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छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी नहीं रहे

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी नहीं रहे. उन्होंने रायपुर के नारायणा अस्पताल में 29 मई की दोपहर 3:30 बजे आखिरी सांस ली. नारायणा अस्पताल की तरफ से कहा गया है कि 29 मई की दोपहर डेढ़ बजे जोगी को कार्डियेक अरेस्ट आया, करीब दो घंटे तक डॉक्टर उन्हें ठीक करने की कोशिश करते रहे, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.

20 दिन से अस्पताल में भर्ती थे

9 मई को अजीत जोगी गंगा इमली (इमली की प्रजाति का एक मीठा फल) खा रहे थे. बीच उनकी सांस नली में फंस गया जिसके बाद उन्हें कार्डियेक अरेस्ट आया. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, वो कोमा में चले गए. डॉक्टरों ने उन्हें होश में लाने की काफी कोशिश की, लेकिन वो ठीक नहीं हो सके.

अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी ने ट्वीट करके जानकारी दी है कि उनका अंतिम संस्कार गौरेला में 30 मई को होगा. बता दें कि अजीत जोगी की बेटी अनुषा भी गौरेला में ही दफ्न है. अनुषा की मौत 1985 में हो गई थी, तब उन्हें इंदौर में दफ़नाया गया था. जब अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के सीएम बने तब 2001 में अनुषा के अवशेषों को इंदौर से लाकर गौरेला में दफनाया गया था.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने अजीत जोगी के निधन पर ट्वीट कर कहा कि अजीत जोगी का निधन छत्तीसगढ़ प्रदेश के लिए एक बड़ी राजनीतिक क्षति है.

पीएम मोदी ने अजीत जोगी के निधन पर कहा कि उन्हें लोगों की सेवा करने का शौक था. अपने पैशन से उन्होंने नौकरशाह और एक नेता के रूप में कड़ी मेहनत की. वह गरीबों, खासकर आदिवासी समुदायों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयासरत रहे. उनके निधन से दुखी हूं. उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएं.

लेक्चरर से मुख्यमंत्री बनने का सफ़र

21 अप्रैल, 1946 को बिलासपुर के गौरेला में अजीत जोगी का जन्म हुआ. परिवार गरीब था. जोगी ने बताया था कि गांव के जमींदार के बेटे के नाम पर उनका नाम अजीत रखा गया था. बाद में उन्होंने भोपाल से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. सिर्फ डिग्री नहीं गोल्ड मेडल. वापस आकर रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने लगे. यहीं पढ़ाते-पढ़ाते सिविल परीक्षाओं की तैयारी उन्होंने की. पहले IPS निकाला, फिर दो साल बाद IAS की परीक्षा भी पास कर ली. लंबे समय तक मध्यप्रदेश में कलेक्टरी की. 1985 में जोगी इंदौर के कलेक्टर थे. उसी दौरान राजीव गांधी के दफ्तर से फोन आया और कलेक्टरी छोड़, उन्होंने भोपाल जाकर राज्यसभा का नामांकन भर दिया. सांसद रहने के साथ-साथ वह कांग्रेस में कई पदों पर रहे. प्रवक्ता रहे, महासचिव बने. साल 2000 में जब मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना तो अजीत जोगी इस नए सूबे के मुख्यमंत्री बने.

तीन साल सीएम रहने के बाद चुनाव हारे. कांग्रेस में रहते हुए प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से अनबन होती रही. अनबन ऐसी कि 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले जोगी ने अपने घर यानी सागौन बंगले के बाहर तख्ती टांग दी कि टिकट के लिए यहां संपर्क न करें. 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस बुरी तरह हार गई. छत्तीसगढ़ पीसीसी का नेतृत्व बदला, भूपेश बघेल नए अध्यक्ष बने. इसके बाद जोगी की बगावत कई मौकों पर खुलकर सामने आई.

2015 के अंतागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मंतूराम पवार ने ऐसे मौके पर मैदान छोड़ा कि कांग्रेस दूसरा उम्मीदवार भी खड़ा नहीं कर पाई. बाद में पवार बीजेपी में शामिल हुए. पवार जोगी के करीबी थे. आरोप लगा कि जोगी के कहने पर पवार ने नाम वापस लिया. फिर 2016 की पहली सुबह एक टेप बाहर आया. इसमें बातचीत थी अमित जोगी, अजीत जोगी और रमन सिंह के दामाद पूनीत गुप्ता की. उपचुनाव को लेकर ही. टेप आने के बाद अमित जोगी कांग्रेस से 6 साल के लिए बाहर कर दिये गए. चूंकि, अजीत AICC मेंबर से थे तो उन्हें लेकर लंबी जांच बैठी. कांग्रेस कोई फैसला करती उससे पहले जोगी ने पार्टी को अलविदा कह दिया.

अपनी अलग पार्टी बनाई. 2018 के विधानसभा चुनाव में पुरज़ोर कोशिश की सीएम के तौर पर वापसी की. लेकिन दोबारा सीएम बनने का उनका सपना पूरा नहीं हो सका.


विडियो- कलेक्टर से सूबे के पहले आदिवासी CM तक अजीत जोगी की कहानी

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