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ये कौन सा बादल है जिसे देख देस उदास हो जाता है

एक कवि हैं. और चूंकि कवि हैं, तो हमेशा ही रहेंगे. अष्टभुजा शुक्ल. देखेंगे तो सोचेंगे. कोई किसान है. या प्राइमरी का मास्टर. या किसी दोस्त के पापा. जो शहर के चक्कर में जड़ नहीं हुए. जड़ें बचाए रखीं. खादी का कुर्ता पहनते हैं. मिजाज बोरे सा है. चमक से दूर. मगर एक एक तागा गेंहू को बचाकर रखता. ताकि पेट जब भूखा हो तो उलीच सके. गर्माहट भरी रोटी.

अष्टभुजा शुक्ला की कविता दिल्ली की बिल्लियों को ध्यान में रख अपना छींका नहीं फोड़ती. खरी खरखरी है. इसलिए उसकी जरूरत आज आधुनिक भक्तिकाल में और ज्यादा है.

अब इसे ही देख लीजिए. बादलों पर कविता. न कालिदास की तरह प्रेमी का ध्यान. न सलीमा वाले सलीम की तरह दर्शन और भावुकता की बहकी सी बातें. ठसपना. स्वारथ, पर अकारथ नहीं. इसे वो सबसे ज्यादा समझ सकते हैं, जिन्होंने, जिनके बाप दादाओं ने, मांओं ने, बहनों ने कभी गेहूं बोया हो. चना, मसूर बोई हो. और फिर बनरोजों से रखवाली करते हुए चैत बैसाख का इंतजार किया हो. सोना काटने के लिए. हंसिए से. सरपट-झटपट.

पर आजकल क्या है. पूस चल रहा है. आग लगे बादलों को. मुंह सुजाए सूखे से बैठे हैं. बरस नहीं रहे. दो दो बार पलेवा हो चुका है. और अभी न बरस कहीं चैत में बरस गए, तो बचा खुचा नाश भी हो जाएगा. छोटे किसानों की तो बिना मरे मौत है.

इन सबके बीच क्या है. तसल्ली. एक दूसरे को. कि सब बीतने के बाद भी होना बचा रहेगा. और उसके लिए हर जतन भी. उसी तसल्ली का एक तरीका है ये. अष्टभुजा शुक्ला की कविता.

पर लल्लन, आज अचानक उनका जिक्र क्यों. क्योंकि खाद बनाने वाली कोऑपरेटिव संस्था इफको ने उन्हें इज्जत दी है. इफको वाले एक अवॉर्ड देते हैं. लिटरेचर की फील्ड में. श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में. श्रीलाल जी वही राग दरबारी वाले. और इस बार ये सम्मान अष्टभुजा शुक्ल जी को देना तय हुआ है. इसी महीने की 31 तारीख को. कहना न होगा कि दिल्ली में.
अब आप कविता बांचिए.

 
चैत के बादल
 
मुंह अन्हारे
सन्न मारे
गांव में माया पसारे
कहां से उपरा गए
भड़ुए, अघी ये चैत के बादल!
 
बालियों से झुकी-झपकी-पकी
धरती संपदा का
गेहूंआई आंचल
इनकी कृपा पर छोड़कर आश्वस्त होना
भूल होगी
इनका, कौन थाया, क्या ठिकाना?
बिदबिदाएंगे
या पाथर छरछराएंगे
छिनगाएंगे पल्लव
बालियों से अन्न झारेंगे
या करेंगे कुदिन
पशु-परानी के लिए पितकोप
रोग फैलाएंगे
बौर लसियाएंगे
लगने नहीं देंगे टिकोरे
उखमजी व्यवहार से
 
माघ में
जब सींचना था
तब नहीं लौके
जब बयाना हो गई घर की मसूर
जब फ़सल पक कर हुई तैयार
तब फूंकने खलिहान
आए हैं
राशि की राशि सड़ाने, गड़गड़ाने
चौधराहट दिखाने
चैत के
इन गीदड़ रोएं बादलों को देख कर
याद आते हैं
भाद्रपद के वे घने काले मतंगों की तरह
मेल्हते, एंडते, मुड़ियाए चले जाते
सघन-घन, पनिगर और बतधर
 
खन-खन बदलते रंग
चैत के
इन नाटकी, मोघी, छछन्नी बादलों को देख कर
याद आते हैं
वर्ष-वर्षों से तृषित
चातकों को
दो बूंद पानी
हाथ से अपने पिलाते
शरद के शुभ्राभ्र वे सितकेश
पितृव्य जैसे
स्नेह से भीगे नयन, करुनाअयन
 
भरे परसंताप से
ये मिटाने पर उतारू
गरल जैसा जल उगलने को विकल
चैत के
इन कामरूपी बादलों को देख कर
याद आते हैं
पौष के पीयूषवर्षी मेघ
जिनका एक लहरा ही
फ़सल की डीभियों को
फुन्न रखने के लिए
सींक में सद्भाव भरने के लिए
दूध से भी अधिक लगता है
 
वैसे, चैत के इन बादलों का
जन्म, इनका कर्म
बनना या बिगड़ना, घिरना या घराना
निर्भर हवा पर, हवा के रुख़ पर
हवा की प्रकृति पर
कभी पुरबा चली
तो चढ़ गए दोखी
लगे बढ़ने, घुमड़ने, घेरने आकाश
क्षण में छा गए
थोबड़ा दिखाने आ गए
 
किन्तु उल्टे खींच कर पछुआ चली
तो लगे छंटने, छनमनाने
मुंह बनाने
इधर आने, उधर जाने
जैसे ओसाई जा रही हो राशि
और भूसा उड़ रहा हो दूर जाकर
कहीं पूरब के क्षितिज पर
 
द्वादशी का चांद
चांदी की नई सेई बना
रख उठा आकाश के खलिहान में
और तारे मटर के दानों सरीखे
छितरा गये खलिहान में
 
कट गये
ये चैत के बादल
हट गये
ये चैत के बादल
छंट गये
ये चैत के बादल!
– अष्टभुजा शुक्ला

 

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