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नोटबंदी के बाद जो गांव कैशलेस हो गए थे, अब वहां के क्या हालात हैं?

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मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल. वहां से लगभग 30 किलोमीटर दूर है एक गांव, नाम है बड़झिरा. 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा के लगभग डेढ़ महीने के बाद 20 दिसंबर को इस गांव को पूरी तरह से कैशलेस घोषित कर दिया गया. मध्यप्रदेश का ये पहला गांव था, जिसे कैशलेस घोषित किया गया था. इसके लिए बाकायदा एक समारोह का आयोजन किया गया. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में वित्त राज्य मंत्री जयंत मलैया गांव पहुंचे. वहां उन्होंने किराने की एक दुकान से चावल खरीदा. दुकान पर पीओएस मशीन थी. जयंत मलैया ने चावल के पैसे अपने डेबिट कार्ड से चुकाए और गांव को कैशलेस का तमगा पहना दिया गया.

बैंक ऑफ बड़ौदा ने गांव में एक्सप्रेस लॉबी भी बनवाई थी.
बैंक ऑफ बड़ौदा ने गांव में एक्सप्रेस लॉबी भी बनवाई थी.

इस गांव को कैशलेस बनाने में मदद की थी बैंक ऑफ बड़ौदा ने. बैंक की तरफ से गांव में 200 डेबिट कार्ड जारी किए गए थे. बाद में कुल 1500 रुपे कार्ड गांववालों को दिए गए. सभी दुकानों पर पीओएस मशीनें लगाई गई थीं और बैंक की ओर से एक एक्सप्रेस लॉबी भी बनी थी. इस लॉबी में एटीएम , पासबुक प्रिंटर और कैश डिपॉजिट मशीनें लगाई गई थीं. बैंक की ओर से गांव में ग्राहक सेवा केन्द्र बना था और बैंक स्मार्ट फोन खरीदने के लिए गांव वालों को 10 हजार रुपये का लोन भी दे रहा था. इतना ही नहीं जयंत मलैया ने गांव के सरपंच को एक कम्प्यूटर भी भेंट किया था.

नोटबंदी के दो साल हो चुके हैं और गांव के कैशलेस होने की कहानी भी लगभग दो साल की होने को है. लेकिन हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं. अब की स्थिति ये है कि इस गांव में बिना कैश के कोई लेन-देन ही नहीं हो सकता है. और जगहों की तरह इस गांव में भी नकदी ही चल रही है.

20 दिसंबर 2016 को वित्त राज्यमंत्री जयंत मलैया ने जिस दुकान से अपने एटीएम कार्ड के जरिए चावल खरीदा था, अब उस दुकान पर सिर्फ कैश ही चलता है. उस दुकान के मालिक ने बताया कि बैंक ने पहले पीओएस मशीनें दीं. कुछ दिनों तक सब ठीक चलता रहा, लेकिन बाद में बैंक वाले आए और मशीनें ले गए. इक्का-दुक्का दुकानों को छोड़ दें, तो पूरे गांव के हालात करीब-करीब ऐसे ही हैं. बैंकों ने जिन दुकानदारों के पास पीओएस मशीनें छोड़ी भी थीं, दुकानदारों ने खुद ही उन्हें बैंकों को लौटा दिया.

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बैंक ऑफ बड़ौदा ने गांव में एक्सप्रेस लॉबी बनाकर जो एटीएम, पासबुक प्रिंटर और कैश डिपॉजिट मशीनें लगाई भी थीं, वो अब काम करना बंद कर चुकी हैं. इसके अलावा कैशलेस लेनदेन के लिए गांववालों पर जो एक्स्ट्रा चार्ज लगता है, वो उनके लिए मुसीबत है. खास तौर पर किसानों के लिए किसी तरह का एक्स्ट्रा चार्ज देना मुश्किल भरा है. किसानों की दिक्कतें यही खत्म नहीं हुई हैं. किसानों को अपनी फसलों का भुगतान आज भी नकद नहीं होता है. या तो पैसे उनक अकाउंट में ट्रांसफर किए जाते हैं या फिर उन्हें चेक से भुगतान किया जाता है. लेकिन जब बारी किसानों के खर्च की आती है, तो वो नकदी से ही सामान खरीदते हैं.

पीएम मोदी के बनारस को भी देख लीजिए

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पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के मिहिरपुर को भी कैशलेस घोषित किया गया था.

मध्यप्रदेश के बड़झिरा को कैशलेस घोषित करने के अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के एक गांव मिसिरपुर को कैशलेस घोषित कर दिया गया था. वहां भी बैंकिंग सेवा केंद्र खोला गया था. यह सेवा केंद्र भी बैंक ऑफ बड़ौदा का ही था. गांववालों को एटीएम दिए गए थे, दुकानदारों को पीओएस मशीनें दी गईं थीं. 3500 की आबादी वाला यह गांव अब पूरी तरह से नकदी के हवाले है. दो साल पहले कैशलेस और ई-पेमेंट शॉप की लगाई गई तख्तियां दिखती तो अब भी हैं, लेकिन बिना नकदी के इन दुकानों से कुछ भी नहीं खरीदा जा सकता है.

मुंबई के इस गांव का भी हाल बेहाल है

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धसई गांव को देश का पहला कैशलेस गांव बताया गया था.

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई. यहां से 150 किलोमीटर दूर है ठाणे. वहीं ठाणे जहां से देश की पहली रेल सेवा शुरू की गई थी. इसी ठाणे के धसई गांव को 1 दिसंबर 2016 को देश का पहला कैशलेस गांव घोषित कर दिया गया. घोषित करने वाले थे महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुनघंटीवार. उन्होंने धसई में कहा कि यहां का चावल अच्छा है, इसलिए उन्होंने यहां से पांच किलो चावल खरीदा है. इसके पैसे उन्होंने कार्ड के जरिए दिए थे. कुछ दिन तक तो ठीक चला, लेकिन उसके बाद लोग अपने पुराने ढर्रे पर लौट आए. वहां पर भी स्वाइप मशीनें, एटीएम कार्ड और वो सभी तामझाम किए गए, जिससे कैशलेस होना था. बाद में कभी नेटवर्क गायब होने लगा, तो कभी मशीनें खराब हो गईं और फिर आज की स्थिति ये है कि उस गांव में कैशलेस का कोई नामलेवा भी नहीं है.


वीडियो में देखें जब नन्ही कल्कि बैग पैक करके घर से भाग गई थी

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Story of those cashless villages on the occasion of one year of demonetisation

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