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तालिबान के साथ बैठक में क्या बात हुई, सरकार ने बता दिया है

जब से तालिबान (Taliban) अफगानिस्तान (Afghanistan) पर काबिज़ हुआ है, भारत के लिए असमंजस की स्थिति बनी हुई है. अपने हितों को ध्यान में रखते हुए एक आतंकी संगठन ‘तालिबान’ से बात करे या न करे. तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद भारत ने 15 दिन तक इंतजार किया, और 31 अगस्त को दोहा में तालिबान से बात की. अब भारत ने बताया है कि आखिर भारत की तालिबान से क्या बात हुई. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि पूरी बातचीत का फोकस इस बात पर रहा कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए नहीं किया जाएगा.

क्या भारत फिर तालिबान से बात करेगा?

अमेरिका ने डेडलाइन के एक दिन पहले यानी 30 अगस्त को अपने सभी सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल लिया. इसके एक दिन बाद 31 अगस्त को कतर के दोहा में भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने तालिबान के प्रतिनिधि शेर मुहम्मद अब्बास स्टानेकज़ई से मुलाकात की. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने 2 सितंबर को इस बातचीत के बारे में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जानकारी दी. बागची ने कहा कि तालिबान से कहा गया है कि वो सुनिश्चित करे कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी हरकतों के लिए नहीं होने देंगे. जब बागची से इस पर तालिबान की प्रतिक्रिया के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि

“हमें सकारात्मक जवाब मिला है.”

जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या ये माना जाए कि भारत तालिबान को मान्यता देता है? इस पर बागची ने कहा कि

“ये बस एक मीटिंग थी. मेरे हिसाब से बहुत शुरुआती दिन हैं.”

तालिबान से दोबारा मीटिंग को लेकर जब उनसे सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि

“मैं भविष्य का अंदाजा नहीं लगाना चाहता. मेरे पास इसके बारे में कोई भी जानकारी नहीं है जो मैं बता सकूं.”

जब प्रवक्ता से अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि एक बार काबुल एयरपोर्ट पर ऑपरेशन शुरू हो जाने के बाद इस मामले पर फिर विचार किया जाएगा.

इन पर है अफगान संकट से निपटने का दारोमदार

भारत की तरफ से जारी स्टेटमेंट में कहा गया था कि दोहा में दीपक मित्तल और स्टानेकजई के बीच मुलाकात तालिबान की रिक्वेस्ट पर की गई है. ये स्टेटमेंट कहता है कि

“बातचीत का फोकस सुरक्षा, संरक्षण और अफगानिस्तान में फंसे भारतीय नागरिकों पर रहा. अफगानिस्तान के नागरिक खासतौर पर अल्पसंख्यकों के भारत आने का मुद्दा भी चर्चा में शामिल रहा. राजदूत दीपक मित्तल ने अफगानिस्तान की धरती के भारत के खिलाफ आतंकवाद या किसी दूसरे तरीके से इस्तेमाल होने को लेकर चिंता जताई. तालिबान प्रतिनिधि ने भरोसा दिलाया कि सभी मसलों पर सकारात्मक तरीके से देखा जाएगा.”

अफगानिस्तान में बने हालात को लेकर भारतीय विदेश सेवा के तीन अधिकारी लगातार प्रयास कर रहे हैं. इनमें पहला नाम दीपक मित्तल का है. दीपक मित्तल पिछले साल तक भारतीय विदेश मंत्रालय में (पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान मामलों के) जॉइंट सेक्रेटरी थे. अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रुद्रेंद्र टंडन भी दीपक मित्तल से पहले भारतीय विदेश मंत्रालय में (पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान मामलों के) जॉइंट सेक्रेटरी रहे हैं. इन दो अफसरों के अलावा बातचीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका विदेश मंत्रालय में (पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान मामलों के) वर्तमान जॉइंट सेक्रेटरी जेपी सिंह निभा रहे हैं.

दीपक मित्तल और जेपी सिंह ने 15 अगस्त से कुछ दिन पहले अफगानिस्तान के नेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला से दोहा में मुलाकात की थी. अब्दुल्ला वही शख्स हैं, जो फिलहाल अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा सरकार बनाए जाने की प्रक्रिया में चल रही बातचीत का हिस्सा हैं.

भारत से मीटिंग होने से पहले ही तालिबान ने भारत को लेकर सकारात्मक रुख दिखाने की बात कही थी. तालिबान के नेता स्टानेकजई ने भारत को इस उपमहाद्वीप के लिए बहुत जरूरी बताया था. उसने कहा था कि तालिबान भारत के साथ पहले की तरह सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और कारोबारी रिश्ते चाहता है. साल 1996 में स्टानेकजई तालिबान की सरकार में उप विदेश मंत्री था, तब भी उसने ऐसा ही बयान दिया था. उस वक्त भारत ने उसके बयान का कोई जवाब नहीं दिया था. पिछले 2 हफ्तों में स्टानेकजई के अलावा तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन और जैबुल्लाह मुजाहिद ने भी भारत के साथ रिश्तों पर वक्तव्य दिए हैं.

तालिबान से बातचीत पर सवाल भी उठे

भारत ने जबसे तालिबान से बातचीत की है, भारत में राजनीतिक बयानबाज़ी भी हो रही है. शुरुआत से ही तालिबान के साथ बातचीत के हिमायती AIMIM के मुखिया असद्दुल्ला ओवैसी ने सरकार पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि

‘सरकार क्यों शरमा रही है? पास आते भी नहीं, चिलमन से हटते भी नहीं, पर्दे से झांक-झांककर मोहब्बत क्यों? खुलकर बोलिए न… देश की सुरक्षा के मामले में सरकार को जवाब देना पड़ेगा.’

इससे पहले ओवैसी ने कहा था कि

“मोदी सरकार की तालिबान पर क्या पोजीशन है, उसे साफ करे. क्या वो (तालिबान) आतंकवादी हैं या नहीं? अगर तालिबान को आतंकवादी की लिस्ट में रखा गया है तो क्या उसे UAPA की लिस्ट में शामिल किया जाएगा?”

जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भी भारत सरकार के तालिबान से बातचीत को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि

“तालिबान एक आतंकी संगठन है या नहीं, सबसे पहले हमें ये बता दें. अगर वो आतंकी संगठन हैं तो हम उनसे बात क्यों कर रहे हैं? अगर वो आतंकी संगठन नहीं हैं तो क्या केंद्र सरकार यूनाइटेड नेशंस में जाकर तालिबान को आतंकी संगठनों की लिस्ट से बाहर करवाएगी? मन बना लीजिए.”

इसके अलावा शिवसेना की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी दोहा में भारत और तालिबान के बीच बातचीत पर सवाल करते हुए ट्वीट किया था. उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार टीवी डिबेट में तालिबान के नाम से देश में जहर घोल रही है और दूसरी तरफ उनसे दोस्ती कर रही है.


वीडियो – दुनियादारी: सरकार बनाने से पहले तालिबान के सामने सबसे बड़ी चुनौती आना अभी बाकी है!

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