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'मैं मार्क्वेज़ के किसी उपन्यास में क़ैद हूं'

एक कविता रोज़ में आज पढ़िये अपर्णा 'अनेकवर्णा' की 7 कविताएं

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फोटो - thelallantop
पिछले पांच-छः वर्षों से ब्लॉगिंग सोशल मीडिया एवं अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स में अपर्णा श्रीवास्तव 'अनेकवर्णा' की कविताएं खूब सराही जाती रही हैं. हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में लिखती और अनुवाद करती हैं. इन दिनों इनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, संग्रहों और साहित्यिक ब्लॉगों में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं. होने को तो एक कविता रोज़ में रस्म है कि हम आपको 'एक' कविता रोज़ पढ़वाते हैं. लेकिन लेखिका का नाम 'अनेकवर्णा' है, यानी कई रंग, रंगों का पूरा स्पेक्ट्रम. तो इसलिए ही आज आपको इनकी सात कविताएं पढ़वा रहे हैं.
# 1) शमशान-वैराग्य
आलता-लाल एक जोड़ी घिसे पांव निकल पड़े हैं आदिम दिशा को कर आई विदा जिन्हें बस कल ही वो पलटे नहीं न ठिठके न ही बदली दिशा अपनी पुकारता रहा आकाश बरसता रहा जल खूब धधकी अग्नि चंदन पहने डोलती रही पवन धरती ने फिर किया वहन एक और वियोग का भार अपने आदिम धैर्य से संकोच ने रुंधन को जड़ दिया था ग्रंथियों में ही दुबकी रही वह महानगर की थमी विथिकाओं से उभरी संवेदना जुटी और फिर वहीं लौट गईं असहाय सी एक दूसरे से आंखें चुराए लौटती मेरी देह से झूलता रहा चिरायंध चटकता रहा कानों में बंधनों का खुलते जाना मन में बिखरा रहा कुछ देर शमशान-वैराग्य फिर कपूर सा उड़ गया बस एक चिन्ह से स्मृति में रुके हुए हैं आलता से लाल एक जोड़ी घिसे पांव.
# 2) उमस
फ़्रीडा की चिर रोगशय्या और फीतों वाली कसी पोशाक के बीच कहीं से उसके पकते-सूखते घावों और आइने से चित्रों के रास्ते वर्षावनों के किसी प्रौढ़ बारहसिंगे सी ठिठक ठिठक कर बढ़ती आती है उमस मीज़ो बांसवनों के उष्ण-कटिबंधीयता में उभरती बज उठती है रह-रहकर झींगुर की तमाम पीढ़ीयों में उनके गुणसूत्रों में पिरोई कड़ियां बनकर हुगली-जल पर बहती, डूबती, उतराती उमड़ आती है घाट की सीढ़ियों पर कालीपद के जवा पुष्प सरका कर, तनिक सुस्ताती है दर्शन को आई नववधु का सिंदूर पसीज कर नाक की नोंक तक जा बहता है सबसे लाल जवा-पुष्प वही है भाप के नख से कुरेदती है लाल माटी, संथाल वनांतर की पुचकार पुकारती है बीज में सोए शिशु वनों को हंड़िया, महुआ, सघा-साकवा, बांसुरी, मांदर के तिलिस्म के बीच हुलसती है ममत्व से, छलक जाती है हमने भी तो बालों में, सीने पर और कान के पीछे पहन लिया है उसे गहनों की तरह उमस हमारी साधी हुई दूरियों में रेंगती है व्यक्त होने की कगार से लौट-लौट सर पटक कर केश बिखराए हारी-थकी, बीच में आ पसरती है.
# 3) आस-पास
ऊंघता हुआ पत्थर नदी के अंदर देखता है स्वप्न एक पतंगा है वो... उड़ने की ललक जाग जाती है... मछली पानी के सतह पर चमकते धूप के गुनगुने सिक्कों को बटोर लेती है सांसों में.. दो-एक हो फरार बनकर बुलबुले वापस सतह पर लौट जाते हैं.. पेड़ कहीं नहीं जाते पर उनके साए सारे दिन रेंगते हैं... खूंटी से बंधे-बंधे अपना आस-पास टटोलते रहते हैं... कछुवे की आंखों के खारे दुःख पी जाती हैं तितलियां... नशे में रंगीन हो जाती हैं... कछुवों का क्या है... यूं रीत कर वापिस अपने खोल में नए अवसाद रोप लेते हैं ड्रैगनफ्लाई की कंपाउंड आंखें ऐसा क्या दिखा देती हैं उसे वो तो एक धागा लिए आते नन्ही आहटें नहीं भांप पाता है अपने इन्द्रधनुषी परों को निहारता रहता होगा कमबख्त सत्तर के दशक की तमाम रातें और मेहंदी की फेंस एक पुल बंध जाता था हमारे कच्चे-सच्चे रूमान तक वहां हम जुगनू पकड़ 'ग्राइप-वाटर' की खाली बोतलों में एक ठंडी सफ़ेद रौशनी बटोरते थे ढक्कनों में ज़रूर होती थीं उम्मीद भरी सुराखें.
# 4) मधुमेह
सुना उसने तो उसने कहा 'लगता है मिठास बढ़ गयी है' मैंने कहा 'हां, जो बाद में मुंह कड़वा कर देती है.' दिन अब नए सलीके से बंटता है छः कतरे हुए छोटे भाग हैं भोजन के तीन जून की रोटी' अब बीती हुई बात है पार्क के गिर्द घूमते-घूमते फिर से मिलते हैं पग त्वरा से देह लय से रोम स्वेद से सांस हवा और हवा सांस से स्मृति नीम-मंजरी से पंडुकी, धनेश से... चैत मास से मैं खुद से और मन भारहीनता से... इंजेक्शन की सुई भेदती है नस खींच ले जाती थोड़ा सा खून छोड़ जाती है थोडा अवसाद मुझमें थोड़ी आशंका पति में थोड़ी तरस कम्पाउण्डर की आंखों में.
# 5) इन दिनों
नहीं पीती सिगरेट तब भी पैसिव स्मोकिंग तो करवा ही देते हो सिगरेट तुम्हारी उंगलियों से उलझी सुलगती रहती है जलन से... मुंह... कम ही लगती है इन दिनों.. 'लिजलिजे' शब्द वर्जित हैं हमारे संवाद में जो अक्सर एकतरफा होते हैं... मैं इस डर से 'गैर-लिजलिजा' बोलती रहती हूं कहीं बीच का चुप इतना लम्बा न हो जाए कि उसे भरने से पहले ये सोचने लगूं,'इज़ इट वर्थ इट?' मुझे पढ़ते रहना है तुम्हारे मौन में तुम्हारे अनकहे में तुम्हारे 'सहज' में अपने लिए भीना सा कुछ सुकोमल... तुम कुछ कह भी दो तो दूसरे ही पल 'व्यक्त' की ग्लानि से भर उठते हो मैं बीतते जाने के भय से कितने सावधानी से 'पसेसिव' होते हो कहीं मुझे पता न चले और मैं... अपनी पुलक छुपाये चुपके से 'टच-वुड' करती हूं.
# 6) एक बार फिर
उफ़ उमस इतनी कि सांसें गाढ़ी हो गई कितनी लगता है पैरों से जड़ें और बाहों से शाखाएं फूट पड़ेंगी अभी कि बस नमक ही देह का सत्य है कि सारा आस-पास वाष्प ही रहा सदा से कि मैं मार्क्वेज़ के किसी उपन्यास में क़ैद हूं जिसके कवर पर जड़ी हैं मेरी दो आकुल तश्तरी-आंखें और भीतरी पन्नों में कंपन है मैना की धौंकनी-कंठ की.
# 7) गिरना
गिरना गिरने से बहुत पहले शुरु हो जाता है जब जड़ें छोड़ने लगती हैं मिट्टी का हाथ खोने लगती हैं भरोसा धरती पर.
एक कविता रोज़ के अन्य संस्करण भी पढ़ें: 'इस तरह भूल जाएं बीते साल भर की मुश्किलें' 'मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं' 'बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं' 'किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समंदर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है?' 'पंच बना बैठा है घर में फूट डालने वाला' 'सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना और सादा पानी पीना...' 'बंधे हों हाथ और पांव तो 'आकाश' हो जाती है उड़ने की ताक़त' 'अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगा' 'तीन आलू सरककर गिर गए हैं किसी के' 'मेरे लिए दिल्ली छोड़ने के टिकट का चन्दा इकट्ठा करें' 'दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है'

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'कुछ बन जाते हैं':

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