लता मंगेशकर का गाया बड़ा मशहूर गाना है, “तू जहां जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा.” गाना अच्छा है, लेकिन हमेशा तो अपना ही साया साथ रहता है. हालांकि कुदरत का एक खेल ऐसा भी है जब जीते जी हमारी परछाई साथ नहीं रहती. और ऐसा साल में दो बार हो सकता है. कर्नाटक के बेंगलुरु में आज ऐसा हुआ है. वहां लोगों को अपनी परछाई, अपना साया नहीं दिख रहा. विज्ञान की भाषा में इस दिन को जीरो शैडो डे (Zero Shadow Day) कहा जाता है. इस दिन आपकी परछाई जमीन पर नहीं पड़ती है.
क्या हो आप बाहर निकलें और अपनी परछाई दिखाई ना दे, आज कई लोगों के साथ ये हुआ है
साल में ऐसा दो बार होता है जब हमारी परछाई नहीं बनती.

ज़ीरो शैडो डे, हिंदी में बोलें तो शून्य छाया दिवस पर सूर्य कुछ वक्त के लिए किसी ऐंगल पर ना रहकर बिल्कुल सीधे, सिर के ऊपर रहता है. परछाई बनने के लिए सूरज का किसी ऐंगल पर रहना जरूरी होता है. अगर वो दाईं तरफ से चमक रहा है तो परछाई हमारी बाईं तरफ बनती है और अगर सूरज बाईं तरफ चमक रहा है तो हमें दाईं तरफ हमारा साया दिखाई देता है. वहीं सूरज के पीछे होने पर हमें आगे की तरफ हमारी परछाई साथ चलती दिखती है.
लेकिन जीरो शैडो डे के दिन सूरज ठीक ऊपर की तरफ होता है इसलिए किसी भी चीज की कोई परछाई नहीं दिखती.
साल में ऐसा दो बार होता है जब सूरज तो होता है, लेकिन हमारी या किसी भी चीज की परछाई नहीं बनती. भूमध्य रेखा के नजदीक पड़ने वाले इलाकों में ये नजारा देखने को मिलता है. एक बार उत्तर की तरफ. एक बार दक्षिण की तरफ. इस पर गौर करने के लिए कुछ सेकंड्स से लेकर दो मिनट तक का ही समय होता है.
भूमध्य रेखा पृथ्वी को दो हिस्सों में बांटती है. ये कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच पड़ती है. और भारत कर्क रेखा वाला क्षेत्र है. इसीलिए यहां शून्य छाया की घटना देखने को मिलती है. बेंगलुरु में आज यही हुआ है.
तो क्या देश की राजधानी दिल्ली में भी ऐसा होता है? जवाब है, नहीं. क्योंकि, दिल्ली की लोकेशन कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच नहीं है. दिल्ली ‘बियॉन्ड ट्रॉपिक्स’ पड़ता है. इसे सब-ट्रॉपिकल लोकेशन भी कहते हैं.
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