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नदी में कोरोना पीड़ितों के शव बहाने से क्या पानी संक्रमित हो जाता है?

बिहार के बक्सर में गंगा नदी में काफी संख्या में लाशों के मिलने के बाद अब यूपी के गाजीपुर और बलिया में भी नदी में शव दिखाई दिए हैं. बलिया में गंगा से 46 शवों को बाहर निकाला गया है. इससे पहले गाजीपुर में गंगा नदी में शव दिखाई दिए थे. गाजीपुर के जिलाधिकारी ने कहा कि इस बात की जांच की जा रही है कि शव कहां से बहकर आए हैं. बलिया और गाजीपुर के बाद गंगा बिहार के बक्सर पहुंचती है. यहां जब शव बहकर आए थे तब बिहार के अधिकारियों ने कहा था कि शायद यह शव यूपी से बहकर आए हैं.

बलिया और गाजीपुर में बहते मिले शव

गाजीपुर से होती हुई गंगा नदी बलिया पहुंचती है और वहां से बक्सर पहुंचती है. बिहार में ही गंगा नदी में घाघरा नदी भी मिल जाती है. बक्सर में 10 मई को करीब 40 लाशें बहती हुई दिखाई दीं. हालांकि ग्रामीणों ने इससे अधिक लाशें देखने का दावा किया था. बक्सर के डीएम अमन समीर ने कहा कि लाशें गंगा में पीछे से बहती हुई आई हैं. हालांकि इसकी जांच भी कराई जाएगी.

वहीं NDTV और BBC की रिपोर्ट के मुताबिक बक्सर में 71 लाशों का पोस्टमार्टम कराया गया है. बक्सर में लाशें बहती मिलने से अधिकारी और ग्रामीण सभी हैरान परेशान थे. 11 मई को गाजीपुर और बलिया में भी लाशें गंगा नदी में बहती हुई मिलीं. हिंदुस्तान अखबार की एक रिपोर्ट कहती है कि बलिया में प्रशासन ने करीब 46 शवों को नदी से बाहर निकलवाया और जेसीबी से खुदाई कराकर सभी शवों को दबा दिया.

यूपी के हमीरपुर से होकर बहने वाली यमुना नदी में भी शव बहते मिले थे.

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जेसीबी से खुदाई कराकर शवों को दफना दिया गया है. फोटो- आजतक

क्यों बहाए जा रहे हैं शव?

एक बड़ा सवाल ये है कि आखिर शवों को क्यों बहाया जा रहा है? काफी लोगों का मानना है कि लकड़ी के अधिक दामों के कारण ग्रामीण लोग ऐसा कर रहे हैं. आजतक से जुड़े रौशन जायसवाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक वाराणसी और आसपास के इलाकों में शवों को जल में प्रवाहित करने की परंपरा नहीं रही है. ऐसे लोग जिनकी इच्छा गंगा में प्रवाहित कराए जाने की रही है या फिर किसी को सांप ने काट लिया हो, ऐसे लोगों को ही गंगा में प्रवाहित किया जाता है. श्मशानों में लकड़ी के रेट भी नहीं बढ़ाए गए हैं जिससे ये माना जाए कि महंगे अंतिम संस्कार के कारण शवों को गंगा में प्रवाहित किया जा रहा है.

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गांव के लोग गंगा नदी के किनारे शवों को दफना भी रहे हैं. फोटो-आजतक 

हालांकि दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट कहती है कि कानपुर और उन्नाव में 1 हजार से अधिक लोगों को अभी तक गंगा नदी के किनारे दफन किया जा चुका है. लकड़ियों से अंतिम संस्कार करने से दफन करना सस्ता पड़ता है. साथ ही इतनी लाशें जली हैं कि लकड़ियां खत्म हो चुकी हैं. ऐसे में लोग हिंदू परंपरा को छोड़ते हुए शवों को मजबूरी में दफन कर रहे हैं. लाशों पर नमक भी डाला जा रहा है ताकि जल्द ही वह डिकंपोज हो जाएं. रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि गंगा में जलस्तर बढ़ा तो लाशें आगे बह सकती हैं.

बुन्देलखण्ड के आचार्य पंडित रमेश शास्त्री ने हमीरपुर में आजतक के साथ बात करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में जल प्रवाह, अग्निदाह और भूमिदाह के जरिए अंतिम संस्कार की परंपरा है लेकिन टीबी रोगी, कुष्ठ रोगी और कोरोना रोगियों के शवों को पानी में नहीं बहाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से पानी संक्रमित होता है, पानी को पीने वाले लोग संक्रमित होते हैं और पानी में रहने वाले जीवों पर भी इसका असर पड़ता है.

पानी के जरिए फैल सकता है कोरोना?

काफी लोगों का मानना है कि गांवों में कोरोना फैल चुका है. लगातार लोगों की मौत हो रही है. संख्या इतनी अधिक है कि सभी का अंतिम संस्कार मुमकिन नहीं है इसलिए शवों को गंगा में प्रवाहित किया जा रहा है. लेकिन क्या ऐसा करने से पानी संक्रमित होता है?

इस सवाल के जवाब में ICMR के चेयरमैन डॉक्टर बलराम भार्गव कहते हैं कि वायरस को पनपने के लिए मानव शरीर की जरूरत होती है और अगर मानव शरीर मृत है तो उसमें वायरस के पनपने की गुंजाइश नहीं है, लेकिन फिर भी सतर्क रहने और सजग रहने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वायरस को होस्ट नहीं मिलेगा तो वायरस आगे फैल नहीं पाएगा.

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प्रशासन के लोग अब इस मामले में जांच कर रहे हैं. फोटो-आजतक

आजतक के साथ बात करते हुए भारत सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार डॉक्टर विजय राघवन ने कहा था कि बहते हुए पानी में लाश से खतरा नहीं है, लेकिन तालाब या कुएं के पानी में शव के होने से जरूर खतरा हो सकता है. गंगा या किसी अन्य नदी में लाशों का होना चिंताजनक जरूर है लेकिन बहुत अधिक डरने की बात नहीं है.

एक पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि, संक्रमण ना भी फैले लेकिन मृत शरीरों के कारण पानी तो दूषित हो ही जाता है. दूसरी बात ये कि बहते पानी में संक्रमण शायद ना हो लेकिन अगर नदी के उस हिस्से में बहाव नहीं है तो प्रशासन को तुरंत ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है.

आपको बता दें कि कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है और इसी वजह से कोरोना मरीजों के शवों को लेकर एक प्रोटोकॉल है. उसी के हिसाब से दुनिया भर में कोरोना पीड़ितों के शवों को पीपीई आदि में पैक किया जाता है. सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में इस प्रोटोकॉल का पालन करते हुए ही शव को परिवार को सौंपा जाता है और अंतिम संस्कार के वक्त भी परिवार के लोग पीपीई किट आदि पहनते हैं.

दिल्ली के पंडित मदन मोहन मालवीय अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर, डॉक्टर मणि शंकर प्रियदर्शी बताते हैं कि हम लोग कोविड पेशेंट के शव को इन्फेक्टेड मानते हैं और परिजनों को उससे दूर ही रखते हैं. बेहद सावधानी के साथ शव को पैक किया जाता है और दो अटेंडेंट भेजे जाते हैं जो शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाते हैं. साथ में 2 पीपीई किट भेजी जाती हैं ताकि परिजन अंतिम संस्कार के वक्त उन्हें पहन सकें. शव के संपर्क में आने से कोविड संक्रमण संभव है लेकिन पानी में डूबे शव के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन ये तो तय है कि पानी दूषित हो जाता है. कोविड ना भी हो तो भी पानी तो दूषित होगा ही.


 

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