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सिंधु घाटी में घोड़ा था या नहीं, इस पर अटका IAS का सेलेक्शन

28 जुलाई को एक खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट, लॉ की एक स्टूडेंट की यूपीएससी के खिलाफ दायर की गयी याचिका पर सुनवाई को तैयार हो गया है. दरअसल ये याचिका यूपीएससी द्वारा इस बार 18 जून को आयोजित की गई सिविल सेवा प्रीलिम्स परीक्षा 2017 के जनरल स्टडीज पेपर में पूछे गए कुछ ऐम्बिग्यूअस (अस्पष्ट) प्रश्नों के सन्दर्भ में थी.

यहां ऐम्बिग्यूअस प्रश्न से मतलब है कि जिस प्रश्न की बनावट के कारण उसके कई उत्तर संभव हो जाएं. सिविल सेवा प्रीलिम्स परीक्षा में ऐसे बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें चार विकल्प दिए जाते हैं और स्वाभाविक रूप से उनमें से एक विकल्प प्रश्न का सही जवाब होता है. पर ऐम्बग्यूइटी के कारण कई प्रश्नों में एक के बजाय दो-दो जवाब सही जान पड़ते हैं.

सीधे शब्दों में कहें तो ऑब्जेक्टिव सवालों में सब्जेक्टिविटी (अलग-अलग तर्कपूर्ण इंटरप्रेटेशन संभव होना) का घुस जाना ही ऐम्बग्यूइटी है. यूं तो यूपीएससी के लिए ऐम्बग्यूइटी वाले सवाल पूछना कोई नई बात नहीं है. हर साल ही कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं. लेकिन इस साल ऐम्बिग्यूअस प्रश्नों की संख्या पिछले सालों की तुलना में ज्यादा रही और हद तो तब हो गई जब एक प्रश्न अत्याधिक घनघोर ऐम्बग्यूइटी वाला पूछ लिया गया. इतना ज्यादा ऐम्बिग्यूअस कि उस प्रश्न पर नामचीन इतिहासकारों में मतभेद हैं.

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मैं पूरा मुद्दा समझाने की कोशिश करता हूं. इस बार एक प्रश्न सिन्धु घाटी सभ्यता पर आया. सवाल की बारीकियों पर जाने के बजाय संक्षेप में इतना समझ लीजिये कि अभ्यर्थी से कई सारी जानकारियां चाहने वाले इस सवाल का जवाब अकेली इस बात पर टिक गया कि सिन्धु घाटी सभ्यता में घोड़े के साक्ष्य मिले कि नहीं? और इस बात पर तो इतिहासकारों में दो फाड़ है. एक धड़ा कहता है कि घोड़े के साक्ष्य मिले और दूसरा कहता है नहीं मिले. लोगों ने अपनी-अपनी किताबों में अपने-अपने तर्क और धारणायें देकर अपनी बात को साबित करने की कोशिश भी की है. सिविल सेवा की तैयारी करने वाले लोग इन्हीं अलग-अलग किताबों से पढ़ाई करते हैं. लिहाजा परीक्षा में उम्मीदवारों ने इस सवाल पर अलग-अलग विकल्प भरे, जोकि देखा जाए तो गलत भी नहीं था.

अब आपको लग रहा होगा कि क्या पागल आदमी है, एक सवाल के लिए इतनी बातें बना गया. ऐसा भी क्या पहाड़ टूट पड़ा एक-दो सवालों के ऐम्बिग्यूअस आ जाने से. पहाड़ का तो पता नहीं लेकिन इन एक-दो सवालों का पूरी परीक्षा पर बहुत गहरा असर पड़ता है. चलिए, समझाता हूं. सिविल सेवा परीक्षा के प्रीलिम्स में दो पेपर होते हैं. हर पेपर 200 नंबरों का होता है. लेकिन दूसरा पेपर केवल क्वालीफाइंग होता है.इसका मतलब है कि मेरिट बनती है केवल 200 नंबरों पर.

दो साल से कटऑफ लगभग 110 के आस-पास रहती रही है. परीक्षा में प्रतिस्पर्धा के स्तर का अंदाजा आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि प्रीलिम्स में सेलेक्ट होने वाले लगभग आधे बच्चे कटऑफ से 10 नंबर के दायरे में ही रहते हैं. एक प्रश्न होता है दो नंबर का और गलत होने पर नेगेटिव मार्किंग होती है एक तिहाई. इसका मतलब है कि एक प्रश्न गलत होने पर आपके 2.67 नंबर कट जाएंगे. यानी कि एक प्रश्न का हेर-फेर लगभग 15% (क्योंकि कटऑफ के पास सघनता और ज्यादा होती है) और दो प्रश्नों का हेर-फेर 25% पोटेंशियल उम्मीदवारों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिये काफी है.

इस बार प्रीलिम्स के पेपर में ऐसे कम से कम 2-3 सवाल पूछे गए. लोग तो 6-8 सवालों तक के दावे कर रहे हैं. ऐसे में प्रीलिम्स में सेलेक्ट होना प्रतिभा से ज्यादा तो भाग्य पर निर्भर होता दिख रहा है. बेशक इस परीक्षा में गला-काट प्रतिस्पर्धा है लेकिन गला अगर कोई प्रतिस्पर्धी काटे तो उम्मीदवार शायद हंसते-हंसते मरना पसंद करेगा लेकिन अगर किस्मत उसका गला रेंतने लगे तो ये उसे बिलकुल मंजूर नहीं.

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इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट 1 अगस्त को सुनवाई के लिए राज़ी हो गया है. अब अगर मुद्दा सिर्फ इतना भर होता तो मैं इतना सब लिखने की ज़हमत न करता. दरअसल मर्ज और बड़ा है. असली मुद्दा है सिविल सेवा परीक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही का. यूपीएससी के मनमाने, अपारदर्शी और गैरपेशेवर रवैये को चुनौती देने का. और सबसे बढ़कर अटेम्प्ट दर अटेम्प्ट के चक्कर में फंसे एक आम सिविल सेवा अभ्यर्थी के मूल अधिकारों का. क्या राजेंद्र नगर-मुख़र्जीनगर जैसे इलाकों में 10,000 रुपये महीने का कमरा लेकर आंखों में बड़े सपने पालने वाले या भारत के किसी छोटे शहर में लैपटॉप पर दिल्ली की कोचिंगों का पायरेटेड मटीरियल पढ़ने वाले एक सामान्य अभ्यर्थी की पेपर सम्बन्धी शिकायतों का समय से निपटारा नहीं होना चाहिए?

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प्रीलिम्स (जोकि सिर्फ क्वालीफाइंग है, मतलब उसके नंबर फाइनल मेरिट में जुड़ते तक नहीं हैं) की आंसर-की, कटऑफ और लोगों को मिले नंबर जैसी सूचनायें परीक्षा की पूरी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद यानी कि लगभग एक साल बाद बताई जाती हैं. पिछले साल 7 अगस्त को हुए प्रीलिम्स की आंसर-की इस साल 18 जून को हुए प्रीलिम्स के एक हफ्ते बाद आयीं थीं. जिस व्यक्ति का प्रीलिम्स नहीं निकलता है, क्या उसे इतना भी हक नहीं कि वह जान सके कि पेपर में पूछे गए सवालों का सही जवाब क्या है? जब वह अपनी गलतियां ही नहीं जान पाएगा तो सुधार कैसे करेगा? क्या ये प्रतिस्पर्धा के मूल सिद्धांत के ही खिलाफ नहीं है?

RTI डालो तो आपकी RTI लटका दी जाएगी. फिर आदमी खुद ही हार मान लेगा क्योंकि यूपीएससी के खिलाफ केस लड़ सकने के लिए संसाधन तो सबके पास है नहीं. और मान लीजिये हिम्मत करके आपने केस कर भी दिया तो कोर्ट में यूपीएससी की प्रतिष्ठा और उनके तगड़े वकीलों की दलीलों के सामने आप गलत साबित हो ही जाएंगे. आपको यह जान के हैरानी होगी कि अधिकतर राज्यों के लोक सेवा आयोग और एसएससी जैसी संस्थायें समय से न केवल आंसर-की निकालते हैं बल्कि दावेदारों को मौका देते हैं आंसर-की पर सवाल उठाने का. लेकिन यूपीएससी इतनी साफगोई बरत दे, इतने अच्छे नसीब हमारे नहीं.

इसी तरह मेंस की परीक्षा में मॉडल-आंसर, कॉपी-चेकिंग, ऑप्शनल-पैरिटी (अलग-अलग वैकल्पिक विषयों के बीच साम्य स्थापित करना ताकि किसी विशेष पृष्ठभूमि वाले को नुक्सान न हो) और एक ही प्रश्नपत्र में प्रश्नशः मिले नंबर जानने सम्बन्धी कई मुद्दों में पारदर्शिता की जरूरत है. इंटरव्यू में भी कई मसले हैं. कुल-मिलाकर पूरी परीक्षा-प्रणाली में ही कई बड़ी खामियां हैं जिनको दूर किया जाना सख्त जरूरी है. सरकार का उदासीन रवैया भी इस पचड़े को और जटिल कर देता है. बासवान समिति की रिपोर्ट एक साल से पता नहीं किस अलमारी में पड़ी धूल फांक रही है.

2015 में पेपर में हिंदी माध्यम के छात्रों द्वारा हिंदी अनुवाद को लेकर किए गए आन्दोलन के बाद पेपर 2 को क्वालीफाइंग कर दिया गया था. उस समय पेपर से कुछ हफ्ते पहले ऐसा निर्णय लाज़मी था लेकिन अगले दो सालों तक स्टेटस-कुओ (यथास्थिति) का बरकरार रहना क्या सरकार और यूपीएससी की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते? 400 नंबरों के बजाय 200 नंबरों पर ही मेरिट बन रही है. सिविल सेवा परीक्षा के इतिहास में प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम एक-आध अपवादों को छोड़कर शायद ही कभी केवल एक पेपर के नंबरों भर से तय हुआ हो लेकिन फिलहाल पिछले तीन सालों से ऐसा जारी है. एक अपवाद को नियमित प्रक्रिया की शक्ल दे दी गई.

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यह बात सही है कि यूपीएससी देश की चुनिन्दा ऐसी संस्थाओं में से है जिसका दामन लगभग बेदाग़ रहा है. लेकिन केवल प्रत्यक्ष रूप से खून न करना ही बेदागी की निशानी नहीं है. अगर खुद की अपारदर्शी नीतियों से अप्रत्यक्ष रूप से किसी का गला घुट रहा हो तो वो भी खून ही की श्रेणी में रखा जायेगा. यह बात भी सही है कि पारदर्शिता बढ़ने से यूपीएससी को फर्जी और हल्के मामलों में कोर्ट में घसीटे जाने की सम्भावना बढ़ जाएगी. लेकिन आप पारदर्शिता सिर्फ इसलिए नहीं नकार सकते क्योंकि इससे कोर्ट में मामले बढ़ जायेंगे. और वैसे भी अगर मामले में दम नहीं होगा तो वो कोर्ट में टिकेगा ही नहीं. अब हालिया मामले में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को राज़ी हुआ है तो न्यायालय को प्रथमद्रष्टया मामले में गंभीरता ही दिखाई दी होगी.

अब पूरे लेख की सबसे मुख्य बात पर आते हैं कि आखिर मैं ये लिख ही क्यों रहा हूं. इसलिए ताकि सुनवाई के बाद दोबारा सभी का मूल्यांकन हो और मुझे इसका फायदा मिल जाये, बिलकुल नहीं. मैं पहले ही प्रीलिम्स में सेलेक्ट हो चुका हूँ. ये सब मैं लिख रहा हूं ताकि इस मामले को ऐसे ही दबने न दिया जाएं.

बात केवल इस साल के लिए नहीं है. इस साल कुछ आमूलचूल न हो सका तो कम से कम आने आले वाली परीक्षाओं में तो लोगों की परेशानियां कम होंगीं. आज बड़ी हिम्मत करके एक व्यक्ति ने यूपीएससी की ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठायी है. अगर आज ये आवाज दब गयी तो शायद भविष्य में कोई ऐसी हिम्मत न कर सके. लेकिन ये आवाज बची रही और इसे कईयों का समर्थन मिल गया तो यही आवाज चीख बनकर बहरों को भी सुनाई देगी.


ये आर्टिकल दी लल्लनटॉप के एक पाठक ने लिखा है.

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