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काबुल पर कब्जा जमाने के बाद तालिबान ने 6 देशों को ही सबसे पहले न्यौता क्यों दिया?

तालिबान (Taliban) भले ही सरकार बनाने की ऊहापोह में हो लेकिन खबर है कि उसने 6 देशों को सरकार गठन के समारोह में शामिल होने का न्यौता भेज दिया है. कौन हैं ये देश? असल में ये वही 6 देश हैं जो तालिबान के लंबे वक्त से साथी रहे हैं. इनके नाम हैं- रूस, चीन, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और कतर. इन्हें न्यौता मिलने को तालिबान के आने के बाद अफगानिस्तान (Afghanistan) की विदेश नीति के पहले कदम के तौर पर देखा जा रहा है. आइए जानते हैं कि इन 6 देशों के अफगानिस्तान से क्या हित जुड़े हैं.

इंडिया टुडे की विदेश संवाददाता गीता मोहन के अनुसार पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई वो तीन देश हैं जिन्होंने 90 के दशक तालिबान सरकार को मान्यता दी थी. ऐसे में इस नई सरकार को समर्थन न करना व्यावहारिक नहीं दिखता. नए साथी जैसे ईरान, तुर्की, रूस और चीन अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के हटने के बाद पैदा हुई खाली जगह को भरने के लिए आए हैं. ये सभी उस बातचीत का भी हिस्सा हैं जिसमें अफगानिस्तान की पुरानी सरकारों के साथ मिलकर तालिबान ने शांतिपूर्ण तरीके से देश चलाने की बात कही है. अब बात उन 6 देशों की.

पाकिस्तान

पिछले 20 साल से जब पश्चिम ने अफगानिस्तान में जंग छेड़ रखी थी तो पाकिस्तान अफगानिस्तान का सपोर्ट करता रहा. अमेरिका भी अब ये बात मानता है कि अगर तालिबान को पाकिस्तान से मदद नहीं मिलती तो विदेशी सेनाओं की ऐसी हार नहीं होती.

तालिबान पाकिस्तान को दूसरा घर कहता है. ऐसा तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने खुद इंडिया टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा है. उन्होंने बताया कि बहुत से तालिबानी हैं जिनका घर पाकिस्तान में है और उनके बच्चे वहीं पर पढ़ाई कर रहे हैं. पाकिस्तान के मंत्री शेख राशिद ने एक टीवी शो में कहा था कि पाकिस्तान की सेना हमेशा ही तालिबान नेताओं की संरक्षक रही है. राशिद ने पाकिस्तानी न्यूज चैनल पर कहा था कि

“हम तालिबान नेताओं के संरक्षक हैं. हमने उनकी लंबे वक्त तक देखभाल की है. उन्हें पकिस्तान में शरण, शिक्षा और घर मुहैया कराया गया है. हमने उनके लिए सबकुछ किया है.”

पाकिस्तान के पीएम इमरान खान (Imran Khan). (तस्वीर: एपी)
पाकिस्तान के पीएम इमरान खान भी तालिबान के अफगानिस्तान पर काबिज होने पर खुशी जता चुके हैं. (तस्वीर: एपी)

चीन

चीन ने अमेरिका के अफगानिस्तान से बाहर निकलने के बारे में सवाल खड़े किए. लेकिन जब काबुल में सरकार को मान्यता देने की बात आई तो उसने भी बाकियों की तरह इंतजार करने का रास्ता चुन लिया. चीन इसे अपने बेल्ट एंड रोड प्रोग्राम को बढ़ाने के मौके के तौर पर देख रहा है. हालांकि उसकी सुरक्षा हमेशा ही चिंता की विषय बनी रहेगी. इस प्रोग्राम पर चीन पाकिस्तान में बड़ा पैसा लगा रहा है. चीन अफगानिस्तान में किस तरह आगे बढ़ता है, इस पर अमेरिका की भी पैनी नजर है. तालिबान के न्यौते के बारे में पूछे जाने पर चीन के विदेश मंत्री ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. जब चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन से न्यौते की रिपोर्ट के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि

“मुझे फिलहाल ऐसे किसी ऑफर की जानकारी नहीं है.”

चीन ने तालिबान के साथ काफी पहले बातचीत शुरू कर दी थी. तालिबान नेता काबुल पर कब्जा होने से पहले ही बीजिंग की यात्रा करते रहते थे. लेकिन चीन के लिए मामला इलाके से बाहर का भी है. उसे इस सच्चाई का सामना भी करना पड़ेगा कि अफगानिस्तान से निकलने के बाद अब अमेरिका पूरी तरह से चीन पर फोकस कर सकेगा.

Xi Jinping
चीन ने तालिबान का समर्थन तो किया है लेकिन उसकी सरकार को मान्यता नहीं दी है. तस्वीर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग.

रूस

रूस भी उन देशों में से है जिसने अपने हिसाब से पहले ही तालिबान से बातचीत शुरू कर दी थी. इसे मॉस्को फॉर्मेट कहा गया. मॉस्को फॉर्मेट शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 2017 में हुआ था, जब 6 पक्षों ने साथ आकर बातचीत शुरू की थी. इसमें रूस, अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, ईरान और भारत शामिल थे. नवंबर 2018 में रूस ने तालिबान के उच्च स्तर के प्रतिनिधि मंडल के साथ अफगानिस्तान की हाई पीस काउंसिल और 12 देशों की मेहमाननवाज़ी की. इस मीटिंग का उद्देश्य था अफगानिस्तान में सुलह की प्रक्रिया तेज करना और जल्दी से जल्दी शांति बहाली करना. रूस भले ही ये सब कोशिशें करता रहा हो लेकिन फिलहाल चीन की तरह ‘वेट एंड वॉच’ के फॉर्मूले पर चल रहा है. हालांकि उसने अमेरिका के अफगानिस्तान के बाहर जाने को ‘विदेशी कब्जे’ से मुक्ति बताया है. रूस की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं हैं. वह भी अफगानिस्तान की स्थिति पूरी तरह साफ होने का इंतजार करेगा, उसके बाद ही संभवत: कोई कदम उठाएगा.

Putin
रूस फिलहाल अफगानिस्तान को लेकर बहुत सतर्कता से चल रहा है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन की तस्वीर. (फाइल फोटो AP)

ईरान

अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से वापस जाने का स्वागत करने वालों में ईरान भी है. उसने तालिबान प्रशासन के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जाहिर की है. ईरानी प्रेसिडेंट इब्राहिम रईसी ने कहा है कि

“अमेरिका की सैन्य हार अफगानिस्तान में जिंदगी, सुरक्षा और स्थायी शांति स्थापित करने का एक बेहतरीन मौका है.”

हालांकि तेहरान ने तालिबान के साथ पहले भी रिश्ते सिर्फ इसलिए बनाए क्योंकि अमेरिका ने उसे अलग-थलग कर रखा था. ईरान और तालिबान के बीच शिया-सुन्नी का विवाद काफी गंभीर है. 1998 में तो तालिबान और ईरान एक ईरानी राजनयिक की हत्या के बाद आमने-सामने आ गए थे.

लेकिन 9/11 हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में एंट्री की और ईरान के खिलाफ भी सख्त रुख अपनाया. ऐसे में तेहरान के लिए ये अच्छा ही था कि अफगानिस्तान में अशांति बनी रहे. इस बीच तेहरान ने तालिबान से बातचीत का एक नया ट्रैक निकाला. उसने दोहा में अमेरिका और तालिबान की शांति वार्ता के बीच तालिबान से अलग से बातचीत की.

एक पड़ोसी होने के नाते अफगानिस्तान का ईरान के लिए बहुत महत्व है. उसे उम्मीद है कि जब पश्चिम ने उस पर प्रतिबंध लगा रखे हैं तो ऐसे में अगर अफगानिस्तान में हालात सुधरते हैं तो व्यापार करने का उसे भी कुछ मौका मिल जाएगा.

संभावना है कि रईसी चुनाव जीतेंगे और ईरान के अगले राष्ट्रपति बनेंगे. (तस्वीर: एएफपी)
ईरान के प्रेसिडेंट रईसी भी पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान से अच्छे रिश्ते चलाने की बात कर चुके हैं. (तस्वीर: एएफपी)

तुर्की

तुर्की इसे अपने लिए एक मौके के तौर पर देख रहा है. वह अमेरिका और नाटो सेनाओं के अफगानिस्तान से निकलने के बाद अफगानिस्तान में बने राजनयिक खालीपन का फायदा उठाना चाहता है. ये अलग बात है कि तुर्की भी 2001 में हुए उस नाटो ऑपरेशन का हिस्सा था जो तालिबान के खिलाफ चलाया गया था.

तुर्की के प्रेसिडेंट एर्दोगान ने कहा है कि वो तालिबान के साथ सहयोग करने के लिए राजी है. तुर्की लगातार तालिबान के संपर्क में रहा है और अब भी संपर्क में है. हो सकता है जल्दी ही तालिबान काबुल एयरपोर्ट के संभालने में तालिबान की मदद करना नजर आए. वहां इंतजाम सुचारू बनाने में तुर्की सहयोग कर ही रहा है.

तालिबान और तुर्की दोनों एक दूसरे से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहते हैं. तुर्की के लिए सुरक्षा, स्थिरता और शरणार्थी समस्या बड़ा संकट हैं. लेकिन वह चाहता है कि अफगानिस्तान के बाजार उसके लिए खुल जाएं और युद्ध में ध्वस्त हो चुके देश को फिर से बनाने के काम में उसे हिस्सा मिल सके.

Turkey President Erdogan
तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगान अमेरिका और नाटो सेनाओं के अफगानिस्तान से हटने को एक मौके की तरह देख रहे हैं. (फोटो: एपी)

कतर

कतर ने 1996 से 2001 के बीच बनी तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी थी, लेकिन उसने तालिबान के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखे. सऊदी अरब और तुर्की तालिबान के साथ ज्यादा करीब नजर आए, ऐसे में अमेरिका ने कतर को शांति वार्ता स्थल के विकल्प के तौर पर चुना.

कतर ने न सिर्फ 2011 में अमेरिका की ओबामा सरकार के वक्त से ही दोहा को तालिबान से बातचीत के मंच के तौर पर उपलब्ध कराया बल्कि वह एक सेंट्रल ट्रांजिट हब की तरह भी उभरा. जब 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल में एंट्री की तो वहां से बाहर निकालने के काम में कतर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

मध्यस्थता में कतर के रोल की शुरुआत एक दशक पहले ही हो चुकी थी. तालिबान ने अपना स्थायी राजनीतिक ऑफिस 2013 से 2020 तक कतर में खोले रखा. जब ट्रंप के साथ दोहा समझौता हुआ, तब तक ये ऑफिस खुला रहा.
आज कतर अफगानिस्तान के हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को तकनीकी सपोर्ट उपलब्ध करा रहा है.


वीडियो – पंजशीर में तालिबान ने जीत का दावा किया, पर सच्चाई क्या है?

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