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कॉन्ट्रैक्ट पर 5 साल सरकारी नौकरी कराने के योगी सरकार के प्लान को लगा झटका, जानिए मामला

यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने ऐसा प्रस्ताव लाने का ऐलान किया है, जिससे सरकारी नौकरियों का पूरा सिस्टम ही बदल जाएगा! योगी आदित्यनाथ ने संविदा यानी कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम से सरकारी नौकरी देने की बात की है. योगी के इस फॉर्मूले का विरोध नौकरी की तलाश में भटक रहे नौजवान और समाजवादी पार्टी व कांग्रेस जैसे विपक्षी दल तो कर ही रहे हैं. अब बीजेपी के लोग भी मैदान में आ गए हैं. आइए जानते हैं, क्या है पूरा मामला

बीजेपी के भीतर से उठी विरोध की आवाज

नए प्रस्तावित सिस्टम को लेकर बीजेपी के भीतर नाराजगी के सुर सुनाई देने लगे हैं. बीजेपी के एमएलसी देवेंद्र प्रताप ने समूह ‘ख’ और समूह ‘ग’ को लेकर नियमावली में बदलाव करने के प्रस्ताव पर सरकार को चिट्ठी लिखी है. उन्होंने लिखा कि इस तरह सेवा नियमावली में बदलाव न किया जाए. अगर ऐसा हुआ तो सरकारी नौकरी में आने वालों का शोषण और कदाचार बढ़ेगा. कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाने के नाम पर उगाही शुरू हो जाएगी.

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सत्ताधारी पार्टी के एमएलसी ने ही संविदा सिस्टम के तहत नौकरी सिस्टम पर सवाल उठा दिए हैं.

क्या है सरकारी नौकरी में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम?

प्रस्ताव है कि उत्तर प्रदेश में ग्रुप ‘बी’ और ‘सी’ की नौकरियों के लिए अब संविदा पर भर्ती की जाए. यानी भर्ती निकाली जाएगी. लोगों का सेलेक्शन होगा. फिर पांच साल के कॉन्ट्रैक्ट पर काम कराया जाएगा. इन पांच साल में हर छह महीने पर एक टेस्ट लिया जाएगा, जिसमें कम से कम 60 फीसद अंक पाना अनिवार्य होगा. दो छमाही में इससे कम नंबर लाने वाले लोगों को सेवा से बाहर कर दिया जाएगा. अमर उजाला की खबर के मुताबिक, पांच साल की संविदा के दौरान किए गए काम को Measurable Key Performance Indicator यानी MKPI के पैमाने पर मापा जाएगा. सरकार MKPI फॉर्मूला भी तय कर रही है. पांचवें साल छह महीने की ट्रेनिंग दी जाएगी.

कहा जा रहा है कि संविदा पर नियुक्ति के दौरान मूल पदनाम के बजाय सहायक पदनाम दिया जाएगा. जैसे शिक्षक के लिए सहायक शिक्षक. संविदा पर नियुक्ति के दौरान यूपी सरकारी सेवक अनुशासन एवं अपील नियमावली 1999 भी लागू नहीं होगी. इस दौरान सरकारी नौकरी जैसा कोई सर्विस बेनिफिट नहीं दिया जाएगा. जो लोग 5 साल की संविदा नियुक्ति पूरी कर लेंगे, उन्हें परमानेंट कर दिया जाएगा. नई व्यवस्था को लागू करने के पीछे सरकार का तर्क ये है कि इससे कर्मचारियों की कार्य-क्षमता बढ़ेगी और सरकार पर आर्थिक बोझ भी कम होगा.

अभी क्या व्यवस्था है?

अभी अलग-अलग संवर्ग की सेवा नियमावली के अनुसार, सलेक्ट हुए लोग एक से दो साल के प्रोबेशन पर सीनियर अधिकारियों की निगरानी में काम करते हैं. इस दौरान उन्हें वेतन और दूसरे सभी सर्विस बेनिफिट दिए जाते हैं. प्रोबेशन पूरा होने पर इन कर्मचारियों को नियमित कर दिया जाता है. 1 अप्रैल 2019 को उत्तर प्रदेश में ग्रुप ‘बी’ के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों की संख्या 58,859 जबकि ग्रुप ‘सी’ के तहत कर्मचारियों की संख्या 8 लाख 17 हजार 613 बताई गई थी.

विपक्ष का क्या कहना है?

पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इसे सरकारी नौकरियों में ठेका प्रथा की शुरुआत बता चुके हैं. उन्होंने कहा है-

युवाओं के प्रति तो भाजपा का रवैया शुरू से ही संवेदना शून्य रहा है. भाजपा की गलत नीतियों के चलते प्रदेश पिछड़ता ही जा रहा है. परेशान हाल नौजवान आत्महत्या कर रहे हैं. समूह ख और ग की भर्ती प्रक्रिया में बदलाव किया जा रहा है, जिससे सरकारी नौकरियों में भी ठेका प्रथा लागू हो जाएगी.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी इस प्रस्ताव की जोरदार मुखालफत की है. उन्होंने कहा-

वाह री सरकार पहले तो नौकरी ही नहीं दोगे। जिसको मिलेगी उसको 30-35 से पहले नहीं मिलेगी। फिर उस पर 5 साल अपमान वाली संविदा की बंधुआ मजदूरी। और अब कई जगहों पर 50 वर्ष पर ही रिटायर की योजना। युवा सब समझ चुका है। अपना हक मांगने वो सड़कों पर उतर चुका है।#राष्ट्रीय_बेरोजगार_दिवस pic.twitter.com/Gg8w70GzdM — Priyanka Gandhi Vadra (@priyankagandhi) September 16, 2020

गुजरात में क्या सिस्टम है?

प्रियंका गांधी ने गुजरात के जिस ‘फिक्स पे सिस्टम’ का जिक्र किया, उसके बारे में भी जान लेते हैं. वहां संविदा पर रखे गए कर्मचारियों की  तनख्वाह फिक्स रहती है. पांच साल या जितने भी समय के लिए कॉन्ट्रैक्ट होता है, उसी सैलरी पर काम करना होता है. इसकी शुरुआत हुई थी 1996 में. तब बालगुरु योजना के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षकों को मिलने वाला वेतन फिक्स किया गया था. 2006 में मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी फिक्स पे नीति लेकर आए. इसके तहत सिपाही, सब-इंस्पेक्टर, पटवारी, शिक्षक जैसे पदों के लिए भी फिक्स पे व्यवस्था कर दी गई. ज्यादातर पदों के लिए 2500 रुपए हर महीने और बाकी के लिए 4500 रुपए प्रति महीने मिलता था. पांच साल तक इसी तनख्वाह पर लोग काम करते. इस दौरान न तो कोई सरकारी लाभ मिलता, न ही उनकी सीनियॉरिटी गिनी जाती. 2011 में गुजरात हाई कोर्ट ने इस फिक्स पे सिस्टम को रद्द कर दिया. हाई कोर्ट ने आदेश में कहा कि ये सिस्टम न्यूनतम तनख्वाह के नियम का उल्लंघन करती है. हाई कोर्ट ने कर्मचारियों को समान वेतन देने का आदेश दिया.

युवाओं में बढ़ रहा गुस्सा

हमारे आसपास ऐसे छात्रों-युवाओं की एक बड़ी आबादी है, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी करती है. सालों-साल लगे रहते हैं. शिक्षक भर्ती से लेकर पुलिस और दूसरी भर्तियों की तैयारी करते हैं. कई बार भर्तियां आती हैं और लटक जाती हैं. हाल के दिनों में बेरोजगारी और अटकी हुई भर्तियों को पूरा कराने की मांगों को लेकर सोशल मीडिया पर माहौल खूब गर्म रहा. इलाहाबाद जैसे शहर, जो प्रतियोगी छात्रों के हब कहे जाते हैं, वहां सड़कों पर भी खूब प्रदर्शन हुए.

उत्तर प्रदेश में संविदा भर्ती के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों पर पुलिस ने लाठियां फटकारीं।

यूपी की बात करें तो 2016 की 12,460 शिक्षक भर्ती, 2016 की 32 हजार बीपीएड शिक्षक भर्ती, 2018 की 69 हजार शिक्षक भर्ती, 2018 की 41,520 सिपाही भर्ती जैसी तमाम भर्तियां हैं, जो कोर्ट में अटकी हुई हैं. कोरोना काल के दौरान इन भर्तियों में फंसे अभ्यर्थियों का गुस्सा सोशल मीडिया पर जमकर देखने को मिला. और इसी बीच यूपी सरकार ऐसा प्रस्ताव लेकर आ जाती है, जिसमें सरकारी नौकरी के रुतबे की उम्मीद ही खत्म हो जाती है. सरकार के इस फैसले के खिलाफ यूपी के अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं. आने वाले दिनों में ये और भी तेज हो सकते हैं.


रंगरूट. दी लल्लनटॉप की एक नई पहल. जहां पर बात होगी नौजवानों की. उनकी पढ़ाई-लिखाई और कॉलेज-यूनिवर्सिटी कैंपस से जुड़े मुद्दों की. हम बात करेंगे नौकरियों, प्लेसमेंट और करियर की. अगर आपके पास भी ऐसा कोई मुद्दा है तो उसे भेजिए हमारे पास. हमारा पता है YUVA.LALLANTOP@GMAIL.COM


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