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सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना काल में अनाथ हुए बच्चों से जुड़ी इस जानकारी पर सरकारों को उलटा टांग दिया

NCPCR. यानी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के कोविड-19 से जुड़े आंकड़ों ने सरकारों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार 27 जुलाई को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए ये सवाल किया कि कोरोना काल के दौरान मार्च 2020 से लेकर जुलाई 2021 के बीच NCPCR द्वारा रिपोर्ट की गई अनाथ बच्चों की संख्या सरकार द्वारा घोषित संख्या से दस गुना ज्यादा कैसे है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि केंद्र सरकार ने 10 लाख रुपये की वित्तीय सहायता वाली स्कीमों को बढ़ाते हुए इसके लाभार्थी अनाथ बच्चों की संख्या 645 कर दी है, लेकिन NCPCR की रिपोर्ट कहती है कि मार्च 2020 से जुलाई 2021 के बीच 6855 बच्चे अनाथ हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है,

“हम योजनाओं को लागू करने की बात लगातार कहते रहे हैं. योजना की घोषणा होती है, लेकिन इससे बच्चों को फायदा भी होना चाहिए. हमारे पास बाल कल्याण केंद्र हैं, जिला बाल सुरक्षा अधिकारी हैं, लेकिन आंकड़े देखकर लगता है कि उन्हें इस संबंध में सहायता की जरूरत है.”

याचिकाकर्ता वकील ऐमिकस गौरव अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने सभी राज्यों को पत्र लिखकर 10 जुलाई तक डेटा मुहैया कराने की अपील की थी. उनसे मिली जानकारी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के वकील ने कहा कि बिहार को छोड़कर अन्य सभी राज्यों के अनाथ बच्चों के आंकड़ों में ज्यादा विसंगति नहीं है. इस पर कोर्ट ने गौरव अग्रवाल से कहा,

“आपने हरेक राज्य (के अनाथ बच्चों) की जो संख्या हमें दी है, उनमें से अधिकतर को CWC (चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी) के सामने पेश नहीं किया गया. कर्नाटक में 138 बच्चे अनाथ हुए हैं. और NCPCR का पोर्टल कहता है कि ऐसे बच्चों की संख्या 158 है. ये क्या है?”

क्या है मामला?

दरअसल कोविड-19 महामारी के दौरान अनाथ हुए बच्चों को लेकर एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई. ऐसे बच्चों को सरकार की आर्थिक सहायता से जुड़ी स्कीमों का लाभ मिलना है. लेकिन बच्चों की संख्या को लेकर विवाद है. सरकार कहती है कि मार्च 2020 से लेकर जुलाई 2021 के बीच 645 बच्चे अनाथ हुए. लेकिन NCPCR के पोर्टल के मुताबिक, इन बच्चों की संख्या 6855 है. मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान गौरव अग्रवाल ने NCPCR के हलफनामे का जिक्र किया. उन्होंने अदालत से कहा,

“ये उचित होगा अगर हम उन बच्चों पर ध्यान दें जिन्होंने अपने दोनों माता-पिता या रोजी-रोटी कमाने वाले पेरेंट को खोया है. ऐसे बच्चों की संख्या बहुत बड़ी है. राज्यों से मिले आंकड़े बताते हैं कि 23 जुलाई तक दोनों पेरेंट या किसी एक पेरेंट को खोने वाले बच्चों की संख्या 6855 है. ये बहुत बड़ी संख्या है.”

गौरव अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि सरकार सिर्फ उन अनाथ बच्चों को गिन रही है, जिनके दोनों माता-पिता कोविड-19 की वजह से मारे गए. इंडिया टुडे से जुड़ी अनीषा माथुर के मुताबिक, इस पर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस एल नागेश्वर राव ने कहा,

“यूनिसेफ के मुताबिक अनाथ बच्चों की एक अलग परिभाषा है. इसमें उस बच्चे को भी अनाथ बताया गया है, जिसके केवल पिता की भी मौत हो जाती है, क्योंकि वो परिवार के लिए कमाने वाला होता है.”

जस्टिस राव ने आगे कहा,

“23 जुलाई को सरकार ने अपने एक बयान में कहा कि देश में कुल अनाथ बच्चों की संख्या केवल 645 है. ये NCPCR के डेटा से दस गुना कम है. हमने आदेश दिया है कि अनाथ होने वाले सभी बच्चों की गिनती होनी चाहिए.”

Orphaned
(प्रतीकात्मक तस्वीर- पीटीआई)

अनाथ बच्चों की संख्या कम क्यों?

इसकी वजह बताते हुए गौरव अग्रवाल ने अदालत से कहा,

“ज्यादातर मामलों में होता ये है कि गांवों में कोविड टेस्ट होता नहीं या (पुष्टि के बिना ही) मृतक का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है या दफ्ना दिया जाता है.”

इस पर कोर्ट ने कहा,

“सरकार को आंकड़े साफ करने की जरूरत है. हम (अनाथ बच्चों से जुड़ी) योजनाओं की जानकारी देख रहे हैं. हमें लगता है कि आपकी बात सही है. दस लाख रुपये की वित्तीय मदद सिर्फ उन अनाथ बच्चों को मिल रही है, जिनके दोनों पेरेंट कोविड-19 से मारे गए. लेकिन सरकार को कोरोना काल के दौरान अनाथ हुए सभी बच्चों का ख्याल रखना होगा.”

आजतक से जुड़े संजय शर्मा के मुताबिक, कोर्ट की टिप्पणियों के बाद ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि वे अनाथ बच्चों की संख्या में दिख रहे अंतर को लेकर सरकार और आयोग से बात कर निर्देश लेंगी और अदालत को सूचित करेंगी.

राज्य सरकारों को लगाई फटकार

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों को फटकार भी लगाई, जिन्होंने कोविड-19 महामारी के कारण अनाथ हुए बच्चों की जानकारी अभी तक ‘बाल स्वराज’ पोर्टल पर अपलोड नहीं की है. इनमें जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य शामिल रहे. इस बारे में जब पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने कहा कि अनाथ बच्चों की करेक्ट संख्या NCPCR को भेज दी गई है तो शीर्ष अदालत ने कहा,

“तो आप ये कह रहे हैं कि पूरे राज्य में केवल 27 बच्चे अनाथ हुए हैं? क्या ये आंकड़ा सही है? आप बाकी राज्यों के आंकड़े देखिए. ऐसा नहीं लगता कि आपके राज्य में कोविड-19 थी ही नहीं. हम इन आंकड़ों पर यकीन करने के लिए तैयार नहीं हैं. पता नहीं राज्यों को कैसे समझ नहीं आता कि क्या करने की जरूरत है.”

बंगाल सरकार के वकील ने ये भी कहा कि आंकड़ों के वेरिफिकेशन की प्रक्रिया चल रही है. उन्होंने कहा- कृपया जानकारी देने का अंतिम मौका दें. इस पर कोर्ट का पारा चढ़ गया. उसने कहा,

“इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान मत दीजिए कि प्रक्रिया चल रही है, जिसे वेरिफाई करने में आप सालों लगाएंगे. क्या बच्चे तब तक बेसहारा रहेंगे? किस तरह का मौका मांग रहे हैं आप? अन्य राज्यों ने डिटेल्स दे दी हैं. क्यों सिर्फ यही एक राज्य जानकारी नहीं देता? हम विभाग के सचिव को हलफनामा फाइल करने का निर्देश दे रहे हैं. आप इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान नहीं दे सकते कि NCPCR इस तरह के आरोप क्यों लगा रहा है. ये कोई राजनीतिक मामला नहीं है. ये अनाथ बच्चों से जुड़ा मामला है. अगर हमें पता चला कि आप इस बारे में एक्शन नहीं ले रहे हैं तो हमें किसी और एजेंसी से कहना पड़ सकता है कि वो इस मुद्दे को देखे.”

Orphaned Children
प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार- इमदादुल हुसैन-Unsplash)

वहीं, पंजाब सरकार के आंकड़ों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

“आपके आंकड़े सही नहीं लगते. आपको उन तरीकों के साथ आना होगा, जिनके जरिए जमीनी जानकारी मिल सके. सिर्फ जिला स्तर पर CWC के सामने बच्चों को पेश करने से मिली जानकारी से काम नहीं चल सकता. जब तक उन बच्चों के बारे में जानकारी नहीं मिलती जिन्होंने अपने पेरेंट्स को खोया है, तब तक उनका ख्याल नहीं रखा जा सकता.”

पंजाब सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि संबंधित विभाग इस बारे में आश्वस्त है कि राज्य में 73 बच्चे ही अनाथ हुए हैं. उन्होंने बताया कि 33 बच्चों के पेरेंट्स कोविड के कारण मारे गए. बाकी 40 पेरेंट की मौत अन्य कारणों से हुई. लेकिन कोर्ट ने कहा कि सरकार जमीनी स्तर पर इस संख्या को वेरिफाई करे. जम्मू-कश्मीर सरकार के वकील को भी कोर्ट ने इसी तरह के निर्देश दिए.

अनीषा माथुर की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में बिहार सरकार ने भी अपना पक्ष रखा. उसकी तरफ से पेश हुए वकील मनीष कुमार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा,

“ये प्रोसिडिंग एक विशेष उद्देश्य के लिए शुरू की गई थी. पूरे मुद्दे को जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट के तहत डिस्कस करने के बजाय मैनेजमेंट ऐक्ट के पहलुओं पर चर्चा की जानी चाहिए. बिहार सरकार ने हरेक डेथ पर 4 लाख रुपये देने की घोषणा की है. यानी अनाथ बच्चे को 8 लाख रुपये मिलेंगे.”

इस पर कोर्ट ने कहा,

“हम मुआवजे को लेकर चिंतित नहीं हैं. हमें बच्चे की परवरिश और देखरेख की चिंता है. क्या आपके मामले में ये मुद्दे इस अदालत के दायरे से बाहर हैं? अब तक दिए गए निर्देशों को लेकर आपको क्या आपत्ति है?”

कोर्ट के रुख पर बिहार सरकार के वकील ने कहा कि उन्होंने केवल अदालत के अधिकारी के रूप में अपनी बात रखी है. इस पर कोर्ट ने कहा कि इससे मामले में कोई मदद नहीं मिलती.


वीडियो- सरकार PM केयर्स फंड्स के जरिए कोरोना की वजह से अनाथ हुए बच्चों की आर्थिक मदद करेगी 

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इलाज के लिए पैसे नहीं हैं.