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जो बांग्लादेश भारत को हिल्सा मछली पहुंचाता है, वो इसे गुजरात से क्यों मंगा रहा?

बांग्लादेश की पद्मा की इलिश आज भी अपनी पहचान और premium value के लिए मशहूर है। लेकिन गुजरात की नर्मदा से निकलकर बांग्लादेश पहुंचने वाली हिल्सा एक अलग कहानी बता रही है. मछली के कारोबार में स्वाद के साथ-साथ कीमत, supply और demand भी सीमा पार के रिश्ते तय करती है.

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बांग्लादेश में भारत के गुजरात की हिल्सा भेजी जा रही है (COURTSEY- India Today File

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  • भारत के गुजरात राज्य से पहली बार बांग्लादेश के लिए इलिश मछलियाँ आयात की जा रही हैं, जिसमें 2026 के पहले साढ़े नौ महीनों में लगभग 427 टन मछलियों का व्यापार हुआ।
  • बांग्लादेश में इलिश मछली का उत्पादन 2022 से घटकर 2025 में पाँच लाख टन के करीब आ गया है, जिससे वहां की घरेलू मांग पूरी नहीं हो पा रही है।
  • गुजरात की इलिश मछलियाँ बांग्लादेश में सस्ती होने के कारण खरीदी जा रही हैं, जबकि पद्मा नदी की इलिश अधिक महंगी होने के कारण स्थानीय बाजारों में इसकी मांग सीमित है।

बांग्लादेश अपने लिए भारत से मछली खरीद रहा है. ये बात सुनने में सामान्य लगती है क्योंकि एक देश दूसरे देश से प्रोडक्ट्स तो इम्पोर्ट करते ही हैं. इसमें नया क्या है? पर बांग्लादेश खुद मछलियों का बहुत बड़ा प्रोड्यूसर है और बांग्लादेश की पद्मा नदी में मिलने वाली हिल्सा मछली अपने स्वाद के लिए काफी फेमस है. कोलकाता में ये करीब 2 हजार से 3 हजार रुपये किलो बिकती है लेकिन इसके बावजूद बांग्लादेश अपने लिए भारत के गुजरात से हिल्सा मंगा रहा है. इसकी वजह क्या है? बांग्लादेश कितनी मछलियों का उत्पादन करता है? भारत में बांग्लादेश की किन मछलियों को पसंद किया जाता है? एक-एक कर के समझते हैं. 

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क्यों खास है हिल्सा यानी ‘इलिश की रानी’

'पद्मा की इलिश' यानी हिल्सा मछली को बहुत खास माना जाता है. इसे बंगाल में 'इलिश की रानी' तक कहा जाता है. इंडिया टुडे ने हावड़ा के एक कारोबारी पल्लब करार के हवाले से बताया कि जब पद्मा की इलिश कोलकाता के बाजारों में पहुंचती है तो इसे लेकर अलग ही उत्साह होता है. मछली बेचने वाले भी इसे बाकी मछलियों से अलग और बहुत संभालकर रखते हैं. वो इसे हरे प्लास्टिक के थैले में लपेटकर रखते हैं. ताकि ये बाकी मछलियों से अलग रहे. पद्मा की इलिश करीब 3 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकती है. इलिश बंगाली खाना और संस्कृति का बेहद खास हिस्सा है. 

इसकी खासियत ये है कि ये समुद्र के खारे पानी में रहती है, लेकिन अंडे देने के लिए मीठे पानी की नदियों में आती है. इलिश का स्वाद उसके पानी और जगह के हिसाब से बदलता है. इसका मांस नरम होता है और इसकी खुशबू भी काफी खास होती है. इसलिए बंगालियों के बीच इलिश को सिर्फ मछली नहीं, बल्कि संस्कृति और भावनाओं से जुड़ी मछली माना जाता है. इन सारी बातों से ये तो क्लैरिटी मिल जाती है कि इलिश बंगाल में कितनी इम्पोर्टेन्ट है.

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बांग्लादेश से आ रहा ‘लिमिटेड स्टॉक’

इलिश मछली पूरे भारत में मिलती है. पश्चिम बंगाल से लेकर ओडिशा, आंध्र प्रदेश और गुजरात तक इसकी मौजूदगी है. बांग्लादेश इलिश का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर रहा है. वो लंबे समय से भारत को इलिश मछली का एक्सपोर्ट करता रहा है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में बांग्लादेश ने भारत को इलिश एक्सपोर्ट करने पर रोक लगाई थी. फिर साल 2019 में दुर्गा पूजा के समय करीब एक महीने के लिए एक्सपोर्ट की परमिशन दी लेकिन कारोबारियों का कहना था कि एक महीने का समय बहुत कम है, इसलिए जितनी मछली भेजने की परमिशन मिलती है, उतनी भारत नहीं आ पाती. 

उदाहरण के लिए साल 2024 में 2,420 टन इलिश भेजने की अनुमति मिली थी लेकिन तब सिर्फ 577 टन ही भारत पहुंची. वहीं 2025 में भी 1,200 टन की अनुमति मिली, लेकिन सिर्फ 150 टन इलिश आई. हालत जो भी हो, बांग्लादेश भारत को इलिश मछली भेजता ही था. मंगाता नहीं था. 

मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि ये पहली बार हुआ है कि भारत के गुजरात राज्य से मछलियां बांग्लादेश जा रही हैं. अगर आंकड़े देखें तो साल 2026 के पहले साढ़े 9 महीनों में भारत से बांग्लादेश में करीब 4 लाख 27 हजार किलो यानी 427 टन इलिश भेजी गई. इसमें बड़ी मात्रा में गुजरात के भरूच में नर्मदा नदी से पकड़ी गई मछलियां थीं. बांग्लादेश के कारोबारियों ने इलिश कम से कम 57 टका (बांग्लादेश की करेंसी) में प्रति किलो की कीमत पर खरीदी. भारतीय करेंसी में देखें तो ये करीब 44-45 रुपये के आसपास होता है.

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गुजरात की मछलियां बांग्लादेश क्यों पहुंच रही?

भारत से मछलियां बांग्लादेश जाने के कई कारण है. पहला कारण है बांग्लादेश में इलिश का प्रोडक्शन कम होना. दरअसल बांग्लादेश दुनिया में सबसे ज्यादा इलिश पकड़ने वाले देशों में है, लेकिन पिछले कुछ सालों से वहां इलिश का प्रोडक्शन कम हो रहा है. साल 2022 में करीब 5 लाख 71 हजार टन इलिश का प्रोडक्शन हुआ. 2025 में यह घटकर करीब 5 लाख टन रह गया. मतलब 3 साल के भीतर 71 हजार टन की प्रोडक्शन घटी.

दूसरा कारण है, इलिश की कीमत में बढ़ोतरी. अब प्रोडक्शन कम हुआ तो दाम भी अपने आप बढ़ गया. साल 2018 में इलिश करीब 705 टका प्रति किलो थी. अगस्त 2026 तक बढ़कर ये करीब 2,600 टका प्रति किलो तक पहुंच गई. मतलब 8 सालों में तीन गुना से भी ज्यादा दामों में बढ़ोतरी हुई है.

तीसरा कारण है, गुजरात की इलिश का सस्ता होना. गुजरात की इलिश बांग्लादेश में इसलिए बिक रही है क्योंकि ये पद्मा और मेघना की इलिश से काफी सस्ती है. जहां पद्मा और मेघना की इलिश 2,200–2,800 टका प्रति किलो तक बिकती है. वहीं गुजरात की इलिश 500–700 टका प्रति किलो की थोक कीमत पर पहुंचती है. खुदरा में ये करीब 1,500–1,800 टका तक बिकती है. मतलब 1,000 टका का अंतर आ रहा है. इसका मांस पतला होने के कारण पश्चिम बंगाल में इसकी मांग कम है, लेकिन बांग्लादेश में इसके अंडों से काफी फूड वेराइटीज बनाई जाती है.

नोट: 1 बांग्लादेशी टका = 0.78 भारतीय रुपये

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