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एक ट्रांसजेंडर को पेशाब आए तो वो किस बाथरूम में जाए?

हमारे देश में किसी को ‘हिजड़ा’ या ‘छक्का’ कह देना बड़ा ‘आम’ है. ये कितना गलत है, ये कोई शायद ही सोचता हो. भीड़ में कहीं अगर ट्रांसजेंडर को देख लिया जाए तो सब कन्नी काटने लगते हैं. दूसरे के चेहरों पर खुद के लिए ऐसा तिरस्कार उन्हें भीतर तक तोड़ देता होगा. इस टीस को चेहरे पर न आने देने के लिए उन्हें खुद से लड़ना पड़ता होगा. सिर्फ अपने शरीर की बनावट को लेकर जिसके वैसा होने पर उनका कोई अधिकार नहीं.

ये तिरस्कार सिर्फ यहां होता हो ऐसा नहीं है. विश्व के सबसे ताकतवर देश का नाम आते ही किस देश का नाम ज़हन में आता है. अमेरिका. सबको लगता होगा वहां ज्यादातर चीजें ठीक ही होंगी. लेकिन वहां भी स्थिति खराब है. नस्ल, रंग और धर्म का भेदभाव तो है ही, जेंडर का भेदभाव भी बहुत है. ट्रांसजेंडर राइट्स की बहुत बात होती है वहां लेकिन इसकी कलई खोली है 18 साल के गेविन ग्रिम ने. अमेरिका के वर्जीनिया में रहते हैं. वो एक ट्रांसजेंडर हैं.

गेविन ग्रिम
Source- AP
                                                                                गेविन ग्रिम

गेविन ग्रिम ने वाशिंगटन पोस्ट में लिखा है –

2014 में मैंने वर्जीनिया के ग्लौसेस्टर हाई स्कूल में अपना सेकंड इयर शुरु किया. इससे एक साल पहले ही मैंने अपने परिवार वालों को कई सालों के जद्दोजहद के बाद अपने ट्रांसजेंडर होने के बारे में बताया. बाद में अपने डॉक्टरों के और परिवार वालों के कहने पर मैंने अपना नाम बदल लिया और एक लड़के के रूप में रहना शुरु किया.

नये स्कूल को लेकर मैं एक्साइटेड था. पहले मेरी मॉम प्रिंसिपल से मिलीं और तब वो काफी सपोर्टिव थे. मैं घबराया था कि ल़ड़के मुझे कैसे ट्रीट करेंगे?

शुरु में मैंने लड़कों का रेस्ट-रुम यूज किया. दो महीने तक कोई रोक-टोक नहीं हुई. बाद में दूसरे बच्चों के पैरेंट्स और कुछ और लोगों ने शिकायत करनी शुरु कर दी कि लड़कों के रेस्ट रुम को एक ‘लड़की’ यूज कर रही है. तब स्कूल वालों ने दो ‘पब्लिक मीटिंग’ कीं. रिपोर्टरों और टीवी कैमरों के सामने मेरे बारे में चर्चा की.

इसके बाद स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन ने मुझे लड़कों का बाथरुम भी इस्तेमाल करने से रोक दिया. मुझसे ये भी कहा गया मुझे नर्सों का ऑफिस या ‘यूनीसेक्स’ रेस्टरुम इस्तेमाल करना होगा. ये बहुत बुरा अनुभव था. मुझे बहुत दु:ख हुआ.

मुझे हर बार अपमान झेलना पड़ता है. मैंने ये बात इसलिए बताई क्योंकि मैं यहां सिर्फ एक ट्रांसजेंडर छात्र नहीं हूं. मेरे पास मौका है कि मैं दूसरे ट्रासजेंडर छात्रों के लिए चीजें ठीक कर सकूं.

ग्रिम ने इसे मानवीय अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए स्कूल के खिलाफ केस किया. शुरु में तो केस खारिज कर दिया गया. बाद में अमेरिका की एक अदालत ने कहा वो केस कर सकते हैं. गेविन ने वहां की एक जिला अदालत में केस किया.

जिला अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने केस स्वीकार कर लिया है.ग्रिम को अभी सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद है. ग्रिम का कहना है स्कूल बोर्ड ने उनके साथ ठीक नहीं किया.

वो आगे कहते हैं हम ज़िद्दी लोग हैं. हम टूटने वाले नहीं हैं. हम बीमार नहीं हैं. हम विचित्र लोग नहीं हैं. हम जैसे हैं उसमें हमारा कोई दोष नहीं. हम उसे बदल नहीं सकते. हमारी जेंडर आइडेंटिटी उतनी ही सहज है जितनी औरों की.

वाकई गेविन और उनके जैसे तमाम लोगों के ट्रांसजेंडर पैदा होने में उनका कोई दोष या अधिकार नहीं. जो जैसा पैदा हुआ है उसे वैसा ही स्वीकार करने में अभी इस दुनिया को बहुत समय लगना है.


ये स्टोरी निशांत ने की है 

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