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सीएम जगनमोहन ने सुप्रीम कोर्ट के जज एनवी रमना की शिकायत चीफ जस्टिस से क्यों कर दी?

भारत में राज्य की शक्तियों में बराबरी का बंटवारा है. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के पास बराबर-बराबर ताकत है. न्यापालिका, कार्यपालिका और विधायिका से जुड़े विवादों का निपटारा करती है. लेकिन कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच ही विवाद पैदा हो जाए, तो उसका निपटारा कहां और कैसे होगा? आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े को एक चिट्ठी लिखकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एनवी रमना की शिकायत की है. आरोप लगाया है कि जस्टिस एनवी रमना आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की सुनवाई में दखल दे रहे हैं. जस्टिस रमना भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश हो सकते हैं, इसीलिए शिकायत और शिकायत का बैकग्राउंड गहरे चिंतन की मांग करते हैं.

आज़ाद भारत के इतिहास में शायद ये पहला मौका होगा, जब एक मुख्यमंत्री ने भविष्य के सीजेआई के ख़िलाफ़ वर्तमान सीजेआई से इस तरह शिकायत की है. इस पूरे मामले में जस्टिस रमना का पक्ष अभी सामने नहीं आया है.

क्या लिखा है इस पत्र में?

जगनमोहन रेड्डी ने पत्र में आरोप लगाया है कि जस्टिस रमना आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के काम-काज में दखल दे रहे हैं और सुनवाई को प्रभावित कर रहे हैं. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि जस्टिस रमना पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगूदेशम पार्टी (टीडीपी) प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के करीबी हैं और उनके साथ मिलकर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं.

इतना ही नहीं, जगन का कहना है कि जस्टिस रमना की दो बेटियों ने अमरावती में राजधानी बनने की घोषणा से पहले ज़मीन खरीदी, जिनका ट्रांजेक्शन संदिग्ध है. चंद्रबाबू नायडू सरकार दौरान अमरावती कैपिटल रीज़न में हुई कथित अनियमितता और ज़मीन खरीद को लेकर जगन सरकार ने 10 सदस्यीय स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई थी.

मुख्य सलाहकार अजेय कल्लम ने की प्रेस कॉन्फ्रेंस

जगनमोहन रेड्डी के आठ पेज के इस पत्र पर 6 अक्टूबर की तारीख लिखी है, लेकिन इसे 10 अक्टूबर को जगन के मुख्य सलाहकार अजेय कल्लम ने प्रेस कॉन्फ्रेस कर सार्वजनिक किया. पहले ये प्रेस कॉन्फ्रेंस जगन खुद करने वाले थे, लेकिन अंत में अजेय कल्लम को ये जिम्मेदारी सौंपी गई. अजेय कल्लम पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के मुख्य सचिव रह चुके हैं. अजेय कल्लम ने कहा कि जगन सरकार ने जांच से ये स्थापित कर दिया है कि चंद्रबाबू नायडू और उनके सहयोगियों ने 2014 से 2019 के बीच अवैध तरीके से अकूत संपत्ति अर्जित की.

पत्र में कई मामलों का जिक्र है और कहा गया है कि कैसे टीडीपी से जुड़े मामले कुछ सम्माननीय जजों को दिए गए. पत्र में कहा गया है-

”जब से वाईएसआर कांग्रेस मई 2019 में सत्ता में आई है और चंद्रबाबू नायडू के दौर में जून 2014 से मई 2019 के बीच की गई डील पर जांच बिठाई है, तब से जस्टिस रमना राज्य में न्यायिक प्रशासन को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं.”

जस्टिस रमना को चंद्रबाबू नायडू का करीबी बताते हुए पत्र में जगन ने कहा-

”मैं ये बयान पूरी जिम्मेदारी से दे रहा हूं. मैं बस नोटिस में ला रहा हूं कि सुप्रीम कोर्ट के सम्मानित पूर्व न्यायाधीश जस्टिस चेलमेश्वर ने ये बात सबूत के साथ ऑन रिकॉर्ड दर्ज की है.”

जगन का आरोप है कि ज़मीन खरीद को लेकर राज्य के पूर्व एडवोकेट जनरल दम्मलपति श्रीनिवास पर जो जांच बैठी, उस पर हाईकोर्ट ने स्टे लगा दिया, जबकि एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने उनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज की थी. 15 सितंबर, 2020 को हाईकोर्ट ने मीडिया को श्रीनिवास मामले में दर्ज एफआईआर की डीटेल रिपोर्ट करने से रोक दिया था. ये मामला अमरावती में ज़मीन खरीद से जुड़ा है.

जगन ने पत्र के आखिर में सीजेआई से अपील की है कि ऐसे कदम उठाएं जाएं, ताकि राज्य की न्यायपालिका की तटस्थता बरकरार रहे. लेकिन ये पत्र अचानक क्यों आ गया? इसकी टाइमिंग भी देखने लायक है. इसके लिए आपको जगन से जुड़े एक मामले के फ्लैशबैक में चलना होगा.

क्या है असली वजह?

असल में जस्टिस रमना नेताओं के ख़िलाफ़ लंबित पड़े आपराधिक मामलों को फास्ट ट्रैक करने की सुनवाई कर रहे हैं. 9 अक्टूबर को जगनमोहन रेड्डी के ख़िलाफ़ बेहिसाब संपत्ति के एक मामले में उनकी बेंच ने न्यायिक प्रक्रिया फिर से शुरू करने का आदेश दिया है. इसके अगले ही दिन यानी 10 अक्टूबर को जगन का ये पत्र मीडिया में आता है, जिसमें वो जस्टिस रमना पर आरोप लगाते हैं.

इस मामले में जगन 7 फरवरी को सीबीआई कोर्ट के सामने पेश हुए थे और निजी तौर पर पेश होने से छूट पाने के लिए उन्होंने 11 याचिकाएं डाली थीं. उन्होंने व्यस्त शेड्यूल और दूसरे कारण गिनाए थे. 9 अक्टूबर को जब सुनवाई शुरू हुई, तो जगन के वकील जी अशोक रेड्डी ने केस की वर्चुअल सुनवाई की बात कही. कोर्ट ने सुनवाई 12 अक्टूबर तक टाल दी.

जगन का ये केस क्या है?

तो सवाल है कि जगन का ये केस क्या है, जिसकी फाइल फिर से खुल गई है. मामला है 10 अगस्त, 2011 का, जब आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिए कि जगन के दिवंगत पिता और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की सरकार में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच की जाए. इस कथित भ्रष्टाचार की शिकायत कांग्रेस विधायक पी. शंकर राव ने की थी. 17 अगस्त, 2011 को सीबीआई के एंटी करप्शन ब्यूरो ने जगनमोहन रेड्डी और दूसरों के खिलाफ कई भ्रष्टाचार रोधी कई धाराओं में केस दर्ज किया था.

सीबीआई की एक टीम ने सात महीने की जांच के बाद 31 मार्च, 2012 को चार्जशीट दाखिल की. 68 पन्नों की इस चार्जशीट में जगन को आरोपी नंबर वन बनाया गया और ज्ञात स्रोतों से ज़्यादा इनकम की बात कही. जगन के अलावा 12 लोगों का भी नाम इसमें शामिल था, जिसमें जगन के करीबी वी. विजय साई रेड्डी भी थे.

जगन पर क्या आरोप हैं?

चार्जशीट में कहा गया कि साल 2004 से 2009 के बीच जब जगन के पिता मुख्यमंत्री थे, तब जगन ने कुछ प्राइवेट कंपनियों, व्यक्तियों को माइनिंग की ज़मीन सस्ते दाम पर देने या लीज़ पर देने के लिए अपने पिता से कहा. इसके बदले में इन लोगों ने जगन के व्यापार में निवेश किया. सीबीआई ने कई प्रोजेक्ट्स को लेकर 10 और चार्जशीट दाखिल की. इन चार्जशीट में भी जगन को आरोपी बनाया गया.

सीबीआई जांच के आधार पर ईडी ने भी जगन के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग के पांच केस दर्ज किए. 17 जनवरी, 2020 को जगन ने सीबीआई कोर्ट में याचिका दायर की कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले तब तक स्थगित कर दिए जाएं, जब तक सीबीआई में मामलों की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती. कोर्ट ने याचिका रद्द कर दी. ईडी का कहना था कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले सीबीआई वाले मामलों से से जुड़े हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इसी बीच, 2016 में वकील अश्विनी उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डालते हैं. कि जिन नेताओं पर आरोप सिद्ध हो चुके हों, जो दोषी हों उन पर बैन लगाया जाए और ऐसे मामलों को फास्ट ट्रैक किया जाए. तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई इसकी सुनवाई कर रहे थे, जो नवंबर, 2019 में रिटायर हो गए. इसके बाद मामला वर्तमान सीजेआई एसए बोबडे की बेंच के पास आ गया, जिन्होंने इसे जस्टिस रमना की बेंच को सौंप दिया. रंजन गोगोई ने नवंबर, 2017 में हर राज्य में लंबित मामलों के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का आदेश दिया था. ऐसी 12 कोर्ट देशभर में बनाई गईं.

जस्टिस रमना की बेंच ने पहली बार 4 मार्च, 2020 को मामला हाथ में लिया. 5 मार्च को बेंच ने देशभर के हाईकोर्ट को लंबित मामलों की डीटेल्स झाड़ने-पोछने को कहा मतलब ये जानकारियां अपडेट करने की बात हुई. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी जोड़ा कि हाईकोर्ट ये भी बताएं कि कब तक इन मामलों का निपटारा हो जाएगा. देशभर के हाईकोर्ट से डीटेल्स इकट्ठा की गईं और सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि विधायकों-सांसदों के ख़िलाफ़ 4 हज़ार 442 केस लंबित हैं. इनमें 2 हज़ार 556 मामले वर्तमान जन-प्रतिनिधियों के हैं.

इसके बाद जस्टिस रमना की बेंच ने 16 सितंबर को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से एक स्पेशल बेंच गठित करने को कहा, जो इन मामलों की सुनवाई को मॉनिटर कर सके. इसी सिलसिले में सीबीआई अदालत से जगन के मामले में फिर से सुनवाई करने को कहा गया.

तो इसलिए सामने आई रेड्डी की चिट्ठी?

माना जा रहा है कि इस पूरी पृष्ठभूमि में जगनमोहन की चिट्ठी सामने आई है. ‘द टेलीग्राफ’ अख़बार ने न्यायपालिका के कई सूत्रों के हवाले से बताया है कि जस्टिस रमना इसी वजह से जगन के टारगेट में हैं, क्योंकि वो नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मामलों को लेकर आदेश दे रहे हैं. जगन खुद प्रवेंशन ऑफ करप्शन ऐक्ट के तहत कई मामले झेल रहे हैं. जब वो विपक्ष में थे, तब जमानत मिलने से पहले वो अलग-अलग मामलों में 16 महीने जेल में रहे थे.

लेकिन ये पहली बार है जब जगनमोहन रेड्डी ने सीधे न्यायपालिका पर हमला किया हो. इससे पहले उनकी सरकार के नेता और मंत्री आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के ख़िलाफ़ बयान देते रहे हैं. असल में जब से जगनमोहन रेड्डी सत्ता में आए हैं, उनकी सरकार के कई फैसलों पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है. इसे लेकर जगन सरकार में नाराजगी है. इसके कुछ उदाहरण भी आपको बताते हैं.

पहले की चंद्रबाबू नायडू सरकार ने अमरावती को आंध्र प्रदेश की राजधानी बनाने का फैसला किया था, लेकिन जगन सरकार ”तीन राजधानी” की योजना लेकर आई- विशाखापतनम, कुरनूल और अमरावती. लेकिन प्रशासन के इस विकेंद्रीकरण पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी. करीब 90 याचिकाएं हाईकोर्ट में ऐसी थीं, जिन्होंने तीन राजधानी के प्रस्ताव का विरोध किया. फिलहाल आंध्र प्रदेश की तीन राजधानियां हैं.

इसी साल की शुरुआत में हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि एन. रमेश कुमार को राज्य चुनाव आयुक्त के तौर पर फिर से बहाल किया जाए, लेकिन जगन सरकार इस आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.

जगन सरकार स्थानीय निकायों में पिछड़ी जाति का कोटा 27 फीसदी से बढ़ाकर 34 फीसदी करना चाहती थी, जिसे हाईकोर्ट ने रोक दिया.

कक्षा एक से छह के बीच सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम को अनिवार्य किए जाने के जगन सरकार के आदेश को भी हाईकोर्ट ने नामंजूर कर दिया. इसे कोर्ट ने असंवैधानिक और कई अनुच्छेदों का उल्लंघन बताया. इस पर भी राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई लेकिन राहत नहीं मिली.

ये पूरा मामला लोकतंत्र के उस ढांचे पर सवाल खड़ा करता है, जहां विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे के लिए चेक एंड बैलेंस का काम करते हैं. वैसे भी कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका की लड़ाई नई नहीं है, लेकिन इस तरह की चिट्ठीबाजी नई है. इससे पहले केंद्र के स्तर पर इंदिरा गांधी सरकार की न्यायपालिका से ठन चुकी है. अब जगनमोहन रेड्डी का मामला भी एक और क्लासिक उदाहरण के तौर पर दर्ज हो चुका है.


वीडियो- आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जस्टिस एनवी रमन्ना पर क्या आरोप लगाए?

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