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लॉकडाउन से बेरोजगार हुए मजदूर साइकिल से निकल पड़े 960 KM दूर अपने घर

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए सरकार ने 21 दिनों के लिए पूरी तरह से लॉकडाउन कर दिया है. इस लॉकडाउन से सैकड़ों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं. ये जहां हैं, वहीं फंस गए हैं. सरकारों की लाख अपील के बाद भी फैक्ट्री और दुकान मालिक मजदूरों को घर भेज रहे हैं. चंडीगढ़ में ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पास घर लौटने के लिए फिलहाल कोई साधन नहीं है क्योंकि ट्रेन और बस बंद हैं.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूर जब टैक्सी वालों तक पहुंचे तो उनसे गांव तक पहुंचाने के लिए प्रति व्यक्ति 4000 रुपये मांगे गए. इसके बाद मजदूरों के एक रास्ता खोजा. अपनी साइकिल और साइकिल रिक्शा से ही अपने गांव की ओर निकल पड़े. ये सभी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के सरदारगढ़ गांव के रहने वाले हैं. चंडीगढ़ से इनका गांव करीब 960 किलोमीटर है.

जो लोग चंडीगढ़ में रह गए उन्होंने इंडिया टुडे को बताया कि रास्ते में उन्हें ठगी का शिकार भी होना पड़ा है. तीन दिन में उन्हें सिर्फ दो बार खाना मिल पाया है. ये लोग मुजफ्फरनगर में फंस गए हैं. मुजफ्फरनगर में फंसे इन मजदूरों में पान-सिगरेट की दुकान चलाने वाले दिव्यांग सोनू पांडे जैसे लोग भी शामिल हैं. ये सभी 20 मजदूर चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में एक साथ काम करते थे, लेकिन चंडीगढ़ में अब सिर्फ 6 लोग रह गए हैं.

52 साल के राजेंद्र ग्रेजुएट हैं और चंडीगढ़ में रिक्शा चलाते हैं. राजेंद्र का रिक्शा एक हफ्ते से ठप है. ऐसे ही सुनील शुक्ला 40 साल के हैं. लॉकडाउन के बाद वह घर लौटना चाहते हैं लेकिन! 39 साल के अशोक कुमार भी वापस बलरामपुर लौटना चाहते हैं लेकिन टैक्सी वाले मुंह मांगा दाम बता रहे हैं. ऐसे में वह नहीं जा सकते. इंडिया टुडे से बात करते हुए अशोक ने कहा,

हम वापस अपने गांव जाना चाहते हैं. 21 दिन तक यहां पर कोई काम नहीं मिलने वाला है. टैक्सी वाले पहले 2000 रुपये सवारी मांग रहे थे और अब 4000 रुपये मांग रहे हैं. हमारे पास इतने पैसे नहीं है. प्रशासन को चाहिए कि हमारे जाने हमारे घर जाने की व्यवस्था करें.

इन मजदूरों के पास सिर्फ एक वक्त का राशन बचा है. चंडीगढ़ प्रशासन का दावा है कि शहर में खाने-पीने की सभी चीजें उपलब्ध है लेकिन दुकानें बंद हैं और लोगों को राशन नहीं मिल रहा. ऐसे में इन मजदूरों की दिक्कतें बढ़ गई है.


इनपुट: मंजीत सहगल | इंडिया टुडे


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