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क्या इस सुपर स्टार के जरिए बीजेपी दक्षिण भारत में अपने कदम जमा पाएगी?

‘”मेरे भगवान के सामने पैसा कोई अहमियत नहीं रखता है. हम कुछ घंटों के लिए उस हवा में सांस ले रहे थे, जिसमें हमारे थलाइवर सांस ले रहे थे. इससे ज्यादा हमें क्या चाहिए.”

यह शब्द थे 40 साल के श्रीनिवासन जयसीलन के. चैन्नई में रहने वाले श्रीनिवासन तमिल फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े स्टार रजनीकांत के डाईहार्ड फैन हैं. उनकी बड़ी तमन्ना थी कि वो एक दफा नंगी आंखों से रजनीकांत को देख पाएं. ऐसे में जब उन्हें पता लगा कि रजनीकांत किसी शूट के लिए हांगकांग जा रहे हैं. श्रीनिवासन ने बिना देर किए आखरी मिनट पर उसी फ्लाइट में अपने और अपने परिवार के लिए टिकट करवा ली. इसके लिए उन्हें डेढ़ लाख रूपए देने पड़े.

तमिलनाडु में रजनीकांत एक किस्म के नशे का नाम हैं. सिनेमा के दर्शकों में उनके प्रति जो दीवानगी देखने को मिलती है वो अपने आप में दुर्लभ है. लोग रजनी को एक नजर देख लेने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. ऐसे हजारों लोगों की इच्छा पूरी करने के लिए रजनीकांत 26 से 31 दिसंबर के बीच चैन्नई में एक जलसा कर रहे हैं. यह दूसरा मौक़ा है, जब वो अपने हजारों फैंस से सीधे मुखातिब होंगे. इस जलसे के अंत में वो अपनी राजनीति में एंट्री के बारे में बड़ी घोषणा करने जा रहे हैं. फैंस मीट की शुरुआत में ही उन्होंने कहा कि राजनीति उनके लिए नई चीज नहीं है. वो इस युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं और 31 दिसंबर को वो अपने राजनीतिक प्लान का खुलासा करेंगे. रजनीकांत के इस बयान को सुनने के बाद तमिल राजनीति से साबका रखने वाले हर शख्स के दिमाग में MGR की तस्वीर दौड़ गई होगी.

तमिलनाडु में रजनीकांत के प्रति जो दीवानगी है, उसे 'दुर्लभ' श्रेणी में रखा जा सकता है
तमिलनाडु में रजनीकांत के प्रति जो दीवानगी है, उसे ‘दुर्लभ’ श्रेणी में रखा जा सकता है

आजादी से पहले जाति के सवाल पर पेरियार और सीएन अन्नादुराई के नेतृत्व में ‘सेल्फ रेस्पेक्ट’ आंदोलन चल रहा था. इस आंदोलन ने निचली जातियों के लोगों को अपने पक्ष में लामबंद करना शुरू किया. इस आंदोलन को राजनीतिक आवाज देने लिए 1916 में जस्टिस पार्टी बनाई गई थी. कई फूटों के बाद जस्टिस पार्टी की अंतिम परिणीति द्रविड़ मुनेत्र कजगम या DMK तक पहुंची.

आजदी के एक दशक बाद अन्नादुराई ने सिनेमा की लोकप्रियता को भुनाने के लिए कई कलाकारों को DMK की परिधि में लाना शुरू किया. सिनेमा से आए कलाकरों में सबसे बड़ा चेहरा थे करूणानिधि. करूणानिधि राजनीति में आने से पहले फिल्मों की कहानी लिखा करते थे. 1969 में अन्नादुराई के देहांत के बाद DMK की कमान उनके हाथ में आ गई.

अन्नादुराई और पेरियार: द्रविड़ आंदोलन के दो मजबूत स्तंभ
अन्नादुराई और पेरियार: द्रविड़ आंदोलन के दो मजबूत स्तंभ.

उनके बरअक्स DMK में एक और सिनेमाई चेहरा था. नाम था मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन उर्फ़ MGR. यह वो दौर था जब सिनेमाहॉल में MGR की फिल्म खत्म होते-होते परदे के पास सिक्कों का ढेर लग जाया करता था. तमिलनाड के बाल काटने वाले इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि वो अँधेरे में अपने उस्तरे से MGR जैसी पतली मूछें और लटकेदार बाल काट सकते थे. करुणा ने MGR की लोकप्रियता को खतरे की तरह लिया और उन्हें किनारे लगाने में लग गए.

MGR इस चीज के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने करूणानिधि से बगावत कर दी. 1972 में उन्होंने DMK के काले और लाल पट्टी वाले झंडे के बीच एक सफ़ेद पट्टी जोड़ी और नई पार्टी बनाई ‘अन्ना द्रमुक मुनेत्र कजगम’. जीभ को परेशान ना करने की गरज से इसे अक्सर अन्नाद्रमुक कह दिया जाता है. 1977 में MGR के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक ने पहली बार चुनाव लड़ा और 234 सीटों वाली विधानसभा में 144 सीटें जीतने में कामयाब रही. लोगों के राजा कहे जाने वाले MGR 1977 में पहली दफा मुख्यमंत्री बने. इसके बाद से तमिलनाडु की राजनीति पर से तमिल सिनेमा की छाया कभी हटी नहीं.

MGR का पार्थिव शव और उसके पीछे खड़ी जयललिता. लंबी लड़ाई के बाद जया ने रामचंद्रन की विरासत पर कब्जा किया था
MGR का पार्थिव शव और उसके पीछे खड़ी जयललिता. लंबी लड़ाई के बाद जया ने रामचंद्रन की विरासत पर कब्जा किया था.

दक्षिण भारत की राजनीति के बारे में अक्सर कहा जाता है कि इसकी बुनियादी तासीर है नायक पूजा. यहां के नेता ‘लार्जर देन लाइफ’ वाली छवि के होते हैं. MGR, करूणानिधि, जयललिता, जानकी, वाई.एस. राजशेखर रेड्डी. नेताओं की पूरी कतार है जिनकी जनता में मसीहा वाली छवि है. रजनीकांत ने तमिलों के बीच में लोकप्रियता के नए पैमाने गढ़े हैं. ऐसे में वो MGR के इतिहास को दोहराने की क्षमता रखते हैं.

असल जिंदगी में कोई भी हीरो नहीं होता है. लोग परिस्थियों के चलते हीरो बनते हैं. अन्नादुराई के निधन के समय करूणानिधि थे जिन्होंने उनकी खाली जगह भरी थी. MGR के जाने के समय कन्नड़ मूल की जयललिता थीं जिन्होंने तमिल राजनीति में MGR की जगह ली. लेकिन जयललिता के जाने बाद तमिल राजनीति नेतृत्व का निर्वात झेल रही है. जयललिता की स्वाभाविक वारिस शशिकला फिलहाल जेल में हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में जनादेश जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक के पक्ष में गया था. उनके निधन के साल भर के भीतर ही तमिलनाडु तीन बड़े सियासी विद्रोह और दो मुख्यमंत्री देख चुका है. यह परिस्थियां MGR की खड़ी की हुई पार्टी के प्रति मोहभंग करने वाली हैं.

करूणानिधि, MGR और जयललिता
करूणानिधि, MGR और जयललिता.

इधर तमिल राजनीति के दूसरे सबसे बड़े चहरे करूणानिधि के अवसान का समय है. उनकी विरासत को लेकर झगड़ा एक दशक पहले ही शुरू हो गया था. अपने खराब स्वास्थ्य के चलते करूणानिधि सियासत में सजावट की चीज बनकर रह गए हैं. कुल जमा बात यह है कि नायक पूजा वाली तमिल राजनीति का मंदिर फिलहाल खाली है. तमिल सिनेमा के दो बड़े चेहरे इस निर्वात को भरने के लिए तैयार हैं. कमल हसन पहले ही राजनीति में आने की घोषणा कर चुके हैं. रजनीकांत के राजनीति में उतरने की औपचारिक घोषणा भर बाकी है.

किधर जाएंगे रजनीकांत?

सितंबर 2017 में रजनीकांत ने ट्वीट कर स्वच्छ भारत अभियान का समर्थन किया था. इसने चैन्नई में कई सुगबुगाहटों को जन्म दिया था. इसके दो महीने बाद तमिल अखबार डेली तांती के 75 साल पूरे होने के अवसर पर नरेंद्र मोदी का चैन्नई जाना हुआ. यहां उनकी रजनीकांत के साथ दस मिनट की मुलाकात हुई. इसके बाद यह अटकलें तेज हो गई कि थलाइवा शायद बीजेपी का दामन थाम सकते हैं.

दक्षिण के राज्यों में अपनी पकड़ बनाना बीजेपी का सबसे बड़ा सपना रहा है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना,तमिलनाडु और केरल की राजनीति में बीजेपी की भूमिका बहुत अप्रासंगिक किस्म की है. इस लिहाज से देखा जाए तो ‘रजनीकांत’ बीजेपी के मिशन साऊथ इंडिया के ब्लूप्रिंट का सबसे गढ़ा शब्द है.

चैन्नई में अपने फैंस को संबोधित करते हुए रजनीकांत
चैन्नई में अपने फैंस को संबोधित करते हुए रजनीकांत.

तमिलनाडु की राजनीति की बॉटमलाइन तमिल अस्मिता है. इसकी जड़े वहां के समाज में बहुत गहरी हैं. उत्तर भारत में बुनियाद रखने वाली किसी भी पार्टी के लिए तमिल समाज मे स्वीकार्यता हासिल करना बहुत ही टेढ़ा काम है. आजादी के बाद कांग्रेस के साथ यह सुभीता थी कि उसके कई बड़े नेता तमिलनाडु से आते थे. इस वजह से स्थानीय स्तर पर उसके पास चुनाव लड़ने लायक संगठन था. द्रविड़ आंदोलन के उभार के साथ ही उत्तर भारत में बेस रखने वाली कांग्रेस वहां हाशिए पर लगा दी गई.

बीजेपी के साथ दिक्कत वही है जो कुछ दशक पहले कांग्रेस के सामने थी. किसी हिंदी भाषी पार्टी के इर्द-गिर्द तमिल जनता को लामबंद करना रजनीकांत के लिए भी बहुत मुश्किल काम होगा. रजनीकांत भी इस मुश्किल को समझते हैं. ऐसे में वो भी सोच-समझकर अपने विकल्प चुनेंगे. तमिलनाडु में उनके हर सियासी के दल के साथ अच्छे संबंध हैं. लेकिन हर दल यह जानता है कि रजनी के पार्टी में आने का मतलब होगा नेतृत्व में परिवर्तन. ना तो DMK और ना ही AIADMK के इस चीज के लिए तैयार है. ऐसे में बीजेपी का दामन ना थामने के अलावा रजनी के पास एक ही विकल्प बचता है, MGR की तरह नई पार्टी बनाना.


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