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क्या बढ़िया फ्रिज न होने के कारण इंडिया में कोरोना वैक्सीन लगने में और लेट हो सकती है?

दुनिया के दो देश हैं जो वैक्सीन के खेल में सबसे आगे चल रहे हैं. एक है यूके तो दूसरा है अमेरिका. यूके में तो लोगों को वैक्सीन लगनी शुरू भी हो गयी और अमेरिका में वैक्सीनेशन शुरू होने वाला है. और वैक्सीन लग सकती हैं दो. एक है फ़ाइज़र वाली वैक्सीन और मॉडर्ना की वैक्सीन. लेकिन फ़ाइज़र की वैक्सीन को इंडिया में लाने में बहुत दिक़्क़त है. क्या दिक़्क़त है? दिक़्क़त है कोल्ड चेन. अब बहुत-से लोग आजकल कोल्ड चेन का नाम ले रहे हैं, तो हमने सोचा कि इस कोल्ड चेन को समझा जाए.

कोल्ड चेन क्या है?

जब किसी चीज़ को ठंडे माध्यम में ट्रांसपोर्ट किया जाता है, तो उसे कोल्ड चेन कहते हैं. ऐसे समझिए कि आइसक्रीम बनाने वाली फ़ैक्टरी से आइसक्रीम की दुकानों तक या डेयरी प्लांट से डेयरी शॉप तक जैसे सामान लाया ले जाया जाता है, वो कोल्ड चेन का तरीक़ा है.

वैक्सीन के संदर्भ में समझिए. पोलियो की वैक्सीन हो या रेबीज़ की वैक्सीन को लीजिए. जब दुकान पर आप रेबीज की वैक्सीन मांगेंगे तो दुकानदार आपको वैक्सीन फ़्रीज़र से निकालकर देता है. टिटेनस का इंजेक्शन भी फ़्रीज़र से निकालकर दिया जाता है. पोलियो की वैक्सीन भी बड़े से थर्माकोल के डिब्बे या आइसबॉक्स में रखी होती है. 

वैक्सीन ख़राब न हो इसके लिए उसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखा जाता है. और इसी तापमान पर इसे ट्रांसपोर्ट किया जाता है.तो कारख़ानों में ठंडे कमरों में निर्माण के बाद इन वैक्सीन को कोल्ड ट्रक में रखा जाता है. मतलब ऐसा ट्रक जो भीतर से बहुत ठंडा होता है. वहां से वैक्सीन को स्थानीय स्टोरेज या डीलर के पास पहुंचा दिया जाता है. स्टोरेज और डीलर के यहां भी इस शर्त पर कि वो इसे 2 से 8 डिग्री के तापमान पर ही रखेंगे, और इसी तापमान पर आगे बढ़ाएंगे. 

अब डीलर या स्टोरेज से वैक्सीनेशन केंद्रों तक वैक्सीन को ले जाने के लिए बड़े आइस बॉक्स का इस्तेमाल किया जाता है. और अस्पतालों और वैक्सीनेशन सेंटर में इन्हें फ़्रीज़र में ही रखा जाता है.

यानी बनने की प्रक्रिया से लेकर किसी व्यक्ति को वैक्सीन लगने तक उसे कोल्ड स्टोरेज में रखने की एक चेन बनाई जाती है. ताकि वो सुरक्षित रहे. इसी को कोल्ड चेन कहते हैं.

लफड़ा क्या है?

अब कोरोना पर आते हैं. दवा कम्पनी फ़ाइज़र ने ये तो दावा कर दिया है कि उनकी वैक्सीन कारगर है. लेकिन साथ में एक पुछल्ला जोड़ दिया है. कहा है कि उनकी वैक्सीन को रख-रखाव के लिए ज़ीरो से 70 डिग्री सेल्सियस नीचे का तापमान चाहिए.माने -70 डिग्री. 

मतलब दुनिया भर का वैक्सीनेशन नेटवर्क ज़ीरो से ऊपर 2 से 8 डिग्री तापमान के लिए तैयार था, लेकिन बात माइनस 70 डिग्री की आ गई. ट्रांसपोर्ट की भाषा में कहें तो इस वैक्सीन को लाने-ले जाने के लिए कोल्ड चेन की नहीं, कोल्डर चेन की ज़रूरत पड़ेगी. मतलब और भी ठंडे ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की. यूके और अमेरिका में तो ये कोल्डर चेन विकसित किया जा चुका है. लेकिन भारत में क्या होगा?

जानकार मानते है कि भारत में फ़ाइज़र की वैक्सीन के लिए ये कोल्डर चेन बनाना कठिन काम है. दूरदराज़ और पहाड़ियों-जंगलों के बीच बसे गांवों में वैक्सीन ले जाते समय तापमान बढ़ने का ख़तरा है, और इस तापमान बढ़ने से वैक्सीन के ख़राब हो जाने का ख़तरा है.

तो भारत में क्या होगा?

जवाब है कि वैक्सीनेशन होगा. लेकिन ज़रूरी नहीं फ़ाइज़र या मॉडर्ना की वैक्सीन ही वैक्सीन है. ऑक्सफर्ड की बनाई गई वैक्सीन या दूसरी वैक्सीन जिन्हें इस कोल्डर चेन की ज़रूरत नहीं हैं, वो वैक्सीन भारत के लिए बेहतर विकल्प हैं. ICMR के पूर्व प्रमुख डॉ. रमन गंगाखेडकर ने इंडिया टुडे को दिए अपने हालिया इंटरव्यू में कहा था, 

“भारत के लिए वही वैक्सीन सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं, जिनका भारत में पहले से निर्माण चल रहा है.”

ग़ौरतलब है कि भारत बायोटेक अपनी वैक्सीन और सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया ऑक्सफर्ड की वैक्सीन का पहले से निर्माण कर रहे हैं. और कहा जा रहा है कि इन वैक्सीन के रखरखाव और ट्रांसपोर्ट के लिए भारत में पहले से विकसित कोल्ड चेन ही काफी होगा.


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