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बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कह शक्ति मिल गैंगरेप केस के दोषियों की मौत की सजा उम्रकैद में बदली?

22 अगस्त 2013 की रात की घटना है. मुंबई स्थित शक्ति मिल में एक 22 साल की जर्नलिस्ट का सामूहिक बलात्कार किया गया. केस चला. मार्च 2014 में एक सत्र अदालत ने 5 में से 3 दोषियों को मौत की सजा सुनाई. लेकिन 7 साल बाद 25 नवंबर 2021 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने ये फ़ैसला पलट दिया. उसने तीनों दोषियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है. इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार मौत की सजा को रद्द करते हुए अदालत ने कहा,

“ये कहा जा सकता है कि हमने बहुमत के खिलाफ फैसला दिया. लेकिन संवैधानिक अदालतों को प्रक्रिया का पालन करना होगा. IPC की धारा 376ई बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ लगाई जातीहै. क़ानून अनिवार्य रूप से मृत्युदंड का प्रावधान नहीं करता है, या ये भी नहीं बताता कि अभियुक्त केवल मृत्युदंड का हकदार है.”

इस गैंगरेप को लेकर अदालत में 2 मामलों पर सुनवाई हुई थी. एक केस पीड़ित फोटो जर्नलिस्ट का था, और दूसरा उस महिला फोन ऑपरेटर का था, जिसने पत्रकार के साथ हुई घटना के कुछ दिनों बताया था कि इन लोगों ने उसके साथ भी दुष्कर्म किया था.

दोनों ही केसों पर सुनवाई के बाद सत्र अदालत ने तीन आरोपियों मोहम्मद कासिम हाफ़िज़ शेख (उर्फ कासिम बंगाली), सलीम अंसारी और विजय मोहन जाधव को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी. एक दोषी को उम्रकैद की सजा दी गई थी. वहीं एक आरोपी को नाबालिग होने की वजह से जुवेनाइल जस्टिस होम में भेज दिया गया था.

लेकिन अब अदालत ने सजा-ए-मौत पाने वाले तीनों दोषियों को राहत दे दी है. इसके पीछे कोर्ट ने कई कारण दिए. ये भी कहा कि किसी को इसलिए मौत की सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि घटना से गुस्साए लोग ऐसा चाहते हैं. कोर्ट ने कहा,

“शक्ति मिल सामूहिक बलात्कार मामले ने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया. एक बलात्कार पीड़िता न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी पीड़ित होती है. ये मानवाधिकारों का उल्लंघन है. लेकिन (सजा के लिए) केवल सार्वजनिक आक्रोश को ध्यान में नहीं रखा जा सकता है. मौत की सजा एक अपवाद है. (इसलिए) फैसला लोगों के गुस्से द्वारा निर्देशित नहीं होना चाहिए.”

कोर्ट ने आगे कहा,

“मौत पश्चाताप की अवधारणा को खत्म कर देती है. ये नहीं कहा जा सकता कि आरोपी केवल मौत की सजा का हकदार है. वे अपने अपराध के लिए पश्चाताप करने के हकदार भी होते हैं.”

दोषियों के वकीलों ने क्या दलीलें दीं?

इससे पहले सत्र अदालत ने तीनों दोषियों को मौत की सजा देते हुए कहा था कि इन पर दया दिखाने की कोई संभावना नहीं दिखती. हालांकि कोर्ट ने मौत की सजा केवल पत्रकार के मामले में सुनाई. फोन ऑपरेटर के गैंगरेप के मामले में सत्र अदालत ने इन तीनों को आजीवन कारावास की सजा दी थी. बता दें कि फोन ऑपरेटर के साथ दुष्कर्म की घटना जुलाई 2013 को हुई थी. इसके एक महीने बाद इन लोगों ने फोटो पत्रकार को शिकार बनाया था.

ट्रायल के दौरान सत्र अदालत ने प्रोसिक्यूशन के इस अर्ग्युमेंट को स्वीकार किया था कि ये तीनों दोषी आदतन अपराधी हैं और इन्हें सख्त सजा दी जानी चाहिए. कोर्ट ने इनके अपराध को क्रूर माना और प्रोसिक्यूशन की इस बात से सहमति जताई कि क्रूरता के इस स्तर पर दोषी को सजा-ए-मौत देते हुए परिस्थितियों पर विचार नहीं किया जा सकता.

हालांकि हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान दोषियों के वकीलों ने बताया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला आईपीसी सेक्शन 376ई को गलत तरीके से अप्लाई किए जाने पर आधारित था, जो बार-बार रेप, गैंगरेप या हत्या करने वालों पर लगाई जाती है. दोषियों के वकील युग मोहित चौधरी ने अदालत से कहा कि सेक्शन 376ई तब लगाई जा सकती है, जब आरोपी को एक बार सजा दे दी गई हो, उसे सुधरने का मौका दिया जाए, लेकिन बजाय इसके वो फिर से वही अपराध कर दे. युग मोहित चौधरी के मुताबिक ये मामले ऐसा नहीं था.

चौधरी ने हाई कोर्ट को ये भी बताया कि निचली अदालत का ट्रायल भी अनुचित तरीके से चला. उन्होंने दावा किया कि धारा 376ई के तहत आरोप तय करने और सजा के ऐलान के समय डिफेंस को उसकी दलीलें रखने का उचित मौका नहीं दिया गया था. इसके अलावा दोषियों के वकील ने कहा कि उन्हें उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया. उनके मुताबिक निचली अदालत की सुनवाई में आरोपियों के इकनॉमिक बैकग्राउंट और युवा उम्र की अनदेखी की गई.

‘जज साहब को क्या ही बोलें’

अब बात करते हैं हाई कोर्ट के फैसले के प्रभाव की. बलात्कारियों की सजा में बदलाव करने के हाई कोर्ट के फैसले से लोग सहमत नहीं दिखे. सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. राजा भईया नाम के यूजर लिखते हैं,

हमारे मिलॉर्ड को जो भी लगता हो, लेकिन गैंगरेप जैसी दुर्घटना में शामिल लोगों को मौत से कम सजा देने का कोई मतलब नहीं बनता है. वो जब तक जिंदा रहेगा तब तक पीड़ित/पीड़िता के लिए उसके शरीर पर एक घाव जैसा अनुभव कराता रहेगा.

एस के दिवाकर ने लिखा,

जज साहब को क्या ही बोलें. कुछ बोल दो तो कोर्ट के फैसले का उल्लंघन हो जाएगा.

 

एक और यूजर SD शर्मा लिखते हैं,

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले अक्सर आम आदमी की समझ से बाहर रहते हैं.

वैसे इस हफ्ते ये दूसरा ऐसा मामला है जब किसी हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के किसी दोषी को राहत देते हुए उसकी सजा कम की है. इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पॉक्सो ऐक्ट के एक मामले में बच्चे के यौन उत्पीड़न के एक दोषी की 10 साल की सजा को घटाकर 7 साल कर दिया था. दिलचस्प बात ये थी कि ऐसा करते हुए कोर्ट ने ये भी कहा कि बच्चे से ओरल सेक्स ‘गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं’ आता. कोर्ट ने पॉक्सो ऐक्ट की धाराओं में अंतर बताते हुए ऐसा कहा था. लेकिन कई जानकारों ने कानून की धाराओं के आधार पर ही कोर्ट की बात को अनुचित बताया था.


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