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प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

चिराग पासवान. लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. जमुई से सांसद हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से असहमति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी को फैसले में कहा था कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दावा करना मौलिक अधिकार नहीं है. कोई भी अदालत राज्य सरकारों को SC और ST वर्ग के लोगों को आरक्षण देने का निर्देश नहीं दे सकती है. आरक्षण देने का यह अधिकार और दायित्व पूरी तरह से राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर है कि उन्हें नियुक्ति या पदोन्नति में आरक्षण देना है या नहीं. राज्य सरकारें इस प्रावधान को अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं.

कोर्ट के इसी फैसले पर एलजेपी नेता ने सवाल उठाए हैं. उन्होंने ट्वीट कर कहा,

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 7 फ़रवरी 2020 को दिए गए निर्णय, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरी/पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है, लोक जनशक्ति पार्टी उच्चतम न्यायालय के इस फ़ैसले से सहमत नहीं है. यह निर्णय पूना पैक्ट समझौते के ख़िलाफ़ है. पार्टी भारत सरकार से मांग करती है कि तत्काल इस संबंध में क़दम उठाकर आरक्षण/पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था जिस तरीक़े से चल रही है उसी तरीक़े से चलने दिया जाए.

Chirag
चिराग पासवान के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है. यह किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है कि वह प्रमोशन में आरक्षण का दावा करे. कोर्ट इसके लिए निर्देश जारी नहीं कर सकता कि राज्य सरकार आरक्षण दे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद-16 (4) और अनुच्छेद-16 (4-ए) के तहत प्रावधान है कि राज्य सरकार डेटा एकत्र करेगी और पता लगाएगी कि SC/ST कैटेगरी के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं. ताकि प्रमोशन में आरक्षण दिया जा सके. लेकिन ये डेटा राज्य सरकार द्वारा दिए गए रिजर्वेशन को जस्टिफाई करने के लिए होता है कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है. ये तब ज़रूरी नहीं है जब राज्य सरकार रिजर्वेशन नहीं दे रही है. राज्य सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है. और ऐसे में राज्य सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है कि वह पता करे कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं. ऐसे में उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश खारिज किया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तराखंड हाईकोर्ट का 2012 में दिया गया फैसला निष्प्रभावी हो गया. 2012 के हाईकोर्ट के फैसले में समुदायों को कोटा देने के लिए राज्य सरकार को आदेश दिया गया था. उस समय वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, कोलिन गोंजाल्विस और दुष्यंत दवे ने दलील दी थी कि अनुसूचित जाति/जनजातियों के लिए अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) के तहत विशेष प्रावधान करना राज्य सरकार का कर्तव्य है.

आरक्षण आया कहां से?

संविधान जब बना तो वादा किया गया कि सभी नागरिकों को बराबर के मौके मिलेंगे. लेकिन समाज के कुछ तबकों को खास मौकों की ज़रूरत थी. जैसे दलित और आदिवासी. इसीलिए संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत नौकरियों और सरकारी कॉलेज की सीटों में आरक्षण दिया गया. इस तरह आरक्षण आया. ये राज्य (माने केंद्र और राज्य सरकार) की ज़िम्मेदारी है. वो इससे पीछे नहीं हट सकता.

प्रमोशन में आरक्षण कहां से आया?

80 के दशक से देश के कई राज्य प्रमोशन में आरक्षण देने लगे. इन पर ब्रेक लगा नवंबर 1992 में जब मंडल केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा –

1. आरक्षण की व्यवस्था नियुक्ति के लिए है न कि प्रमोशन के लिए.
2. रिजर्वेशन कुल भर्ती का 50% से ज्यादा नहीं हो सकता.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटने के लिए 1995, 2000, 2001 में कई संविधान संशोधन किए. 2002 में इन सभी संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. इस मामले को हम एम नागराज केस के नाम से जानते हैं. एम नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में फैसला देते हुए कहा ये सारे संशोधन वैध हैं. माने सरकारें अपने यहां प्रमोशन में आरक्षण दे सकती हैं. लेकिन तीन बातों का ध्यान रखना होगा-

1. जिस समुदाय को ये लाभ दिया जा रहा है उसका प्रतिनिधित्व क्या वाकई बहुत कम है?
2. क्या उम्मीदवार को नियुक्ति में आरक्षण का लाभ लेने के बाद भी आरक्षण की ज़रूरत है?
3. एक जूनियर अफसर को सीनियर बनाने से काम पर कितना फर्क पड़ेगा?

इसके लिए सरकारों को ‘क्वांटिफाएबल डेटा’ इकट्ठा करना था. बताना था कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए ठोस आधार है. ये केस बाय केस बेसिस पर होना था. माने जब-जब प्रमोशन होना है, तब-तब ये पूरी कवायद करनी थी.

नागराज मामले ने आरक्षण देने का रास्ता तो साफ किया लेकिन इसे लागू करने में सरकारों को पसीना आ गया. नागराज जजमेंट के बाद भी अलग-अलग राज्य सरकारों ने अपने यहां प्रमोशन में आरक्षण के लिए नियम बनाए. लेकिन लगभग हर बार मामला कोर्ट चला गया. इस तरह के मामले इतने बढ़े कि केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले पर 40 से ज़्यादा याचिकाएं पर सुनवाई हुई.

26 सितंबर, 2018 को सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने ये साफ कर दिया था कि नागराज मामले पर दोबारा सुनवाई नहीं की जाएगी. उस पर 2006 वाला फैसला बना रहेगा. बस पिछड़ापन साबित करने के लिए क्वांटिफाएबल डेटा की बंदिश हटा ली गई. नागराज जजमेट के बने रहने का मतलब SC-ST में क्रीमीलेयर नहीं होगा और प्रमोशन में आरक्षण देना न देना चुनी हुई सरकारों की मर्ज़ी पर रहेगा.


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