूत इस चुनाव को लेकर हाईकोर्ट चले गए हैं. 20 जून को इस मामले की सुनवाई होनी है.

2019 के लोक सभा में अमित शाह गांधी नगर और स्मृति ईरानी अमेठी से लोक सभा पहुंचने में कामयाब रहीं. कोई आदमी संसद के एक ही सदन का सदस्य हो सकता है. लिहाजा दोनों को गुजरात से राज्यसभा की अपनी सांसदी छोड़ दी. अब यह सीटें खाली हैं. 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में 182 में से कांग्रेस के खाते में 81 सीट आई थीं. ऐसे में अगर राज्य सभा की दो खाली सीटों पर चुनाव होते हैं तो एक कांग्रेस के खाते में जानी तय है. लेकिन इसमें भी एक पेंच फंस गया है. कांग्रेस को डर है कि कहीं चुनाव आयोग इन दो राज्य सभा सीटों का चुनाव अलग-अलग दिन न करा दें. ऐसा होता है तो दोनों सीट बीजेपी के खाते में चली जाएंगी. इसी आशंका में घिरे कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं-

“क्योंकि दोनों सीट एक साथ खाली हुई थीं, लिहाजा दोनों सीटों का चुनाव एक साथ होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है यह हमारे संवैधानिक मूल्यों का मखौल उड़ाने जैसा होगा. अतीत में भी हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और दूसरे कई राज्यों में इस परम्परा को तोड़ा गया है.”

मनमोहन सिंह अभी 87 साल के हो चुके हैं. कई राजनीतिक विश्लेषक इसे मनमोहन सिंह के राजनीति से संन्यास लेने का सही मौक़ा मानते हैं. लेकिन चर्चा यह भी है कि कांग्रेस उन्हें अभी राजनीति में बनाए रखना चाहती है. ऐसे में मनमोहन सिंह को गुजरात के रास्ते फिर से राज्य सभा लाने के लिए जोर लगाए हुए है. अगर इसमें कामयाबी नहीं मिलती है तो 2020 के अप्रैल में मध्य प्रदेश और राजस्थान के 3-3 और छत्तीसगढ़ के 2 राज्य सांसदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इसके अलावा गुजरात और कर्नाटक के 4-4 राज्य सभा सांसदों का कार्यकाल भी अप्रैल 2020 में खत्म हो रहा है. कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर मनमोहन सिंह गुजरात से राज्य सभा नहीं पहुंचते हैं तो उन्हें इन राज्यों से राज्य सभा भेजा जा सकता है.


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Congress trying different options to send Manmohan Singh to Rajyasabha

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